नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
एकोनविंशोऽध्यायः ३६५
दृष्टनष्टानुसरणे १ इष्टानिष्टश्रुते २ तथा।
३ इष्टार्थख्यापने चैव ४ चिन्ताध्याने तथैव च ॥ ५२ ॥
उन्मादेऽसूयिते ५ चैव उपालम्भे तथैव हि।
६ अव्यक्तार्थप्रवादे च कथायोगे तथैव च ॥ ५३ ॥
उत्तरोत्तरसञ्जल्पे कार्येऽतिशयसंयुते।
७ विक्षते व्याधिते क्रोधे दुःखे ८ शोके तथैव च ॥ ५४ ॥
९ विस्मयामर्षयोश्चैव प्रहर्षे १० परिदेविते।
विलम्बिता च दीप्ता च काकुर्मन्द्रा ११ च वै भवेत् १२ ॥ ५५ ॥
विलम्बित, दीप्त तथा मन्द्र काकु स्वर तब रखना चाहिए जब कि कोई
खोई हुई वस्तु दिखाई पड़े तो उसका पीछा करने, किसी अनचाहे व्यक्ति या
बात को सुनने, किसी इष्ट वस्तु को बतलाने या प्रकट करने, चिन्ताग्रस्त
होने, उन्माद, असूया, उपालम्भ जैसे कार्य अत्यन्त गुप्त बात कहने, किसी
कहानी के कहने, उत्तरोत्तर भाषण करने, अत्यन्त कार्य व्यस्त होने, किसी
शरीर के अवयव के क्षत-विक्षत हो जाने या शरीर के किसी भाग में व्याधि
उत्पन्न हो जाने और दुःख तथा शोक की दशा उत्पन्न हो, तथा विस्मय,
क्रोध, हर्ष या रुदन होता हो ॥ ५२-५५ ॥
यानि सौम्यार्थयुक्तानि १३ सुखभावकृतानि च।
मन्द्रा विलम्बिता चैव तत्र काकुर्विधीयते ॥ ५६ ॥
मन्द्र और विलम्बित काकु स्वर तब रखे जाएं जब कि शब्दावली किसी
हर्षप्रद बात को या सुखकारी वृत्त को बतलाने वाली हो ॥ ५६ ॥
१. नुसारेण — ख०; ग० । २. श्रुतो — ख०; ग० ।
३. दृष्टार्थं — क०। ४. चिन्ताग्रस्ते — ख०; चिन्तायाने — ग० ।
५. सूयने — ख० । ६. अव्यक्तार्थप्रदाने च तथा लोके — क०; ख० ।
७ विक्षते व्याधिते त्वङ्गे — ख०; ग० ।
८. दुःखशोके — ख०; ग० ।
९. अमर्षे विस्मये चैव — क० । १०. हर्षे च — ख०; ग० ।
११. मन्दा — क० । १२. अस्मादनन्तरं क—पुस्तके च—
लघ्वक्षरप्रायकृते गुर्वक्षरकृते तथा।
उच्चा दीप्ता च कर्त्तव्या काकुस्तत्र प्रयोक्तृभिः ॥
इति अधिकं लभ्यते ।
१३. सुखनादकृतानि वै — क०; सुस्वभावकृतानि च — ग० ।
३६६ नाट्यशास्त्रम्
यानि स्युस्तीक्ष्णरूक्षाणि दीप्ता चोच्चा¹ च तेष्वपि ।
एवं नानाश्रयोपेतं पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ५७ ॥
दीप्त तथा उच्च काकु स्वर तब रखे जाए जब कि उच्चारित शब्दों में
कुछ तीखापन या खुरदरापन (प्रकट होता) हों। इस प्रकार नाट्य निर्देशक
विविध आश्रयों से युक्त काकु-स्वरों का 'पाठ्य' में प्रयोग करें ॥ ५७ ॥
विभिन्न रसों में नियत काकु स्वर—
हास्य शृङ्गारकरुणेष्विष्टा काकुर्विलम्बिता ।
वीररौद्राद्भुतेषूच्चा दीप्ता ²वापि प्रशस्यते ॥ ५८ ॥
भयानके स बीभत्से द्रुता नीचा च कीर्तिता ।
एवं भावरसोपेता काकुः³ कार्या प्रयोक्तृभिः ॥ ५९ ॥
हास्य, शृङ्गार तथा करुण रस में 'विलम्बित' काकु स्वर और वीर,
रौद्र तथा अद्भुत रसों में 'दीप्त' काकु स्वर प्रशस्त होता है ॥ ५८ ॥
तथा भयानक और बीभत्सरस में द्रुत और नीच काकु स्वर उत्तम
होता है। इस प्रकार भाव तथा रसों के अनुकूल काकु स्वरों की उचित
प्रदेशों में योजना की जाए ॥ ५९ ॥
उच्चारण के छः अंग—
⁴अथाङ्गानि षट् —विच्छेदोऽर्पणं विसर्गोऽनुबन्धो दीपनं प्रशमन-
⁵मिति । तत्र विच्छेदो नाम ⁶विरामकृतः । अर्पणं नाम ⁷लीलायमान-
मधुरवल्गुना स्वरेण पूरयतेव रङ्गं⁸ यत् पठ्यते तदर्पणम् । विसर्गो
नाम ⁹वाक्यन्यासः । अनुबन्धो नाम ¹⁰पदान्तरेष्वपि विच्छेदः
¹¹अनुच्छ्वसनं वा । दीपनं नाम त्रिस्थानशोभि वर्धमानस्वरञ्चेति ।
प्रशमनं नाम तारगतानां स्वराणां¹² प्रशाम्यतामवैस्वर्येणावतारण-
मिति¹³ ।
१. वोच्चा—ख० । २. चापि—ग० ।
३. काकुर्योज्या—ख०; ग० । ४. अथ षडङ्गानि—क० ।
५. इति षडङ्गानि—ख०; ग० । ६. विरामः—क० ।
७. लीलावर्णस्वरूपेणापूरयदि—ख०; ग० ।
८. रसं—क० । ९. वाक्योपन्यासः—क० ।
१०. पदस्य विच्छेदमन्तरेणातुच्छ्वासनं—क०; पदान्तरेष्वविच्छेद—ग० ।
११. अनुच्छ्वननं वा—ख०; अनुइच्छ्वासनं वा—ग० ।
१२. स्वराणामेकस्वर्येण—क०; णावरोहण—ख०; णावतरणमिति—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६७
अब (उच्चारण के) छः अंग बतलाते हैं—ये हैं—(१) विच्छेद,
(२) अर्पण, (३) विसर्ग, (४) अनुबन्ध, (५) दीपन तथा (६) प्रशमन।
इनमें विराम के कारण होने वाला (अंग) 'विच्छेद' कहलाता है।
(जिसका आगे विशद विवेचन दिया जा रहा है)।
लीला या सौकुमार्य से पूर्ण स्वरों में प्रेक्षागृह को भरते हुए जिस
शब्दावली का पाठ किया जाए उसे 'अर्पण' कहते हैं। वाक्य का पूर्ण करना
'विसर्ग' कहलाता है। दो अथवा अधिक पदों (शब्दों) के बीच विच्छेद
न करना या उनके उच्चारण की दशा में सांस का न टूटना 'अनुबन्ध'
कहलाता है। जो स्वर तीनों (उरः, कंठ, मस्तक) स्थान से उच्चारित
होकर क्रमशः बढ़ता जाए तो 'दीपन' कहलाता है। ऊंचे चढ़ाए हुए स्वरों
को धीरे-धीरे नीचे की ओर बिना वैस्वर्य के लाना 'प्रशमन' कहलाता है।
^१एषाञ्च रसगतः प्रयोगः— तत्र हास्यशृङ्गारयोराकाङ्क्षायामर्पण-
विच्छेददीपनप्रशमनयुक्तं पाठ्यं^२ कार्यम्। दीपनप्रशमनयुक्तं करुणे^३।
