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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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४०४ नाट्यशास्त्र

१७६-१७७. हस्तों को व्यवस्थित रूप में निष्पादित कर (लक्षणानु-
सारी) प्रस्तुत करना ही अभिनय की 'वस्तु' है। इनमें अनुभावात्मक
'करण' होते हैं तथा इनका सञ्चय अङ्गहार हो जाता है जिनका विवरण ना०
शा० ४ अध्याय में दिया जा चुका है। स्थान, चारी तथा नृत्तहस्तों में अब
नृत्तहस्तों का निरूपण प्रसङ्ग प्राप्त हैं। इसके बाद क्रमशः स्थान एवं चारी
का विवरण कहा जायगा।
नृत्तहस्त—
१७८. चतुरस्र नृत्तहस्त :—वक्षःस्थल से हटकर जो अष्टाङ्गुल प्रदेश
हो उस पर रहने वाले दो हाथ। आशय यही है कि एक हाथ जब वक्षः पर
हो और दूसरा हाथ आठ अंगुल से हटे हुए स्थान पर हो तो दोनों हाथों में
आठ अंगुल का अन्तर रहेगा। इस प्रकार के अन्तर रहने से हाथों में चतुरस्र
रहता है। प्राङ्मुख से आशय है कि प्रयोक्ता जिसके सम्मुख होगा उसी के
सम्मुख चतुरस्र हस्त हों। कूर्पर तथा अंसों में तराजू की डंडी की तरह
समता रखी जाए। इसका अभिनय आकर्षण विशेष में किया जाता है।
१७६. उद्वृत्तहस्त :—(आशय यही कि) 'हस्त पहिले चतुरस्र होकर
बाद में उद्वेष्टित (व्यावृत्त) वर्त्तना प्रचार से हंसपक्ष कर दिये जाते हैं।
आवर्त्तन के समय ऊपर की ओर आवर्त्तन करने से 'उद्वृत्त' हैं। इसी की अन्य
संज्ञा 'तालवृन्तक' भी है।
१८०. तलमुख हस्त :—यहाँ 'तथा' पद का अर्थ है कि व्यावृत्त तथा
उद्वृत्त पूर्व में कर लिये जाएँ फिर इसको प्रस्तुत करे। इसमें समाप्ति के
समय हंसपक्ष हस्त रखे जाए। इसके तलमुख नाम का हेतु है दोनों हथेलियों
का एक दूसरे के सम्मुख हो जाना। मर्दल आदि अवनद्ध वाद्य वादन में इसकी
योजना रखी जाती है।
१८१. स्वस्तिक तथा विप्रकीर्णहस्त :—तावेव = अर्थात् 'तलमुख'
हस्त ही। 'स्वस्तिक' = स्वस्तिकाकार में। विप्रकीर्णहस्त पूर्व में कहे गये
चारों नृत्तहस्तों का आधार लेकर प्रवृत्त होता है यही यहाँ समझना चाहिए।
१८२. अरालकटकामुखहस्त :—अराल के प्रचार द्वारा एक हस्त को
अराल तथा द्वितीय को कटकामुख चतुरस्र के संस्थान के साथ प्रस्तुत
किया जाता है। अन्य लक्षण से स्वस्तिक संस्थान से अराल एवं कटकामुख
हस्तों को रखा जाए। इसका अभिनय वणिक् या सचिव पात्र के वितर्क में
किया जाता है।