नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३५१
८४-८५. मृगशीर्ष हस्त :—कुट्टमित = स्त्रियों का एक चेष्टांलकार।
इसका लक्षण है—'केशस्तनाधरादीनां ग्रहे हर्षेऽपि सम्भ्रमात्। आहुः कुट्टमितं
नाम शिरःकरविधूननम्' [ केश, स्तन, अधर आदि के ग्रहण करने से हर्ष होने
पर भी घबराहट के साथ मस्तक एवं हाथों का विशेष परिचालन 'कुट्टमित'
भाव होता है।] अभिनवदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—स्त्रियों
के कपोलचक्र, सीमा, भय, कलह, नेपथ्य, आह्वान, त्रिपुण्ड, मृगमुख, वीणा,
पाद संवाहन!धनापहरण, मिलन, छत्रधारण, संचरण, प्रियाह्वान तथा योनि
के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है। (अभि० द० १३६-१४२)
८६-८७. काङ्गुल हस्तः—कङ्गु का अर्थ है प्रियंगु लता, उसे जो लेता
है वह 'काङ्गुल'। अन्य मत में कांगुल का अर्थ बिच्छू भी होता है।
अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना लकुचफल, बच्चों के पैरों के
घुंघरू घंटियाँ, चकोर, सुपारी के वृक्ष, बाला के उरोज, श्वेतकमल, चातक
तथा नारिकेल फल के अर्थ प्रदर्शन में की जाती है। (अभि० द० १४४-१४६)
८८-८६. अलपल्लव ( अलपद्मक ) हस्त :—'आत्मोपन्यास' का अन्य
अर्थ है स्त्रियों के अपने उपन्यास अर्थात् विस्मय दिखलाने में। उपन्यास का
अर्थ है विस्मय। इस स्थिति में इस हस्त का बार-बार अभिनय प्रस्तुत
किया जाए। अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—विकसित
कमल, कपित्थफल, चक्राकार पदार्थ, उरोज, वियोग, दर्पण, पूर्णचन्द्र, सौन्दर्य,
कुसुमाचित वेणी, छत के ऊपर का कमरा ( चन्द्रशाला ), गाँव, ऊँचाई,
क्रोध, सरोवर, गाड़ी, चक्रवाक पक्षी, कलकल ध्वनि तथा कीर्ति के भाव को
प्रदर्शित करने में की जातो है। (अभि० दर्प० १४६-१७)
६०-६८. चतुर-हस्त :—चतुर शब्द की 'चतस्रोऽङ्गुलयोऽङ्गुष्ठश्लिष्ट-
त्वेन सन्त्यस्मिन्' इस प्रकार अर्थ में 'अच्' प्रत्यय से निष्पन्न चतुर शब्द है।
इसमें चार अंगुलियों का अभिनय रहने से 'चतुर' कहलाता है। विभव का
एक बाजू से दूसरी बाजू में जाते हुए तथा अविभव का न जाते हुए बतला
कर अभिनय किया जाये। दारा (गृह पत्नी) को संयुक्तहस्तों से और
सम्मुखस्थ स्वस्तिक हस्त से दिखलाया जाये। इस प्रकार शरीर के वक्षः
से शिरः पर्यन्त क्षेत्रविशेष में संयुत और असंयुत, चञ्चल और स्थिर,
सम्मुख और पराङ्मुख उत्तान और अधोमुख, त्र्यस्त और चतुरस्र करते हुए
चतुर हस्तों को युक्ति के अनुसार उत्प्रेक्षित कर विशिष्ट अभिनय प्रस्तुत
करना चाहिए। अभिनयदर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना—कस्तूरी,