विच्छेदप्रशमनदीपनानुबन्धबहुलं वीररौद्राद्भुतेषु, ^४विसर्गविच्छेद-
युक्तं बीभत्सभयानकयोरिति।
अब उनके विभिन्न रसों में होने वाले प्रयोग बतलाता हूं। हास्य और
शृङ्गार रस में पाठ्य को अर्पण, विच्छेद, दीपन और प्रशमन नामक अंगों
से युक्त रखना चाहिए। करुण रस में दीपन और प्रशमन (अंगों) से युक्त
रखा जाए। वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों में विच्छेद, प्रशमन, अर्पण, दीपन
तथा अनुबन्ध युक्त पाठ्य रहना चाहिए। बीभत्स और भयानक रस में
विसर्ग, विच्छेद (अर्पण) युक्त पाठ्य रखना चाहिए।
सर्वेषामप्येषां^५ ^६मन्द्रमध्यतारकृतः प्रयोगस्त्रिस्थानगतः। तत्र
दूरस्थाभाषणे तारं^७ शिरसा, नातिदूरं मध्यं कण्ठेन, पार्श्वतो मन्द्र-
१. एषां रस—क०। २. वाक्यं—ग०।
३. करुणवीराद्भुतेषु समाकाङ्क्षविच्छेदप्रशमनार्पणदीपनानुबन्धबहुलं पाठ्यं
प्रयोज्यम्—ख०; ग०।
४. बीभत्सभयानकयोर्विच्छेदार्पणयुक्तमिति—ख०; ग०।
५. चैतेषां—ख०; ग०।
६. मध्यतारव्यवस्थया त्रिस्थानगतः प्रयोगः—ख०; ग०।
७. तारशिरसो—ग०।
३६८ नाट्यशास्त्रम्
सुरसा प्रयोजयेत् पाठ्यमिति । १मन्द्रात्तारं न गच्छेत् ताराद्वा
मन्द्रमिति ।
इन सभी अंगों का मन्द्र, मध्य एवं तार स्वरों के—जिनकी तीन स्थान
से उत्पत्ति हुई है—माध्यम से प्रयोग होता है । किसी दूरस्थ पात्र को
पुकारने में तार स्वर का—जो मूर्ध स्थान से उत्पन्न होता है—प्रयोग करना
चाहिए । जो पात्र अधिक दूर पर न हो उसे बुलाने में—कण्ठ स्थान से
उत्पन्न होने वाले, मध्य स्वर का प्रयोग करना चाहिए । तथा किसी समीप
स्थित पात्र से वार्तालाप करने में वक्षःस्थल से उत्पन्न होने वाले मन्द्र स्वर
का प्रयोग करना चाहिए । ( कभी भी ) मन्द्र स्वर से ( एकदम ) तार स्वर
या तार स्वर से मन्द्र स्वर पर नहीं पहुँच जाना चाहिए ।
एषाञ्च२ द्रुतमध्यविलम्बितास्त्रयो लया ३रसेषूपपाद्याः । तत्र
हास्यशृङ्गारयोर्मध्यलयः, ४करुणे विलम्बितो, वीररौद्राद्भुतबीभत्स-५
भयानकेषु द्रुत इति ।
इन स्वरों की तीन प्रकार की लय का भी विभिन्न रसों में उपयोग
किया जाता है । हास्य तथा शृङ्गार रस में मध्यलय, करुण में विलम्बित
लय तथा वीर, रौद्र, अद्भुत, बीभत्स और भयानक रस में द्रुत लय का
प्रयोग करना चाहिए ।
विराम और उसका लक्षण—
अथ विरामः—अर्थसमाप्तौ कार्यवशाच्च छन्दोवशात् । कस्मात् ?
दृश्यन्ते ह्येकद्वित्रिचतुरक्षरा विरामाः । यथा—
अब 'विराम' बतलाता हूँ । जिसका 'पाठ्य' में उपयोग होता है । यह
(विराम) अर्थ की समाप्ति ( या वाक्य के पूर्ण हो जाने ) के कारण या
फिर परिस्थिति पर निर्भर करता है । केवल छन्द के लक्षण पर ही विराम
नहीं किया जाता है । क्योंकि व्यवहार में यह पाया जाता है कि एक, दो,
तीन या चार अक्षरों पर भी विराम होता है—जैसे निम्न पद्य में—
किं, गच्छ, मा विश, सुदुर्जन, वारितोऽसि६
कार्यं, त्वया न, मम सर्वजनोपभुक्तम्७ ।
१. मन्द्रात्तारं गच्छेत्—ख०; मन्द्रात्तारं गच्छेत्ताराद्वा मन्द्रमिति—ग० ।
२. अत्र च—क० । ३. पूपयोज्याः—क० ।
४. करुणे च—क० । ५. बीभत्सकरुणयोर्विलम्बितः—क० ।
६. कारितोऽसि—क० । ७. युक्तम्—क० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३६९
१सूचासु चाङ्कुरगते च तथोपचारे
स्वल्पाक्षराणि हि पदानि भवन्ति काव्ये२ ॥ ६० ॥
रे दुष्ट, क्या है, दूर हट, आगे मत बढ़, तू रोक दिया गया है। अरे
निर्बल पुरुष ! तू सभी से उपहास किया जा रहा है। मुझे तुम से कुछ भी
काम नहीं।
इस प्रकार जिनमें थोड़े अक्षर भी हों पर काव्य में १सूचा तथा अंकुर२
(अभिनय) से युक्त होने और 'विराम' की सम्बद्धता से ऐसे समय स्वतः
उनमें गुणशालिता आ जाती है ॥ ६०॥
एवं विरामे प्रयत्नोऽनुष्ठेयः । कस्मात् ? विरामो ह्यर्थानुदर्शकः ।
अतएव 'विराम' के प्रयोग के विषय में ध्यान रखना चाहिए। क्योंकि
विराम अर्थों की स्पष्टता में सहायक होते हैं।
३अत्र श्लोकः—
४विरामेषु प्रयत्नो हि नित्यं कार्यः प्रयोक्तृभिः ।
५कस्मादभिनयो ह्यस्मिन्नर्थापेक्षी यतः६ स्मृतः ॥ ६१ ॥
इस विषय में प्राचीन अनुवंश्य श्लोक भी हैं :—
वाचिक अभिनय में 'विरामों' पर सदा नाट्य निर्देशक को ध्यान देना
चाहिए क्योंकि अभिनय उच्चारित शब्दों के अर्थ पर निर्भर होता है ॥६१॥
अलंकार तथा विरामों में हस्त संचालन-विधि—
यत्र व्यग्रावुभौ हस्तौ तत्र दृष्टिसमन्वितः७ ।
वाचिकाभिनयः८ कार्यो विरामैरर्थदर्शकैः९ ॥ ६२ ॥
( नृत्य के समय ) आंखों को वहीं रखे जहां हाथ अपनी मुद्राओं को
प्रदर्शित करते हों तो ऐसी स्थिति में अर्थ को स्पष्ट करने के लिए विरामों
के साथ वाचिकाभिनय अवश्य रख देना चाहिए ॥ ६२ ॥
१. सूचा तथा अङ्कुराभिनय के लक्षण नाट्यशास्त्र के अध्याय २४।४३ तथा
२४।४४ पर ( भाग ३ में ) अवलोकन करें ।
१. सूचाङ्कुराभिनयनेषु—क०; शोकं शुचं कुरु गते च—ख० ।
२. कार्ये—ख० । ३. भवत्यपि च—क० ।
४. विरामे तु प्रयत्नस्तु—ग० । ५. तस्माद—ग० ।
६. यतः स्थितः—ख०; ग० । ७. समन्वितैः—क० ।
