नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
अष्टादशोऽध्यायः ३४१
१छन्दतः प्राकृतं २पाठ्यं स्मृतमप्सरसां³ भुवि ।
मानुषाणाञ्च⁴ कर्तव्यं कारणार्थव्यपेक्षया ॥ ४३ ॥
अप्सराओं के स्त्री जाति होने के कारण तथा उनके पृथ्वी पर विचरण
विहार की अवस्थाओं में स्वाभाविक या स्वेच्छापूर्वक प्राकृत पाठ्य रखना
उचित है परन्तु ये ही जब किसी मानव की पत्नी के रूप में रहे तो
अवसरानुकूल संस्कृत या प्राकृत कोई भी पाठ्य रखा जाए ॥ ४३ ॥
न बर्बरकिरातान्ध्रद्रमिलाद्यासु⁵ जातिषु ।
६नाट्यप्रयोगे कर्तव्यं पाठ्यं⁷ भाषासमाश्रयम् ॥ ४४ ॥
परन्तु १बर्बर, किरात, आन्ध्र तथा द्रामिड (द्रविड) जाति के पात्रों की
नाट्यरचनाओं में उनकी अपनी जातीय भाषाएँ न रखी जाएँ ॥ ४४ ॥
८सर्वास्वेव हि शुद्धास्तु जातिषु⁹ द्विजसत्तमाः ।
१०शौरसेनीं समाश्रित्य भाषां काव्येषु योजयेत् ॥ ४५ ॥
किन्तु इन जातियों की केवल शौरसेनी से मिलती जुलती किन्ही
प्रचलित ²भाषाओं का (अवसर आने पर) प्रयोग किया जाए ॥ ४५ ॥
१. बर्बर आदि के विषय में ना० शा० अध्याय १३।९९ का विवरण तथा
टिप्पणियां द्रष्टव्य है ।
२. इनमें मागधी, अर्धमागधी तथा शौरसेनी के अतिरिक्त अवन्ती, प्राच्या,
वाल्हीका और दाक्षिणात्या के नाम भर यहाँ दिये गए हैं । मृच्छकटिक में
अवन्ती तथा प्राच्या के उदाहरण मिलते हैं । वाल्हीका का स्वरूप क्या
था यह नाटकों के प्रयोग के आधार पर सम्प्रति प्राप्त नहीं हैं । यहाँ
महाराष्ट्री प्राकृत का उल्लेख भरत द्वारा न किया जाना (भरत की)
प्राचीनता की ओर संकेत करता है क्योंकि शौरसेनी का उत्तरकालीन
स्वर महाराष्ट्री की रचना में स्पष्टतः परिलक्षित होता है ।
१. छन्दसां—क०; छन्दस्तः—ख० । २. वाक्यं—क०; ग० ।
३. मप्सरसामपि—क० । ४. मानुषाणाञ्च—क०; ग० ।
५. द्रविडा—ख० । ६. नाटचयोगेषु—क०; नाटचयोगे तु—ख०; ग० ।
७. काव्यं—ख०; ग० ।
८. जातिष्वेतासु सर्वासु—ख०; ग० । ९. श्रद्धासु च—ख०; ग० ।
१०. शौरसेनं समाश्रित्य भाषाः कार्यास्तु नाटके—क०; भाषा कार्या तु
नाटके—ख०; ग० ।
३४२ नाट्यशास्त्रम्
अथवा छन्दतः कार्या $^१$देशभाषा प्रयोक्तृभिः ।
नानादेशसमुत्थं हि $^२$काव्यं भवति नाटके ॥ ४६ ॥
या फिर स्वेच्छानुसार नाट्य निर्देशक इनकी कोई एक लोकभाषा रख लें
क्योंकि नाट्यरचनाएँ तो विभिन्न प्रदेशों की भाषा में रचित काव्यरचनाओं से
युक्त लिखी जा सकती हैं ॥ ४६ ॥
सात मुख्य भाषाएँ—
मागध्यवन्तिजा प्राच्या $^३$शौरसेन्यर्धमागधी ।
वाह्लीका दाक्षिणात्या च सप्त भाषाः प्रकीर्तिताः ॥ ४७ ॥
सात मुख्य (प्राकृत) भाषाएं हैं—(१) मागधी (२) अवन्ती
(३) प्राच्या (४) सौरसेनी या शूरसेनी (५) अर्धमागधी (६) वाह्लीका
