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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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३९४ नाट्य
भी अर्थ लेते हैं। नाट्यशास्त्र-संग्रह के अनुसार नाट्यशास्त्र के विवरण के
अतिरिक्त भी चोरी को पकड़ने तथा केशों को पकड़ने में इसी हस्त की
योजना की जाती है।
१२०-१२४. ताम्रचूड-हस्त :- जिसकी मस्तक की शिखा खुली हुई या
फैली हुई हो ऐसे कुक्कुट पक्षी के आकार का है रहने से हस्त ताम्रचूड कह-
लाता है। ताल संगीत में काल का मानक होती है। संज्ञित का अर्थ है नाम
लेकर किसी बालक को बुलाना। ताम्रचूड का अन्य लक्षण भी है। जिसमें
कनिष्ठिका फैली हो ऐसी मुष्टि इसका आशय है। क्षिप्रमुक्ताङ्गुलीभिः का
अर्थ है शीघ्रता से खोली हुई या खुली हुई अंगुलियों के द्वारा। अभिनयदर्पण
में इसकी योजना मुर्गा, बगुला, कौआ, ऊँट, बछडा और लेखनी का भाव
दिखलाने में की जाती है। (द्र० अभि० द० १६३-१६४) नाट्यशास्त्र-संग्रह
ने बतलाया कि शार्ङ्गदेव के मत में नाट्यशास्त्र के ताम्रचूड के अन्य लक्षण की
लक्ष्य में प्राप्ति अधिक नहीं होने से इसका प्रथम लक्षण ही ग्राह्य (रखना) है।
१२५. असंयुत 'हस्त इतने ही नहीं और न ही ये ही असंयुत हस्त हैं
क्योंकि कोहल आदि नाट्यशास्त्र के अन्य आचार्यों ने अन्य असंयुत हस्त भी
संश्लेषण या योग से संयुत हस्त होते हैं। अतः उन्हें स्वयं समझ लेना चाहिए।
ऐसे विशेष अभिनय आगे नाट्यशास्त्र के २६ वें अध्याय 'चित्राभिनयाध्याय में
बतलाये जायेंगे। कुछ अभिनय इन्हीं हाथों के द्वारा अपने अनुभव तथा
उत्प्रेक्षण के आधार पर भी होते हैं।
भरत के इन असंयुत हस्तो के अतिरिक्त अभिनयदर्पण में दिये हुए असंयुक्त
गये हस्तो को भी यहाँ दिया जा रहा है। क्रमशः ये हैं—(१) अर्धपताक,
(२) मयूर, (३) चन्द्रकला, (४) सिंहमुख, (५) त्रिशूल,
(६) व्याघ्र, (७) अर्धसूची, (८) कटक तथा (६) पल्ली। इनके
लक्षण का क्रमशः योजनादि विवरण इस प्रकार है :—
अर्धपताक :-
त्रिपताके कनिष्ठा चेद् वक्रितार्धपताकिका ।
यदि त्रिपताक हस्त में कनिष्ठका अंगुली को टेढ़ी कर के झुका दिया
जाए तो 'अर्धपताकिका' हस्त कहलाता है।
पल्लवे फलके तीरे उभयोरिति वाचके ।
क्रकचे छुरिकायाञ्च ध्वजे गोपुरशृङ्गयोः ।
युज्यतेऽर्धपताकोऽयं तत्तत्कर्मप्रयोगके ॥ (१०३-१०४)