८. वाचिकोऽभिनयः—क० । ९. दर्शभिः—क० ।
२४ ना० शा० द्वि०
३७० नाट्यशास्त्रम्
प्रायो वीरे च रौद्रे च करौ प्रहरणाकुलौ ।
बीभत्से १कुत्सितत्वाच्च भवतः कुञ्चितौ करौ ॥ ६३ ॥
हास्ये चोद्देशमात्रेण करुणे च प्रलम्बितौ ।
अद्भुते विस्मयात् स्तब्धौ २भयाच्चैव भयानके ॥ ६४ ॥
इसी प्रकार रौद्र और वीर रस में हाथ शस्त्र प्रहार में व्यस्त रहते हैं।
बीभत्स रस में कुत्सित वस्तु के अवलोकन आदि के कारण हाथ सिकुड़े
रहते हैं। हास्य रस में हाथ किसी व्यक्ति या वस्तु की ओर लटकाए हुए
या ढीले रखे जाते हैं और अद्भुत रस में आश्चर्य के कारण हाथ स्तब्ध
(निष्क्रिय) हो जाते हैं ॥ ६३-६४ ॥
एवमादिषु चान्येषु३ प्रविचारेऽथ४ हस्तयोः ।
अलङ्कारविरामाभ्यां साध्यते ह्यर्थनिश्चयः ॥ ६५ ॥
इसी प्रकार के अन्य अवसरों पर भी अलंकार और विरामों के द्वारा ही
प्रदर्शित अर्थ स्पष्ट होता है ॥ ६५ ॥
ये विरामाः स्मृता वृत्ते५ तेष्वलङ्कार दूष्यते ।
समाप्तेऽर्थे पदे वापि तथा प्राणवशेन वा ॥ ६६ ॥
पदवर्णसमासे च द्रुते बह्वर्थसङ्कटे ।
कार्यो विरामः पादान्ते तथा प्राणवशेन वा ॥ ६७ ॥
शेषमर्थवशेनैव विरामं सम्प्रयोजयेत् ।
पद्यों में जो विराम रखे गए हैं उनमें अलंकारों की भी अपेक्षा रहती है।
शब्द की अर्थ समाप्ति पर या सांस लेने के कारण जैसी भी स्थिति हो—
उसमें विराम अवश्य किया जाना चाहिए। इसी प्रकार जहाँ अक्षर और शब्द
दीर्घ समासावली में समाविष्ट हों, या उनका उच्चारण शीघ्र गति से किया
जा रहा हो, या उनसे अनेक अर्थ प्रकट हो रहे हों तो इन सभी अवस्थाओं
में पाद की समाप्ति या फिर सांस लेने के लिये जहाँ भी आवश्यक रूप में
रुकना होता हो तो वहाँ 'विराम' रखे जाएँ। (इसके अतिरिक्त) शेष
स्थानों पर अर्थ के अनुसार 'विराम' की योजना की जाए ॥ ६६-६८ ॥
१. कुञ्चितत्वाच्च—क० ।
२. विस्मयाविष्टे स्तब्धौ कार्यो—क० ।
३. सर्वेषु—ग० । ४. प्रविचारेषु—ख०; अधिकारेषु—ग० ।
५. नृत्ते—क०; एते—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३७१
अत्र१ च भावगतानि २रसगतानि च ३कृष्याक्षराणि बोद्धव्यानि ।
तद्यथा—
( वृत्ति )—इसी प्रसंग में भाव तथा रस में होने वाले कृष्याक्षरों को भी
जान लेना चाहिए।
‘कृष्याक्षर और उनका व्यवहार—
४आकारैकारसंयुक्तमेकारौकारसंयुतम् ।
व्यञ्जनं यद्भवेद्दीर्घं कृष्यं तत्तु विधीयते ॥ ६८ ॥
जो व्यंजन आकार से युक्त या ए, ऐ, औ जैसे दीर्घाक्षर वाले स्वरूप के
हों उन्हें कृष्याक्षर समझना चाहिए ॥ ६८ ॥
विषादे च वितर्के च प्रश्नेऽथामर्ष६ एव च ।
कलाकालप्रमाणे पाठ्यं कार्यं७ प्रयोक्तृभिः ॥ ६९ ॥
विषाद, वितर्क, प्रश्न और क्रोध की अवस्था में ऐसे वर्णों के (संवाद
में) आने पर उन पर एक कला का विराम (प्रमाणानुसार) रखा
जाए ॥ ६९ ॥
शेषाणामर्थयोगेन विरामे विरमेदिह८ ।
एकद्वित्रिचतुःपञ्च-षट्कलञ्च विलम्बितम् ॥ ७० ॥
(इसके अतिरिक्त) शेष (अक्षरों के होने पर) उनके अर्थों के
१. कृष्यतीति कृष्यो=विलम्बितो लयः तत्र साधूनि कृष्याक्षराणि
सन्ध्यक्षराणीत्यर्थः । (अभि० भार० voll II. पृ० ४०२) अर्थात्
विलम्बित लय के उपयुक्त सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर समझना चाहिए।
(जैसे आ ई ऊ जैसे दीर्घ अक्षर एवं सन्ध्यक्षर कृष्याक्षर हैं) ।
१. अथ—क०, ख०; अत्रानुगतानि चत्वार्यक्षराणि रसभावानुगतानि
निकृष्टाण्यक्षराणि चोद्बोध्यानि—ग० ।
२. रसजातानि—ख० । ३. कृष्याण्यक्षराणि—ख० ।
४. एकारैकारसंयुक्तमोकारौकारसंयुतम्—ख०; आकारे कारसंयुक्तमेकारे
कारसंयुतम्—ग० ।
५. भवेदिह—ख०; ग० ।
६. चामर्षणे—ख०; वामर्षणे—ग० ।
७. योज्यं—क० । ८. विरमेद्बुधः—क० ।
३७२ नाट्यशास्त्रम्
अनुसार जो विराम रखे जाएं वे एक, दो, तीन, चार या पांच कलाओं के
समय के प्रमाण वाले हों ॥ ७० ॥
'विलम्बिते विरामे हि सदा गुर्वक्षरं भवेत् ।
षष्णां कलानां परतो विलम्बो² न विधीयते ॥ ७१ ॥
जो सबसे अधिक समय लेने वाले ( अर्थात् लम्बे ) विराम हों वहाँ गुरु
अक्षर रहने चाहिए किन्तु छः कला से अधिक समय तक होने वाले विराम
नहीं हो ॥ ७१ ॥
अथवा ³कारणोपेतं प्रयोगं कार्यमेव च ।
समीक्ष्य वृत्ते कर्तव्यो विरामो रसभावतः⁴ ॥ ७२ ॥
या फिर किसी कार्य या अन्य आवश्यकता आ जाने पर और अधिक
समय लेने वाले 'विराम' रखे जा सकते हैं पर इन्हें रस तथा भावों की
स्थिति को देखते हुए ही रखना चाहिए ॥ ७२ ॥
ये विरामाः स्मृताः पाठ्ये⁵ ⁶वृत्तपादसमुद्भवाः ।
उत्क्रम्यापि क्रमं तज्ज्ञैः कार्यास्तेऽर्थवशानुगाः⁷ ॥ ७३ ॥
काव्य रचना में 'पादों' के विभाजन से ही 'विरामों' की सृष्टि होती है
पर रंगमंच पर उनके अर्थ को प्रकट करने के लिये चतुर जन निर्दिष्ट क्रम में
परिवर्तन कर विरामों को रख सकते हैं ॥ ७३ ॥
नापशब्दं पठेत्तज्ज्ञो ⁸भिन्नवृत्तं तथैव हि ।
विश्रमेन्नाविरामेषु⁹ दैन्ये¹⁰ काकुं न दीपयेत् ॥ ७४ ॥
कोई भी पात्र अशुद्ध शब्द और लक्षणहीन छन्दों का पाठ न करें।
निर्दिष्ट विराम स्थल के अलावा अन्य स्थानों पर देर तक न रुके और दैन्य