तथा (७) दाक्षिणात्या ॥ ४७ ॥
$^४$शकाराभीर-चाण्डालशबरद्रमिलान्ध्रजाः$^५$ ।
हीना $^६$वनेचराणाञ्च विभाषा नाटके स्मृताः$^७$ ॥ ४८ ॥
नाट्यरचना में इसके अतिरिक्त कुछ विभाषाएँ$^१$ भी—जो गौण स्थिति
रखती हों—रखी जाती है। जिनमें हैं—शाकारी, आभीरी, चाण्डाली,
शाबरी, द्रामिडी, आन्ध्री तथा वनेचरों की अपनी जंगली भाषाएँ ॥ ४८ ॥
मुख्य (प्राकृत) भाषाओं का उपयोग या व्यवहार—
मागधी तु $^८$नरेन्द्राणामन्तः पुरसमाश्रया ।
चेटानां राजपुत्राणां $^९$श्रेष्ठिनाञ्चार्धमागधी ॥ ४९ ॥
१. विभाषा का लक्षण मृच्छटिक के प्राचीन टीकाकार पृथ्वोधर ने 'विविधाः
भाषा हीन-प्रयोज्यत्वात् विभाषाः' दिया है। अर्थात् नीचपात्रों के द्वारा
व्यवहार में आनेवाली विविध भाषाएं विभाषा कहलाती है। नाट्यशास्त्र
में विद्यमान विभाषाओं में शाकारी, ढक्की तथा चाण्डाली का प्रयोग
मृच्छकटिक में भी मिलता है। संभवतः भरत को अपने समय में इन
सभी विभाषाओं की उदाहरण रूप में उपलब्धि रही हो।
१. दैवी भाषा—क० । २. कार्यं—क० ।
३. शूरसेना—क०; सूरसेन्यर्धं—ख०; ग० ।
४. शबराभीर—ख०; ग० ।
५. सचरद्रमिडोद्भूजाः—ख०; द्रविडोड्ड्रजाः—ग० ।
६. वनचराणां—क० । ७. स्मृता—ग० ।
८. नराणाञ्चैवान्तःपुरनिवासिनाम्—क०; ग० । ९. श्रेष्ठीनां—ग० ।
अष्टादशोऽध्यायः ३४३
इनमें (से) राजा के अन्तःपुर (रनिवास) के रक्षक तथा सेवकों की
मागधी भाषा तथा राजपुत्र,१ चेट तथा श्रेष्ठिजन की अर्धमागधी भाषा
नियत रहनी चाहिए ॥ ४९ ॥
प्राच्या विदूषकादीनां १धूर्तानामप्यवन्तिजा ।
नायिकानां सखीनाञ्च २शूरसेन्यविरोधिनी ॥ ५० ॥
विदूषक२ तथा उसके सदृश पात्रों की प्राच्या भाषा तथा धूर्तवृत्ति के पात्रों
की 'अवन्ती भाषा' रखी जाए। यदि कोई अड़चन (या असुविधा) न हो
तो नायिका तथा उनकी सारी सखियों की शौरसेनी भाषा रखी जाए ॥५०॥
३योधनागरकादीनां दाक्षिणात्याथ दीव्यताम्४ ।
वाह्लीकभाषोदीच्यानां ५खसानाञ्च स्वदेशजा ॥ ५१ ॥
सैनिकों, (योध) जुआरियों, नगरमुख्य आरक्षक (नागरक) की
दाक्षिणात्या३ भाषा तथा भारत के उत्तर भाग के निवासी खसों की अपनी
देश भाषा वाह्लीकी रखी जाए ॥ ५१ ॥
१. राजपुत्र = सेवक क्षत्रिय, अर्थात् जो अन्तःपुर में सेवक हो तथा क्षत्रिय-
जाति के हों। श्रेष्ठि पात्र का संस्कृत भाषा या प्राकृत में संवाद प्राप्य
है। जैसे मुद्राराक्षस में चन्दनदास का प्राकृत में संभाषण। परन्तु
अर्धमागधी भाषा में इनके संभाषण (नियम) की किसी नाट्य-रचना
द्वारा पुष्टि नहीं मिलती।
२. विदूषक की मृच्छकटिक में 'प्राच्या' भाषा रखी गयी है तथा अन्य
लक्षण ग्रन्थों में भी विदूषक की प्राच्या भाषा रखने का नियम है।
विदूषक के शौरसेनी में या अन्य भाषा में संवाद नाट्य रचनाओं में
