नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 501, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें३९० नाट्यशास्त्र
लियों को हिलाकर किया जाता है । सामने और विरुद्ध दिशा में जाने वाली
दोनों हाथों की तर्जनी से दिन की समाप्ति को दिखलाया जाता है । यह
भी लोक में प्रचलन है कि मध्यमा से महेश्वर और शक्र का अभिनय किया
जाए किन्तु इसको 'तर्जनी' से दिखलाना ही शास्त्रानुमोदित है । ( अ०
भा० ) अभिनयदर्पण में सूचीमुखहस्त का विवरण भरत सदृश विस्तीर्ण नहीं
है । इसके अनुसार सूचीमुख हस्त की योजना—एकार्थ बोध, परब्रह्म की
भावना, शतार्थ बोध, सूर्य, नगरी, संसार, 'अच्छा है' कहना, 'जो' और 'वह'
बतलाना, नीरवता, ताड़न, दुर्बलता, सलाई, शरीर, आश्चर्य, वेणी, छत्र,
सामर्थ्य, दोनों हाथ, रोमावली, भेरी वाद्य वादन, कुम्भकार का चक्र,
पहिया, विचार विवेचन तथा सन्ध्याकाल में—की जाती है । ( अभि० द०
१२७ से १३१ )
७८-८१. पद्मकोष हस्त :—लक्षण कारिका में 'ऊर्ध्वा' का अर्थ होगा
चारों अंगुलियाँ ऊपर की ओर उत्तान स्थिति में अलग-अलग हुई हों और
सिकुड़ी हुई हों तथा पद्म की तरह जिसका अभ्यन्तर स्थान विनत हो ।
अर्थात् हथेली में गड्ढा बन जाए । बिल्वादि के ग्रहण में वे ही अंगुलियाँ पर्व
के अगले भाग में अतिशय कुञ्चित ( सिकुड़ी हुई ) रखी जाती हैं । पुष्पप्रकर
का अर्थ होगा आगे आगे दो या तीन बार पुष्पों को बिखेरना । अभिनय-
दर्पण के अनुसार इस हस्त की योजना बिल्वफल, युवतिजन के गोल उरोज,
भँवर या घुमाव, गेंद, पतीली, भोजन, पुष्पकली, आम्रफल, पुष्पस्तबक,
मंजरी, जपा पुष्प, घण्टा, बाँबी ( वल्मीक ), कमल तथा अण्डे आदि भाव
प्रदर्शन में की जाती है । ( अभि० द० १३४-१३७ )
८२-८३- सर्पशीर्ष हस्त :—इसमें सभी अंगुलियाँ अंगूठे के साथ कुञ्चित
या सिकुड़ी हुई रहती हैं और सामने की ओर रखी हथेली विनत या
गड्ढेवाली गहरी रहती है, जिससे सर्प के फन जैसा हस्त का आकार बनता
है । सर्प की गति के अभिनय में यह हस्त अधोमुख रखा जाता है । आस्फोटन
का अर्थ है मल्लयुद्ध में ताल ठोंकना ।
अभिनयदर्पण में इस हस्त की योजना चन्दन, सर्प, मन्द स्वर, जल
छिड़कना, पोषण, ( देवताओं को ) तर्पण में जलाञ्जलि देना, हाथी के कुम्भ
स्थल को थपथपाना या संचालन तथा मल्लों का ताल ठोंकना जैसे भाव
प्रदर्शन में की गयी है । ( अभि० द० १३७-१३६ )