पूर्ण अवस्था में संवादों को बोलते हुए काकु को दीप्त न करे ॥ ७४ ॥
१. विरामे च विलम्बे च यदा—ख०; ग० ।
२. लम्बनं—ख०; ग० । ३. करणोपेतं—ग० ।
४. कर्त्तव्या विरामा रसभावतः—क० ।
५. काव्ये—ख०; ग० । ६. वृत्ते—क० ।
७. रसाश्रयाः—क०; तेऽर्थवशास्तदा—ग० ।
८. भिन्नवृत्तेन चैव हि—ख०; ग० ।
९. विश्रमेणाविरामेषु—ख०; ग० ।
१०. न काकुरसहीनकम्—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३७३
१वर्जितं काव्यदोषैस्तु लक्षणाढ्यं गुणान्वितम् ।
स्वरालङ्कारसंयुक्तं पठेत् २पाठ्यं यथाविधिः ॥ ७५ ॥
जिस काव्य रचना का अभिनेता द्वारा मंच पर पाठ किया जाए वह
काव्य के दोषों से युक्त नहीं रहना चाहिए, वह लक्षण तथा गुणों से और
स्वर तथा अलंकारों से युक्त ही होना चाहिए ॥ ७५ ॥
३अलङ्कारा विरामाश्च ये पाठ्ये संस्कृते मताः ।
त४ एव सर्वे कर्तव्याः स्त्रीणां पाठ्ये त्वसंस्कृते ॥ ७६ ॥
संस्कृत पाठ्य के लिए जिन अलंकार तथा विरामों को हमने बतलाया
स्त्री पात्रों के द्वारा कहे जाने वाले प्राकृत पाठ्य में भी उन्हीं का अनुसरण
किया जाए ॥ ७६ ॥
एवमेतत्स्वरकृतं५ कलाकाललयान्वितम् ।
दशरूपविधाने तु पाठ्यं योज्यं प्रयोक्तृभिः ॥ ७७ ॥
नाट्यप्रयोक्ता या निर्देशक दश रूपकों को मंच पर प्रदर्शित करने के
अवसर पर इन पाठ्य संवादों को उचित प्रकार से स्वर, कला, ताल और
लय से युक्त रखकर विचारपूर्वक प्रस्तुत करे ॥ ७७ ॥
६उक्तं काकुविधानन्तु यथावदनुपूर्वशः ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि दशरूपविकल्पनम् ॥ ७८ ॥
॥ इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये काकुस्वरव्यञ्जनो नाम
७एकोनविंशोऽध्यायः ॥
इस प्रकार मैंने उचित प्रकार से क्रमशः काकु स्वर आदि के विषय में
१. व्यपेतं वाक्यशेषैस्तु—ग० । २. काव्यं—ख० ।
३. अलङ्कारविशेषा ये पाठ्यसंस्कृतसंश्रयाः—ख०; ग० ।
४. ते सर्वे सम्प्रकर्त्तव्याः स्त्रीणां पाठघे तु संस्कृते ।—ख०; ग० ।
५. युतं—ख०; ग० । ६. ताल—ख०; ग० ।
७. यथा—ख० ।
८. सप्तदशोऽध्यायः—क०; ख० ।
३७४ नाट्यशास्त्रम्
आपको बतलाया। अब मैं दस रूपकों के स्वरूप को ( अगले अध्याय में )
बतलाता हूँ ॥ ७८ ॥
प्रदीप व्याख्या में भरत मुनि प्रणीत नाट्यशास्त्र का 'काकु' स्वर-व्यंजन
सम्बोधन आदि निरूपण नामक उन्नीसवां अध्याय समाप्त ।
समाप्तश्चायं द्वितीयो भागः ।
भरत नाट्यशास्त्र का द्वितीयखण्ड समाप्त ।
परिशिष्ट
( नाट्यशास्त्र : अध्याय ८-१९ )
अतिरिक्त टिप्पणियाँ
अष्टम अध्याय
( उपाङ्गविधान )
( संकेत—टिप्पणियों के आरम्भ में दी गयी संख्या अध्यायगत
श्लोकों की है । )
१-३. यहाँ ऋषिगण ने रस तथा भावों के विवरण के प्राप्त हो जाने
पर रसानुभूति के साधन एवं काव्यार्थ को हृदय तक ले जाने वाले 'अभिनय'
के विषय में भरतमुनि से प्रश्न किया जो इस अध्याय की संगति को
दिखलाते हुए 'अभिनय' के विवरण को आरम्भ करने के लिये ( प्रश्न रूप
में आधार बनाकर उपस्थापित ) किया गया है। प्रेक्षकों के लिये नाट्य-
प्रयोग का उपस्थापन 'अभिनय' ही करता है जो दृश्यमानता के साथ नाट्यगत
पात्रों की शारीरिक एवं मानसी स्थितियों का अनुकरण होकर दृश्यमान
होता हो ।
४-५. महामुनि ने ऋषियों को आरम्भ में अभिनय के चारों प्रभेदों को
बतला कर फिर अभिनय के स्वरूपादि का विवरण देना आरम्भ किया।
इस प्रकार प्रश्न के अनुरूप ही समग्र एवं साङ्ग अभिनय का स्वरूप दिखलाने
की प्रतिज्ञा के साथ साथ अभिनय शब्द की यौगिकी व्याख्या तथा स्वरूप
को भी मुनि ने दर्शाया।
६. अभिनय का उपयोग नाट्यप्रयोग के लिये होता है इसी कारण इस
प्रयोगात्मा विज्ञान को 'अभिनय' संज्ञा प्रदान की गयी है। अभिनय काव्यार्थ
को दृश्यमानता देता है या यह उन्हें रूपायित करने का एक प्रकार है जिससे
सामाजिक रसानुभव प्राप्त कर सकें। इस प्रकार इस अनुकृतिपरक तत्व
के साथ सौन्दर्यवत्ता भी लगी हुई है, क्योंकि इसके बिना परमध्येय 'रसवत्ता'
सम्भव नहीं है। इसी कारण रस भाव को व्यञ्जित करने वाली शरीरादि
चेष्टाओं को अभिनय संज्ञा दी गयी है। संगीत रत्नाकर ने अभिनय का
स्वरूप इस प्रकार दिया है :—
३७६ नाट्यशास्त्र
"सर्वत्राभिनयो भवेत् ।
काव्यबद्धं विभावादि व्यञ्जयन् यो नटे स्थितः ।
सामाजिकानां जनयन्निर्विघ्नां रससंविदम् ॥" (सं. र. ७।१८, १६)
[ अर्थात् जो काव्य में निबद्ध विभावादि को अभिव्यंजित करते हुए
सामाजिकों में बिना किसी विघ्न या रुकावट के रससंविद् की उत्पत्ति करते
हुए अवस्थित हो जाता है—वही अभिनय कहलाता है ]
७. दर्शकों के सम्मुख होने वाला नाट्यगत पात्रों की मानसिक तथा
शारीरिक स्थितियों का अनुकरण 'अभिनय' कहलाता है। यहाँ शाखा, अङ्ग
तथा उपाङ्ग शब्द से आगे व्याख्यान में शरीर के विभिन्न अङ्गों के द्वारा
सम्पन्न होने वाले अभिनय का विवरण देने का संकेत भी किया गया है।
क्योंकि दर्शकों के समक्ष नाट्य प्रयोगगत रंजक तत्वों को प्रकट कर रसानुभूति
का साधक हो जाता है !