विरलता से ही प्राप्त हैं। अवन्तीभाषा का प्रयोग मृच्छकटिक में वीरक
और चन्दनक (अंक ६) एक पारस्परिक विवाद में करते हैं। अवन्ती
भाषा के अधिक प्राचीन नमूने तथा विशेष-विवरण आदि रूपकों में
नहीं मिलते।
३. मृच्छकटिक में चन्दनक की भाषा दाक्षिणात्या है ऐसा पृथ्वीधर का
मत है। दाक्षिणात्या के स्वरूप के बारे में अन्यत्र कहीं से भी अधिक
ज्ञात नहीं होता है।
१. योज्या भाषा अवन्तिजा—ग० ।
२. सुरसेना विरोधिनी—ख०; सौरसेन्य—ग० ।
३. योध—ख०; योधनागरिकादीनां—ग०। ४. दीप्यताम्—क० ।
५. खषाणां च स्वदेशजा—; स्वसानाञ्चैव भूमिषु—क० ।
३४४ नाट्यशास्त्रम्
विभाषाओं (या उपभाषाओं) का उपयोग—
१शकाराणां शकादीनां तत्स्वभावश्च यो गणः ।
शकार² भाषा योक्तव्या ³चाण्डाली ४पुल्कसादिषु ॥ ५२ ॥
शकार, शक, तथा (शबर जाति के या) उसके अनुरूप स्वभाववाले
वर्गों (गणः) की शाकारी भाषा रखी जाए तथा पुल्कस डोम और इसके
समान अन्य नीच जातियों की 'चाण्डाली' भाषा रखी जाए ॥ ५२ ॥
५अङ्गार-कारक-व्याधकाष्ठयन्त्रोपजीविनाम्६ ।
योज्या७ शकारभाषा तु किञ्चिद्वानौकसी तथा ॥ ५३ ॥
कोयलों के व्यवसायी, बहेलिये (व्याध), लकड़ी और पत्तों को जंगल
से ढोकर अपनी जीविका चलाने वाले श्रमिक जैसे पात्रों की तथा जंगल के
निवासीजन की भी शाबरी (शाकारी) भाषा रखनी चाहिए ॥ ५३ ॥
८गजाश्वाजाविकोष्ट्रादिघोषस्थाननिवासिनाम् ।
आभीरोक्तिः शाबरी वा९ द्रामिडी १०वनचारिषु ॥ ५४ ॥
जहां हाथी, घोड़े, बकरे, भेड़, ऊंट या बैल गायों को बांधा या रखा
जाता हो—उन स्थानों के निवासियों की आभीरी२ या शाबरीभाषा रखी
जाए तथा द्रविड़ आदि देशों के व्यक्तियों या वनवासियों की 'द्राविड़ी' भाषा
रखी जाती है ॥ ५४ ॥
१. मृच्छकटिक में ही शकार ऐसा उपलब्ध पात्र है और उसीकी शाकारी
भाषा भी प्रयुक्त हुई है। इसके अतिरिक्त चाण्डालों द्वारा चाण्डाली भाषा
का (भी) व्यवहार इसी प्रकरण में मिल जाता है ।
२. आभीरी और द्राविड़ीभाषा के रूप उपलब्ध संस्कृत रूपकों में नहीं
मिलते, हो सकता है कि यह कोई द्राविड़ी बोली होगी, शायद यह
उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों की भी बोली हो—जैसा कि भाषाविदों
का अनुमान है ।
१. शकार—घोषकादीनां—क०; शवराणां शकादीनां—ख०; ग० ।
२. सकार—क० । ३. पाञ्चाली—ख०; ग० ।
४. पुत्कसादिषु—क० । ५. कारव्याधानां—ख०; ग० ।
६. पत्रयन्त्रोप—क० । ७. ज्ञेया शबरभाषा तु—ख० ।
८. गवाश्वाजाविकोष्ट्रादि—ख० ।
९. स्यात्—क० । १०. द्रिमिलादिषु—ख० ।
अष्टादशोऽध्यायः ३४५
सुरङ्गखनकादीनां ^२सन्धिकांराश्वरक्षताम् ।
^३व्यसने नायकाञ्चाप्यात्मरक्षासु ^४मागधी ॥ ५५ ॥
जो सुरंग आदि के खोदनेवाले कमकर हों, जेलों के पहरेदार, घोड़े के
