नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ४०१
है। यथा-१. मत्स्यावतारहस्त, २. कूर्मावतारहस्त, ३. वराहावतारहस्त,
४. नृसिंहावतारहस्त, ५. वामनावतारहस्त, ६. परशुरामावतारहस्त,
७. रामावतारहस्त, ८. बलरामावतारहस्त. ६. कृष्णावतारहस्त तथा
१०. कल्क अवतारहस्त । इसके अतिरिक्त विभिन्न जातियों एवं वर्णों की
हस्तमुद्राओं का विवरण प्राप्त है। इनमें राक्षसहस्त, ब्राह्मणहस्त, वैश्यहस्त,
शूद्रहस्त आते हैं। जातियों की उनके व्यवसाय, तथा विभिन्न देशों की
परम्पराओं के अनुसार हस्तमुद्राएँ रहती हैं ।
इसी क्रम में सम्बन्धीजन की हस्तमुद्राओं का भी विवरण मिलता है ।
तदनुसार दम्पत्तिहस्त, मातृहस्त, पितृहस्त, श्वश्रूहस्त, श्वशुरहस्त, भर्तृ-
भ्रातृहस्त, ननान्दृहस्त, पुत्रहस्त, स्नुषाहस्त, तथा सपत्नीहस्त । इसके
अतिरिक्त नवग्रहों के लिये भी हस्तमुद्राओं का स्वरूप इसी में दिया गया है ।
यथा-(१) सूर्यहस्त, (२) चन्द्रहस्त, (३) कुज-(भौम) हस्त,
(४) बुधहस्त, (५) गुरुहस्त, (६) शुक्रहस्त, (७) शनिहस्त,
(८) राहुहस्त तथा (६) केतु हस्त। इन सभी के लक्षण तथा योजना
आदि अभिनयदर्पण में देखना चाहिए। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में संयुक्त हस्तों
के ६ अतिरिक्त प्रकार भी बतलाये गये हैं। यथा-(१) कर्तरीस्वस्तिकहस्त,
(२) स्वस्तिकहस्त, (३) पताकस्वस्तिक, (४) कलश, (५) तिलक
तथा (६) वैष्णव । इनके स्वरूपादि भी (कारिका संख्या २१८ से २२५
तक) नाट्यशास्त्रसंग्रह में देखना चाहिए ।
१५५-१५६. बिना हस्त के कोई 'नाट्य' नहीं होता है। यहाँ नाट्य
शब्द का अर्थ है 'नाट्य' के उपयोगी अभिनय में विभावादि, जिसका रूप
जो दिखाई दिया है तथा जिसको बतलाया गया है 'वह' ।
१५७. यहाँ 'अर्थ का आशय' शोभातिशय और अभिनय-सामर्थ्य है ।
छन्दतः = नाट्याचार्य की इच्छा के तथा अनुभव के अनुसार रहने वाले
प्रयोग । लोकधर्मी इतिकर्तव्यता को दिखलाने वाले अभिनय, रस तथा भाव
के सूचक जो 'हस्त' हों उन्हें ।
१५८. देश = क्षेत्रविशेष । प्रयोग = सुकुमार एवं उद्धत रूपकविशेष-
अर्थयुक्ति = अभिधेय (वाच्य) गौण (लाक्षणिक, लक्ष्य) तथा प्रतीयमान
या व्यङ्ग्य अर्थ की उपपत्ति । पुरुषों के आचार स्त्रियों की अपेक्षा सामान्य
होते हैं अतः उनकी अपेक्षा स्त्रियों के विशेष रूप में हस्त प्रयुक्त किये जाएँ ।
१५६-१६४. रस और भाव के अनुसार स्थायी एवं संचारी के भेद से
तथा भिन्न-भिन्न विभाव भेद के कारण हस्तकर्म होते हैं। जैसे-विदूषक के
२६ ना० शा० द्वि०