८-९. भरतमुनि ने नाट्याश्रित अभिनय के (इस कारिका में)
उद्देश्य क्रम द्वारा चारों भेद दिखलाकर उनको नाट्य का साधन उसी के
सहारे नाट्य की स्थिति (होनी) दिखलायी है । अभिनय कला की रसाभि-
व्यञ्जकता को पूर्णरूप से हृदयंगम करने के लिये अभिनय के भेदोपभेदों
का समग्ररूप में ज्ञान अपेक्षित होता है । प्राचीन नाट्य एक अतिशय उन्नत
ललितकलाओं का रूप था जिसकी आङ्गिक चेष्टाएँ नृत्य के सन्निकट तर
होती थी । अभिनेतृगण के अंग संचालन लयात्मकता के साथ होते थे तथा
इसी कारण उनसे सौन्दर्य की भी पर्याप्त अभिव्यञ्जना हो जाती थी और
रस की भी ।
१०. भावों के अध्याय (ना० शा० अध्याय ७) में सात्विक भावों का
विवरण दिया जा चुका है अतः उनके साथ रखा जाने वाला अभिनय
सात्विक अभिनय कहलाता है। स्वरभेदादि अनुभावों का प्रदर्शन ही सात्विक
अभिनय कहलाता है । जिसका लक्षण है—'सात्विकः स्वरभेदादेः अनुभावस्य
दर्शनम्' । (इसका आवश्यक विवेचन प्रस्तावना में तथा नाट्यशास्त्र तृतीय
भाग अध्याय २२ तथा २३ पर दृष्टव्य ) ।
११. अंगाभिनय के तीन प्रभेद मुनि ने बतला कर अभिनय निरूपण
का विवरण विस्तार से देना आरम्भ किया । सर्वप्रथम मुनि ने शारीर ( या
आङ्गिक ) अभिनय के तीन भेद किये । 'शारीर' अभिनय शाखा, अंग,
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय ९ ३७७
उपांग तथा प्रत्यंगों से प्रदर्शित किया जाता है । इनमें केवल उपांगों से होने
वाला अभिनय 'मुखज' कहलाता है तथा स्थान आसन आदि चेष्टाओं के
द्वारा होने वाला 'चेष्टा-कृत' । नाट्यप्रयोग अपनी समग्रता के लिये शारीरिक
अवयवों से सम्बद्ध रखा जाता है । इन शरीर के अवयवों के तीन प्रभेद होते
हैं तथा इन्हीं से युक्त अभिनय रहता है जिसका विवरण अगली कारिकाओं
में ( ८-१२, १३ ) दिया गया है । इन छः अङ्गों से युक्त 'नाट्य' होता है ।
१२. कारिका में छः अंगों का मुनि ने विवरण दिया । अन्य मत
( अभि० दर्प० ) के अनुसार ग्रीवा को भी अतिरिक्त रूप में अंग माना
गया है ।
१३. प्रत्यंग अर्थात् सहायक अवयव जो अंगों के जोड़ने वाले होते
हैं—छः प्रकार होते हैं । इसके अतिरिक्त दोनों कलाइयाँ, दोनों कुहनियाँ,
दोनों घुटने तथा ग्रीवा को भी प्रत्यंगों में परिगणित किया जाता है । उपांग
अर्थात् अंगों के छोटे-छोटे भाग । ये प्रत्येक अंग में पृथक् पृथक् हैं । जैसे
शिर के उपांग ( बारह ) हैं—नेत्र, पलकें, पुतलियाँ, भौंह, कपोल,
नासिका, हनु ( जबड़ा ) ओष्ठ, दन्त, जिह्वा, चिबुक तथा मुख ( चेहरा ।
अन्य मत से कन्धों को भी उपांग माना गया है । हाथों के उपांग हैं—
कोहनी, कलाई तथा अंगुलियाँ । इसी प्रकार पैर के उपांग होते हैं—
टखने, एडियाँ, अंगुलियाँ पैरों के तले आदि । मुनि ने अगली कारिकाओं
के द्वारा इस समग्र अध्याय में अंग, उपांगों के अभिनय को विस्तार से
समझाया है ।
१४. शाखा अंकुर, तथा नृत्त ये तीनों भी अभिनय ही होते हैं । इनमें
आङ्गिक अभिनय को 'शाखा' कहते हैं । शाखा में हस्तों की चमत्कार पूर्ण
गति रखी जाती है कथित—अर्थानुसारी ( या भावों के अभिव्यञ्जक )
उपयुक्त अभिनय के प्रस्तुतीकरण को अंकुर तथा शारीर अभिनय के अंकुर
के द्वारा प्रदर्शित अर्थों को बतला कर आगे प्रस्तुत अर्थ की कल्पना करवा
देना अर्थात् 'अंकुर' के द्वारा प्रस्तुत अर्थ को आगे विस्तार देकर अगले अर्थों
को भी प्रस्तुत करने का आधार बनाना 'सूची' है । यही मत संगीतरत्नाकर
का है जिसकी मूल कारिका टिप्पणी पृष्ठ ६ पर उद्धृत है । ( भरतानुमत
शाखा, अंकुर तथा नृत्त का लक्षण इसी अध्याय की कारिका १५ पर है ) ।
१५. मुनि ने प्रस्तुत कारिका में शाखा, अंकुर तथा नृत्त का आंगिक
अभिनय में रहने वाला स्वरूप बतलाया ।
३७८ नाट्यशास्त्र
१६-१८. उपांगों से होने वाले मुखज अभिनय में सर्वप्रथम 'शिरोभिनय'
का भरत मुनि विवरण देकर अभिनय निरूपण आरम्भ करते हैं। इसके तेरह
प्रभेद होते हैं भरतमुनि सम्मत किन्तु आचार्य नन्दिकेश्वर ने मस्तक के नौ अन्य
भेद भी बतलाये । यथा—सम, उद्वाहित, अधोमुख, आलोलित, धुत, कम्पित,
परावृत्त, उत्क्षिप्त तथा परिवाहित । नाट्यशास्त्रसंग्रह में उद्वाहित नामक
एक अतिरिक्त प्रभेद दिखलाते हुए मस्तकाभिनय के १४ प्रकार माने हैं।
यहाँ नन्दिकेश्वर सम्मत मस्तकाभिनय के नौ प्रभेदों के स्वरूप ( नाट्यशास्त्र
से भिन्न होने के कारण ) विवरणसहित दिये जा रहे हैं ।
सममुद्वाहितमधोमुखमालोलितं धुतम् ।
कम्पितञ्च परावृत्तमुत्क्षिप्तं परिवाहितम् ।
नवधा कथितं शीर्षं नाट्यशास्त्र-विशारदैः ॥ (अ० द० ४६, ५०)
[ नाट्यशास्त्र के ( विज्ञाता ) आचार्यों ने मस्तकाभिनय के ६ प्रकार
माने हैं। यथा—( १ ) सम, ( २ ) उद्वाहित, ( ३ ) अधोमुख, ( ४ )
आलोलित, ( ५ ) धुत, ( ६ ) कम्पित, ( ७ ) परावृत्त, ( ८ ) उत्क्षिप्त
तथा ( ६ ) परिवाहित । ] इनके लक्षण तथा योजना भी ग्रन्थकार ने दी है