साईस (या ऊंट के रेवारी) हो या किसी आपत्ति में ग्रस्त नायक या उसके
समान दूसरे पात्र हो तो अपने स्वरूप के रक्षणार्थ या आच्छादनार्थ उनके
‘मागधी’ भाषा में संवाद रखे जाते हैं ॥ ५५ ॥
विभिन्न देशभाषाओं के विभेदक लक्षण—
गङ्गासागरमध्ये तु ये देशाः ^५सम्प्रकीर्तिताः ।
^६एकारबहुलां भाषां तेषु तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५६ ॥
भारत के गंगा नदी और सागर के मध्यवर्ती प्रदेशों की ‘एकार’ बहुलता
वाली भाषा रखी जाए ॥ ५६ ॥
विन्ध्यसागरमध्ये तु ये देशाः श्रुतिमागताः ।
^७नकारबहुलां तेषु भाषां तज्ज्ञः प्रयोजयेत् ॥ ५७ ॥
जो संभाग विन्ध्याचल पर्वत और सागर के मध्यवर्ती हों उनकी भाषा
‘न’ कार की बहुलता वाली रहनी चाहिए ॥ ५७ ॥
^८सुराष्ट्रावन्तिदेशेषु वेत्रवत्युत्तरेषु च ।
ये देशास्तेषु कुर्वीत ^९चकारप्रायसंश्रयाम् ॥ ५८ ॥
वेत्रवती नदी के उत्तरवर्ती प्रदेशों तथा सौराष्ट्र और अवन्ती देशों की
‘च’ कारबहुल भाषा रहनी चाहिए ॥ ५८ ॥
१. सुरङ्गाखनकादीनां—ख०; सुरङ्गवनकादीनां—ग० ।
२. ओष्ट्रिकाऽरसरक्षसाम्—क०; औष्ट्रिकानाञ्च रक्षताम्—ग० ।
३. नायिकादीनां—ग० ।
४. योजयेत्—क० । अस्मादनन्तरं क० पुस्तके 'न बर्बर किरातान्ध्र'
इत्यादिपद्यं पुनरपि पठ्यते ।
५. सम्प्रवर्तिताः—क० ।
६. षकार—क० ।
७. तकार—शकार—क० ।
८. वेत्रवत्यन्तरेषु च—ग० ।
९. चकार बहुलामिह—ख०; ग० ।
३४६ नाट्यशास्त्रम्
हिमवत्-सिन्धुसौवीरान् ये¹ जनाः समुपाश्रिताः ।
²उकारबहुलां ³तज्ज्ञस्तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥ ५९ ॥
वे लोग जो हिमाचल पर्वत, सिन्धु तथा सौवीर देश के (समीपवर्ति
प्रदेशों के) निवासी हों उनकी 'य' कार बहुल भाषी रखी जाए ॥ ५९ ॥
⁴चर्मण्वती नदीतीरे ये ⁵चार्बुदसमाश्रयाः ।
⁶ओकारबहुलां नित्यं तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥ ६० ॥
वे लोग जो चम्बल (चर्मण्वती) नदी के उस पार अरावली पर्वत
(मेवाड़ तथा मारवाड़ आदि प्रदेशों) के समीपवर्ती प्रदेश के निवासी
हों तो उनकी 'आ' (या 'त') कार बहुल भाषा रखनी चाहिए ॥ ६० ॥
एवं भाषाविधानन्तु कर्तव्यं नाटकाश्रयम् ।
अत्र नोक्तं मया यत्तु लोकाद् ग्राह्यं बुधैस्तु तत् ॥ ६१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे भाषाविधानं ⁷नामाष्टादशोऽध्यायः ।
नाटक में रहने वाली विभिन्न भाषाओं के ये ही नियम हैं। इसमें जो
बात कहने में न आई हों उन्हें लोकाचार या सामान्य व्यवहार से लिया जा
सकता है ॥ ६१ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का भाषाविधान नामक अठारहवां अध्याय सम्पूर्ण ।
१. ये च देशाः समाश्रिताः—ख; येऽन्यदेशसमाश्रिताः—ग० ।