जिसे अभिनयदर्पण ( के कारिका ४६ से ६५ तक के ग्रन्थ भाग में ) देखा जा
सकता है ।
इसके अतिरिक्त नाट्यशास्त्र-संग्रह में भरतोक्त 'उद्वाहित' माना है
जिसका उल्लेख नन्दिकेश्वर ने भी किया था। किन्तु इसका लक्षण है :—
"सकृदूर्ध्वं शिरोनीतमुद्वाहितमुदीरितम्"
[ अर्थात् मस्तक के एक बार ऊपर उठाने या तान लेने को 'उद्वाहित'
शिर समझना चाहिये । ]
योजना—"शक्तोऽहमिह कार्येऽस्मीत्यभिमाने प्रयुज्यते" ॥
( ना० शा० संग० पृ० ५१ )
[ इसका प्रयोग व्यक्ति के कार्य में समर्थ होने के साभिमान सामर्थ्य
ख्यापन में किया जाता है ]
अभिनयदर्पण में उद्वाहित का स्वरूप इसी से मिलता हुआ है। यथा—
"उद्वाहितं शिरो ज्ञेयमूर्ध्वभागोन्नताननम्" ( का० ५२ ) [ मुख को ऊपर
उठाये हुए मस्तक को ऊँचा करते हुए रखना 'उद्वाहित' कहलाता है ]
योजना—"ध्वजे चन्द्रे च गगने पर्वते व्योमगामिषु ।
तुङ्गवस्तुनि संयोज्यमुद्वाहितशिरो बुधैः ॥ ( ५३ )
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय १ ३७९
[ ध्वज, चक्र, आकाश, पर्वत, आकाश स्थित तारागण एवं ऊपर स्थित
वस्तु को देखने के भाव को दिखलाने के लिये 'उद्वाहित' शिर की योजना
की जाती है । ]
१६-३७. मुनि ने मस्तकाभिनय के अन्तर्गत उनके तेरह प्रभेद, लक्षण
तथा उनकी योजना या विनियोग बतलाया । यद्यपि मस्तक द्वारा की
जाने वाली क्रियाओं की कोई निश्चित संख्या या उनका अन्त नहीं है, इसी
कारण इसके विषय में विभिन्न आचार्यों के मतों में विभिन्नता भी प्राप्त
होती है । स्वयं मुनि ने भी सामान्य लोकप्रचलित क्रियाओं के अनुसार
मस्तक की अन्य गतियों को भी प्रस्तुत करने में अपनी सहमति दिखलाई ।
(द्रष्ट० च० ३६ पर)
३८-४२. यहाँ मुनि ने रस की संख्या के अनुरूप ८ रसदृष्टियाँ तथा
स्थायी भावों की संख्या के अनुरूप ८ स्थायी दृष्टियाँ बतला कर शेष बीस
संचारी दृष्टियों का विवरण किया है, जो सब मिल कर (८ + ८ + २० =
३६) छत्तीस होती हैं । इन सभी दृष्टियों के स्वरूप तथा उनकी योजना
(या प्रयोगविधि) भी साथ साथ दिखलाई गयी है । अभिनयदर्पण में दृष्टियों
के केवल आठ प्रकार ही बतलाये हैं ।
४३-६५. रसादि दृष्टियों के साथ साथ भाव एवं सञ्चारीभाव जन्य
दृष्टियों का सलक्षण निरूपण किया गया जिसमें सभी के लक्षण तथा योजना
भी ( दिखलायी गयी ) है । अंगोपाङ्गों में दृष्टि का महत्व असाधारण होता
है इसी कारण दृष्टि का विवरण बारीकी से देकर उसकी विस्तृत पर्यालोचना
भी की गयी है । दृष्टि मनुष्य के आन्तरिक भावों की सूचक होने से भाषा
भी है तथा भावभङ्गिमाओं की अभिव्यक्ति का द्वार भी जिनसे रसाभिव्यक्ति
संभव होती है ।
६५-६६. मुनि ने दृष्टि के विवरण के साथ साथ ताराकर्म को भी
बतलाया जो पुतलियों की क्रियाएँ होती हैं । इनके नौ कार्य के उल्लेख के
साथ ( उनकी क्रियाओं के ) लक्षण तथा योजना भी दी गयी ।
६७-१०३. इस क्रम में ताराकर्म के प्रत्येक प्रभेद के स्वरूप विवरण तथा
उनकी रस एवं भावादि में अभिनय योजना भी दी गयी है ।
१०४-१०८. मुनि ने दर्शन विधान भी दिया है जिसमें नेत्रपुटों के
हलन-चलन के द्वारा अवलोकन के आठ प्रकार दिखला कर उनके स्वरूप
दिखलाये ।
३८० नाट्यशास्त्र
१०६-११६. यहाँ मुनि ने पलकों के ६ प्रभेद दिखलाते हुए उनकी
अभिनय योजना दिखलाई।
११७-१२७. इसी क्रम में भ्रुकुटी की क्रियाओं को दिखलाते हुए उसके
सात प्रभेद दिखला कर उसके लक्षण दिखलाये तथा अभिनय योजना भी।
१२८-१३४. नासा (नासिका) के कर्म को दिखलाते हुए उसके छः
प्रकार, उनके स्वरूप तथा अभिनय योजना को दिखलाया गया है।
१३४-१३६. कपोल कर्म के छः प्रकार, उनके लक्षण तथा उनकी
अभिनय योजना है।
१३६-१४४. अधर के छः कर्म तथा उनके लक्षण एवं अभिनय योजना।
१४५-१५१. चिबुक के सात कर्म, उनके लक्षणों के साथ-साथ मुखस्थ
दाँतों की क्रियाओं का विवरण एवं इनकी अभिनय योजना को भी बतलाया
गया है।
१५१-१५६. मुखज कर्म के छः प्रभेद दिखला कर उनके लक्षण एवं अभिनय
योजना बतलायी गयी है।
१५६-१६४. मुखज कर्म के विवरण से लगे हुए 'मुखराग' का विवरण
दिया गया है। मुखराग का अभिनय के अन्तर्गत विशेष महत्व होता है
तथा भाव एवं रस के सन्दर्भ में अभिनेता के लिये मुखराग का प्रदर्शन
अत्यन्त आवश्यक रहता है। आङ्गिक अभिनय का मुखराग द्वार माना
जाता है। वेमभूपाल ने भरतोक्त मुखराग के चार प्रभेदों के अतिरिक्त
विकस्वर, अरुण, मलिन तथा पाण्डु नामक अन्य चार प्रभेद भी बतलाये
हैं (द्रष्ट-भरतकोष पृ० ४६६)। नेत्रादि के अभिनय के साथ साथ मुखराग
की योजना नाट्यप्रयोग की स्थिति में आधार रहती है तथा यही प्रयोग
की सिद्धि का मूल माना जाता है क्यों कि मुखराग ही दर्शक को पात्र की
सुख, दुःखमयी स्थिति प्रकट करता है।
१६८-१७६. मुनि ने अन्त में ग्रीवा के नौ कर्म, उनके स्वरूप तथा
अभिनय योजना के दिखला कर 'उपाङ्गविधान' को सम्पूर्ण किया। ग्रीवा