२. ओकार—क० । ३. तेषु नित्यं भाषां प्रयोजयेत्—ग० ।
४. सरस्वतीनदीतीरे पारियात्राबुंदाश्रिताः—क०; चर्मण्वती नदीपारे—ख० ।
५. समाश्रिताः—ख० । ६. तकार—क; ख० ।
७. क० ख० पुस्तकयोस्तु नात्राध्यायसमाप्तिः ।
एकोनविंशोऽध्यायः
सम्बोधन तथा काकुस्वर-व्यंजनाध्याय
सम्बोधन शब्दावली प्रयोग विधान—
एवं भाषाविधानन्तु मया¹ प्रोक्तं द्विजोत्तमाः।
पुनर्वाक्यविधानन्तु² लौकिकं सन्निबोधत ॥ १ ॥
उत्तमैर्मध्यमैर्वाच्यैर्ये सम्भाष्या यथा नराः ।
³समानोत्कृष्टहीनाश्च नाटके तान्निबोधत ॥ २ ॥
मुनियो, मैंने नाट्यरचना में प्रयुक्त की जाने वाली विविध भाषाओं के
नियम बतलाए। अब मैं लौकिकवाक्यों में व्यवहार किये जाने वाले उत्तम,
मध्यम तथा अधम पात्रों के द्वारा उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों को
सम्बोधित किये जाने वाले नियत शब्द तथा उनके प्रयोग के विधान¹ को
बतलाता हूं ॥ १-२ ॥
देवता, गुरुजन तथा विद्वानों के लिए सम्बोधन शब्द—
देवानामपि ये देवा महात्मानो महर्षयः।
भगवन्निति ते वाच्या ⁴यास्तेषां योषितस्तथा ॥ ३ ॥
जो देवताओं में भी श्रेष्ठतम स्थान लिए हुए देवगण हों, महात्मागण
तथा महर्षि हों तो उन्हें “भगवन्”² शब्द से तथा उनकी पत्नियों को भी
इसी प्रकार ( 'भगवती' शब्द से ) सम्बोधित करना चाहिए ॥ ३ ॥
१. संस्कृत तथा प्राकृत नाट्यरचनाओं में होने वाले सभी व्यवहार तथा
तदुचित सम्बोधन इस अध्याय में पूर्ण रूप से भरत द्वारा नहीं बतलाए
गए। केवल कुछ सम्बोधन शब्द ही समझाने के लिये दिये गए हैं।
परवर्ती नाट्यशास्त्रीय रचनाओं में भी उक्त विषय पर थोड़ा बहुत
परिवर्तित उल्लेख ही प्राप्त होता है ।
२. जैसे शाकु० ( ४ अ० ) में काश्यप को दिया गया सम्बोधन । इत्यादि ।
१. यथावद्द्विजसत्तमाः—क० ।
२. प्रचारन्तु—ख०; विचारं तु—ग० ।
३. समानो वाल्पहीनो वा—क० ।
४. याश्चैषां—क; यास्तासां—ख० ।
३४८ नाट्यशास्त्रम्
देवाश्च लिङ्गिनश्चैव नानाश्रुतधराश्च ये१।
भगवन्निति ते वाच्याः पुरुषैः स्त्रीभिरेव च ॥ ४ ॥
इसी प्रकार जो १देवता, संन्यासी वेशधारी साधुजन तथा विविध शास्त्रों
के विद्वान् हों उन्हें भी पुरुष या स्त्रियों के द्वारा 'भगवन्' शब्द से सम्बोधित
किया जाए ॥ ४ ॥
ब्राह्मण के लिए सम्बोधन शब्द—
आर्येति ब्राह्मणं ब्रूयात् ,
ब्राह्मणों को 'आर्य'२ शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
राजा के लिए सम्बोधन शब्द—
महाराजेति २पार्थिवम् ।
राजा को 'महाराज'३ शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
गुरु तथा शिक्षक आदि के लिये सम्बोधन शब्द—
उपाध्यायेति चाचार्यं वृद्धं तातेति चैवहि ॥ ५ ॥