कर्म शिर के आधार होते हैं परन्तु समग्र उपांग विवरण में सभी अंगों का
सन्निवेश रहने से यथावश्यक सभी का विवरण पूर्णतः रखकर मुनि ने अगले
अध्याय में प्रस्तुत किये जाने वाले अंगों का संकेत भी दिया।
नवम अध्याय
( हस्ताभिनय )
१-२ हस्त आदि शरीर अवयवों का कर्म इस अध्याय का प्रतिपाद्य
है। यहाँ ( २ ) कारिका अर्थ होगा इन अंगों का उपयोग या योजना जिससे
हो वह 'विनियोग' कहलाता है। जैसे पताक हस्त का अग्निधारा ( ज्वाला )
के दर्शनार्थ प्रयोग करना। इसी प्रकार 'तत्वतः' शब्द का आशय है नाट्य-
वस्तु के अनुसार या अनुरूप ।
३. हस्त आदि कर्मों की पीठिका बतलाते हुए उनके ठीक उपयुक्त
अभिनयादि का विवरण देने की मुनि उद्देश्य कथनार्थ सूचना देते हैं।
अभिनवगुप्तपाद ने कारिकास्थ अभिनय की इति कर्तव्यता पर विचार
किया। अभिनय की इस इतिकर्तव्यता के आरम्भ में दो प्रभेद होते हैं—
लोकधर्मी तथा नाट्यधर्मी। इनमें प्रथम ( लोकधर्मी ) इतिकर्तव्यता के भी
दो प्रभेद हो जाते हैं। जैसे निर्वेद प्रभृति चित्तवृत्तियों ( भावों ) को व्यक्त
करने वाले अनुभावों की इतिकर्तव्यता—जैसे गर्व के अभिनय में पताक
हस्त को ललाट पर उठाते हुए स्थित करना। दूसरी है केवल बाह्य-अवयव-
गत इतिकर्तव्यता—जैसे पद्मकोश हस्त के द्वारा किसी पदार्थ को दिखलाने
का कार्य। इन सभी का नाट्य में प्रयोग होता है। हस्तमुद्राओं के विषय
में विस्तार से भरतमुनि ने सभी तथ्यों को दिखलाया है जिनका यथावसर
आगे आशय स्पष्ट किया जाएगा ।
४-७. आङ्गिक अभिनय में हस्ताभिनय का महत्व अतिशय एवं सर्वोपरि
है। इसी कारण इस पर नाट्यशास्त्र में एक स्वतन्त्र अध्याय ही रखा गया है।
यही वह माध्यम है जो आन्तरिक भावों को स्वरूप प्रदान कर उन्हें रसभूमि
तक पहुँचाता है। अतएव प्रत्येक मुद्रा अपने मूल में भाव तथा रस की प्रेरणा
लिये रहती है तथा हस्ताभिनय का विशिष्ट आधार लेकर प्रस्तुत नाट्य-
प्रयोग को सफल बनाती है। इसी कारण भरतमुनि ने हस्तमुद्राओं का विशद
विवरण दिया है। असंयुत हस्तों के चौबीस प्रभेद होते हैं जिनका भरतमुनि
ने यहाँ उल्लेख किया। आचार्य नन्दिकेश्वर ने अभिनय दर्पण में असंयुत
हस्त मुद्राएँ २८ बतलाई हैं। इनके स्वरूप तथा इनकी योजना आदि के
विशिष्ट तत्वों को यथास्थान हम यहाँ संक्षेप में देने का उद्योग करेंगे जहाँ
३८२ नाट्यशास्त्र
भरत मुनि से विशिष्ट या विभिन्न स्वरूप हों । [ संक्षिप्त टिप्पणी पृष्ठ ३७,
३८ तथा ३६ पर दी ही जा चुकी है । ]
८-१०. अञ्जलि आदि हस्त संयुक्त ही होते हैं परन्तु कभी कभी
पताकादि का प्रयोग भी संयुक्तत्व युक्त रखा जाता है । आशय यह कि
अञ्जलि आदि हस्तमुद्राएँ बिना संयुत हुए अपने स्वरूप तथा अर्थ की ही बोधक
नहीं हो सकतीं ।
११-१६. अभिनय के उपयोगी संयुत तथा असंयुत हस्तों के साथ ही
नृत्तहस्तों का भी विवरण अपेक्षित है । ये अभिनेय अर्थ में विश्रान्ति को
अधिक फैलाकर प्रभावी बनाते हैं तथा शाखा एवं अंकुर के अभिनय की
पूर्ति करते हैं। ये कभी संयुक्त रूप तथा कभी असंयुत रूप का उपजीवन
रखते हैं तथा इनमें से किसी एक का भी प्रयोग किया जा सकता है । मोटे
तौर पर इनका प्रयोग नृत्त में रहता है परन्तु मुनि ने इनकी नाट्य अभिनय
में भी योजना रखने की सहमति दी है ।
१७-१८. पताक ( हस्त ) :-कारिका में प्रयुक्त 'कुञ्चित' शब्द
का यहाँ अंगूठे से सम्बन्ध है । कुञ्चित पाद का आगे लक्षण दिया गया
है उसी की क्रिया के अनुसार अंगूठे को कुञ्चित अर्थात् तिरछा कर देना
चाहिए । इस हस्त को 'पताक' इसी लिये कहा गया कि यह पताका (ध्वज)
के आकार जैसा रहता है । जैसी अपेक्षा हो तदनुसार इनका विनियोग
रखा जाता है । हस्तमुद्रा में प्रथम एवं महत्वपूर्ण यही पताक हस्त माना जाता
है जिसका उपयोग व्यापक रूप में होता है। अभिनयदर्पण में 'पताक' के
स्वरूप में अंगुलियाँ सटा कर रखते हुए फैलायी जाती है तथा अंगूठा मोड़
कर तर्जनी के मूल में लगाया जाता है
१६-२७. भरतमुनि ने 'पताक' हस्त की योजना का विशद विवरण
दिया है । 'पताक' हस्त से सूचित शेष अर्थ एवं कार्य को चित्राभिनय' में
( अध्याय २६ ) भी दर्शाया गया है । इतना होने पर भी इसके नाट्याचार्यों
की परम्परा में अनेक स्थिति में विविध प्रयोग होते हैं । भरतमुनि ने इसके
एक हाथ को तथा दोनों को शरीर के विभिन्न अवयवों के साथ रखते हुए तथा
अन्य क्रियाओं के द्वारा अभिनेय वस्तु एवं अर्थों की सूचकता को दिखलाया ।
अभिनयदर्पणकार ने इसके द्वारा किये जाने वाले अभिनय से सूचित या
अभिव्यक्ति वस्तु एवं कार्यों को विशदरूप में दिखलाया है । तदनुसार इसका
उपयोग अभिनय-प्रयोग के आरम्भ में किया जाता है । इसके अतिरिक्त
परिशिष्ट : टिप्पणी, अध्याय २ ३८३
जल से भरे मेघ, वन, वस्तु के निषेध, कुचस्थल, रात्रि, नदी, स्वर्गलोक,
अश्व, वस्तु के विभाजन, वायु की गति, शयन, जाने के लिये प्रयत्न करना,