उपाध्याय या शिक्षक को ४'आचार्य' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए
और बूढ़े मनुष्य को 'तात'५ ( बाबा ) शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥५॥
ब्राह्मण द्वारा राजा के प्रति सम्बोधन शब्द—
३नाम्ना राजेति वा वाच्या ब्राह्मणेस्तु नराधिपाः ।
तत्क्षाम्यं हि ४महीपालैर्यस्मात् पूज्या द्विजाः५ स्मृताः ॥ ६ ॥
ब्राह्मणों के द्वारा राजा को६ उसीका नाम लेकर या अन्य शब्द से
१. उदाहरणार्थ—अविमारक ना० (भास) में अग्नि और वरुण के सम्बोधन
तथा माल० वि० नाटक (कालि०) में परिव्राजिका का सम्बोधन ।
२. जैसे मध्यम व्यायोग में भीम को ब्राह्मणोचित सम्बोधन दिया गया है ।
३. जैसे प्रतिमा में दशरथ को सुमन्त्र द्वारा महाराज शब्द से दिया गया
सम्बोधन ।
४. जैसे मुद्राराक्षस में चाणक्य का शिष्य द्वारा उपाध्याय पद से सम्बोधन ।
५. जैसे प्रतिमा में सुमन्त्र का भरत को तात शब्द से सम्बोधन ।
६. जैसे मुद्रारा० में चन्द्रगुप्त को चाणक्य द्वारा दिये गए सम्बोधन ।
१. इमश्रुधराश्च—क०; श्रुतिधराश्च ये—ग० ।
२. पार्थिवः—क० । ३. छन्दतो नामभिर्वाच्या—ख०; ग० ।
४. तु—ख० । ५. द्विजोत्तमाः—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३४९
उनकी इच्छानुसार सम्बोधित किया जाए तथा राजाओं को भी ब्राह्मणों को
पूज्य मान कर ऐसे सम्बोधन किये जाने पर उन्हें क्षमा करना चाहिए ॥६॥
ब्राह्मण का मन्त्री के प्रति सम्बोधन शब्द—
ब्राह्मणैः १सचिवो वाच्यो ह्यमात्य सचिवेति वा२ ।
शेषैरन्यजनैर्वाच्यो हीनैरार्येति नित्यशः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणों के द्वारा मन्त्री को “अमात्य” तथा “सचिव” शब्द से
सम्बोधित किया जाए तथा अन्य अधम तथा छोटे पद धारी पात्रों के द्वारा
उन्हें 'आर्य' शब्द से सदा सम्बोधित किया जाए ॥ ७ ॥
समान अवस्था के व्यक्तियों के प्रति सम्बोधन—
समैः सम्भाषणं कार्यं येन नाम्ना स संज्ञितः ।
-समान वयस्कों द्वारा जिसका जो नाम हो उसे उसी नाम से सम्बोधित
किया जाए१।
हीन अवस्था के व्यक्तियों से सम्बोधन शब्द—
हीनैः३ सपरिवारन्तु नाम्ना सम्भाष्य उत्तमः ॥ ८ ॥
अधम पात्र के द्वारा उत्तम पुरुष को उसका नाम४ लेकर सम्बोधित
किया जाए (जब कि वह ऐसा करने की असामान्य अवस्था रखे) ॥ ८ ॥
सेवक, शिल्पी आदि के लिये संबोधन—
४नियोगाधिकृतश्चैव पुरुषाः योषितस्तथा ।
५सेवकाः शिल्पिनश्चैव सम्भाष्यास्ते तथैव हि ॥ ९ ॥
१. इस नियम के अनुसार नाट्यरचनाओं में सम्बोधन अधिक मिलते
नहीं हैं।
२. जैसे राक्षस को आर्य के अतिरिक्त प्रतीहारी का अमात्य सम्बोधन
करना। (दे० मुद्रा० रा०)
३. जैसे मुद्राराक्षस में चाणक्य का राक्षस को दिया गया सम्बोधन।
४. जैसे चारुदत्त द्वारा अपनी सेविका को उसका नाम लेते हुए (यथा —
रदनिके) सम्बोधित करना।
१. सचिवैर्वाच्यं—क०; सचिवैर्भाष्यो—ख०। २. वै—क०।
३. सपरिचारं तु वाच्यं नामोत्तमस्य तु—क०; सपरिहारं तु—ख०; ग०।
४. नियोगाधिकृता ये तु याः स्त्रियः पुरुषास्तथा—ख०; ग०।
५. कारुकाः—क०; कारकाः—ग०।
३५० | नाट्यशास्त्रम्
जो पुरुष या स्त्रीपात्र नौकर हों उन्हें तथा कलाकार¹ ( शिल्पी ) या
उसकी पत्नी आदि को उनके स्थिति व्यवसाय या पदानुसार सम्बोधित किया
जाए ॥ ९ ॥
मान्यो¹ भावेति वक्तव्यः किञ्चिदूनस्तु मार्षकः ।
सामान्य पुरुष को 'माघ'² तथा उससे कम स्थिति वाले पुरुष को
'मारिष' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
समान अवस्थावालों के सम्बोधन—
'समानोऽथ वयस्येति हं³ हो हण्डेति चाधमः ॥ १० ॥
समान अवस्था वाले पुरुष एक दूसरे को 'वयस्य'³ शब्द से तथा अधम
पुरुष को 'हंहो' शब्द से सम्बोधित करें ॥ १० ॥
सूत का रथी पुरुष को सम्बोधन—
आयुष्मन्निति वाच्यस्तु रथी ⁴सूतेन सर्वदा ।
सूत के द्वारा रथ में स्थित पुरुष को 'आयुष्मन्'⁴ शब्द से सम्बोधित
किया जाए ।
⁵तपस्वीति प्रशान्तस्तु साधो इति च शब्द्यते ॥ ११ ॥
तपस्वी और प्रशान्त स्वभाव के व्यक्ति को⁵ 'साधो' शब्द से सम्बोधित
किया जाए ॥ ११ ॥
१. जैसे माल० वि० नाट० में राजा को हरदत्त द्वारा किया गया सम्बोधन
( माल० वि० २।१२।४ ) ।
२. जैसे शकार का 'विट' को 'भाव शब्द से सम्बोधन करना व जैसे
अवि० ना० ( भास ) में सूत्रधार का पारिपार्श्विक को 'मारिष'
सम्बोधन ।
३. जैसे मुद्रा० रा० नाटक में सामिद्धार्थक और सुसमिद्धार्थक के परस्पर
सम्बोधन तथा चाणक्य का शिष्य को 'हं हो ब्राह्मण' सम्बोधित करना ।
४. जैसे—शाकु० में ( अंक २ ) में सूत का दुष्यन्त को सम्बोधन तथा शा०
( अं० ५ ) में पुरोहित का दोनों तपस्वी कुमारों को सम्बोधन करना ।
५. 'साधु' शब्द द्वारा सम्बोधित करने का उल्लेख सम्प्रति किन्हीं नाटकों में
प्राप्त नहीं होता ।
१ मार्षो—क० । २. समानो हि—ख; ग० ।
३. होहं वा इति वाधमः—ग० । ४. सूते तु सर्वथा—क० ।
५. तपस्वी च प्रशान्तश्च साधो इति हि शब्द्यते—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५१
सेवकों का राजकुमार के प्रति सम्बोधन—
स्वामीति युवराजस्तु कुमारो भर्तृदारकः ।
सेवकों के द्वारा युवराज राजकुमार को 'स्वामी' शब्द से तथा शेष
राजकुमारों को 'भर्तृदारक' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
सौम्य भद्रमुखेत्येवं हे पूर्वश्चाधमं वदेत् ॥ १२ ॥
अधम पात्र को हे ( अरे ) शब्द को पूर्व में प्रयुक्त करते हुए “सौम्य”२