साहस, प्रसन्नता, चाँदनी, कड़ीधूप, दरवाजा खोलना, लहरें, सातों
विभक्तियों का संकेत, मार्गगमन, समानता, अंगराग का सेवन या रचना करना,
आत्म-प्रकाश, शपथ-ग्रहण, चित्त को शान्तरूप में रखना, तालयन्त्र, ढाल,
तरल वस्तु का स्पर्श करना, आशीर्वाद, राजरुचि का प्रदर्शन, 'यहाँ' 'वहाँ'
का कथन, समुद्र, दान या पुण्य करना, सम्बोधन, आगे बढ़ना, तलवार
रखना, सम्मार्जनी से सफाई करना तथा मास, दिन और वर्ष को दर्शाने
जैसे भावों में भी 'पताक' हस्त का प्रयोग किया जाता है (अभि० द० ९४-
१००)। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में पताक हस्त की योजना इस प्रकार है—
किसी वस्तु के स्पर्श करने, किसी को चाँटा लगाने, ध्वज जैसी वस्तु को
दिखलाने या ताली बजाकर (गीतादि की) ताल देने, ऊपर उठनेवाली
ज्वालाओं को दिखलाने के लिये अंगुलियों को हिलाते हुए ऊपर उठा कर तथा
इसी प्रकार उँगलियों को नीचे की ओर रख कर 'पताक' हस्त को आन्दोलित
कर जलधारा या पानी की लहर या तरल पदार्थ को दिखलाया जाता है।
कटिप्रदेश पर 'पताक' हस्त रख कर पक्षियों के पक्षों को दिखलाया जाता
है, 'पताक' हस्त को ऊपर उठाकर किसी पदार्थ की ऊँचाई पर स्थिति
दिखलाई जाती है तथा नीचे कर (एक दूसरे के सम्मुख) आन्दोलित करते
हुए 'मृदंगवादन' दिखलाया जाता है, किसी पदार्थ के ऊपर उठाने या फेंकने
को दर्शाने के लिये कटि प्रदेश से 'पताक' हस्त को ऊपर उठाया जाता
है। अपने मुख के सामने पताक हस्त को सामने की बाजू से उठाकर रखते
हुए किसी मनुष्य या पदार्थ को जो वक्ता का सामना कर रहा हो दिखलाया
जाता है तथा पताक को एक ओर रखकर हिलाते हुए किसी वस्तु या कार्य
का निषेध दिखलाया जाता है। पताक हस्त को एक दूसरे से शीघ्रता
से रगड़ते हुए रख कर तथा एक दूसरे के ऊपर रख कर किसी वस्तु का
प्रक्षालन या धोना दर्शाया जाता है तथा सामने की ओर धीरे-धीरे घर्षण
कर इसी मुद्रा के द्वारा किसी वस्तु का साफ करना या पीटना बतलाया
जाता है। इसी प्रकार पताक हस्त को एक दूसरे के ठीक सामने रख कर
फिर उन्हें दूर हटाकर किसी शिला के उखाड़ने या किसी भारी (वजनदार)
वस्तु को उठाने का कार्य दिखलाया जाता है। इसी प्रकार पताक हस्त को
ऊपर उठा कर अंगुलियों को हिलाते हुए रखकर इसके द्वारा वायु तथा लहरों
के वेग को दिखलाया जाता है (द्रष्ट ना० शा० सं०-का० ६६-१०५)।
३८४ नाट्यशास्त्र
२७-३७. त्रिपताक (हस्त) :- इस हस्त का लक्षण सभी नाट्य-
शास्त्रीय ग्रन्थों में प्रायः समान मिलता है। भरत मुनि ने इससे सूचित भाव
तथा कार्यों को विस्तार से दर्शाये हैं। 'अभिनय-दर्पण' में त्रिपताक की
योजना या विनियोग का विवरण अल्पमात्रा में प्राप्त है। यथा इस हस्त के
उपयोग के द्वारा मुकुट, वृक्ष, वज्र, इन्द्रदेवता, केतकीपुष्प, दीपक, अग्नि की
ज्वालाएँ, जम्हाई लेना, कपोत, पत्रलेखा, बाण तथा परिवर्तन (पीछे मुड़ने)
के भावादि को दिखलाया जाता है। 'नाट्यशास्त्रसंग्रह' में भरतोक्त संकेतित
पदार्थ तथा कार्यादि को दिखलाने के लिये त्रिपताक हस्त के प्रदेश एवं
क्रियाओं का विवरण भी दिया गया है जो अधिकांश नाट्यशास्त्र के विवरण
से समानता लिये हुए है। यथा—इस त्रिपताक हस्त से दधि तथा अन्य
मांगलिक वस्तु का स्पर्श दिखलाया जाता है। इसी प्रकार किसी का बुलाना
बतलाने के लिये त्रिपताक हस्त की दोनों अंगुलियों को पीछे हटा सिकुड़ा कर
एक दूसरे के सम्मुख झुका देना चाहिए। किसी बात की उपेक्षा या विचार भेद
दिखलाने के लिये या किसी पदार्थ को दूर फेंकने (के भाव को दिखलाने)
की स्थिति में दोनों उंगुलियों को सामने की ओर फेंक कर हस्त तल को एक
ओर रखना चाहिए। किसी पूज्यजन को नमस्कार करने का भाव दिखलाने
के लिये त्रिपताक हस्त के सामने की बाजू में एक दूसरे को सामने रख
कर मस्तक पर रखा जाता है। किसी दूसरे के चेहरे को ऊपर उठाने में
दोनों अंगुलियों को ऊपर फैला कर 'त्रिपताक' का प्रयोग किया जाता है।
परन्तु दोनों अंगुलियों को क्रमशः झुका कर और ऊपर उठाते हुए 'सन्देह'
दिखलाया जाता है। इसी प्रकार मस्तक पर पगड़ी या मुकुट के धारण करने
में 'त्रिपताक' हस्त को मस्तक पर हस्ततलों को नीचे की ओर घुमाते
हुए दिखलाया जाता है किन्तु मुकुट की स्थिति में कैवल उसकी मस्तक पर
स्थिति ही रखी जाती है। त्रिपताक हस्त को नासिका, मुख या कान पर
रख कर क्रमशः अनिष्ट गन्ध, अनिष्ट वचन या अनिष्ट शब्द को दिखलाया
जाता है। छोटे पक्षियों, बहती जलधारा तथा हवा को दिखलाने में
त्रिपताक को कटि प्रदेश के बराबर ऊपर नीचे तथा बाजू में अंगुलियों को
चलाते हुए रखना चाहिए। आँसुओं के निकलने और उन्हें पोछने में आँख
के समीप त्रिपताक हस्त को लेजाकर नीचे की ओर जाती हुई अनामिका
दिखलाई जाती है। मस्तक पर तिलक लगाने की स्थिति दिखलाने के लिये
त्रिपताक हस्त को ललाट पर ला कर वहाँ अनामिका से स्पर्शकरवाया जाता