या 'भद्रमुख' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १२ ॥
यद्यस्य कर्म शिल्पं वा विद्या वा जातिरेव वा ।
स तेन नाम्ना १सम्भाष्यो नाटकादौ२ प्रयोक्तृभिः ॥ १३ ॥
नाटक में जिस व्यक्ति का जो कार्य, हुनर ( शिल्प ) विद्या, जाति, जन्म
( कुल ) या उसकी अवस्था या स्थिति हो तो उसके अनुरूप ही उसे उसी
नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १३ ॥
वत्स पुत्रक तातेति नाम्ना गोत्रेण वा पुनः ।
वाच्यः शिष्यः सुतो वापि पित्रा३ वा ४गुरुणापि वा ॥ १४ ॥
१. इस प्रकार 'स्वामी' शब्द से युवराज को सम्बोधित करने के बजाय
नाटकों में प्रायः राजा को सम्बोधन करना प्राप्त होता है। जैसे स्वप्न-
वासवदत्त में यौगन्धरायण का उदयन को सम्बोधित करना, आदि ।
इसी प्रकार युवराज या राजकुमार के लिये एक सामान्य शब्द का प्रयोग
मिलता है। जैसे प्रतिमा में प्रतिहारी राम को भर्तृदारक शब्द से सम्बोधित
करती है, स्वामि शब्द से नहीं । ( दे० प्र० ना० १।२।९ ) । हां, इस
सन्दर्भ में 'कुमार' शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाना अवश्य मिलता
है। जैसे प्रतिमा अं० ३ में भरत का सम्बोधन तथा इसी प्रकार मुद्रा०
रा० में मलयकेतु को भी । 'सौम्य' शब्द का नाटकों में प्रयोग कम
मिलता है पर भद्र या भद्रमुख शब्द का प्रयोग यत्र तत्र अवश्य मिलता
है। जैसे प्रतिमा और शाकु० में ।
२. इस नियम के अधिक उदाहरण नहीं मिलने पर इसका उदाहरण
मृच्छ क० में चारुदत्त के पुत्र द्वारा चाण्डालों को किया गया सम्बोधन
कदाचित् हो सकता है ।
१. भाष्यो हि—क० । २. नाटिकादिषु योक्तृभिः क० ।
३. नाटके नाट्यकोविदैः—क० । ४. गुरुणाथवा—ग० ।
३५२ नाट्यशास्त्रम्
अपने शिष्य या पुत्र को गुरु के द्वारा वत्स, पुत्र, तात या उसके गोत्र
या नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १४ ॥
सम्भाष्या शाक्यनिर्ग्रन्था ¹भदन्तेति प्रयोक्तृभिः ।
बौद्ध तथा जैन साधुओं को 'भदन्त' शब्द से सम्बोधित करना
चाहिये ।
आमन्त्रणैस्तु पाषण्डा शेषाः² स्वसमयाश्रितैः ॥ १५॥
अन्य पाशुपत आदि सम्प्रदाय के साधुओं को उनके अपने नियमानुसारि
सम्बोधनों से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १५ ॥
देवेति नृपति र्वाच्यो भृत्यैः ³प्रकृतिभिस्तथा ।
भट्टेति सार्वभौमस्तु नित्यं परिजनेन ⁴तु ॥ १६ ॥
राजा को अपने प्रजाजन तथा सेवकों के द्वारा 'देव' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए । परन्तु यदि यही सार्वभौम राजा हो तो सदा इसे 'भट्ट' या
'भर्ता' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १६ ॥
राजन्नित्यृषिभिर्वाच्यो ह्यपत्यप्रत्ययेन वा ।
वयस्य राजन्निति वा भवेद्वाच्यो महीपतिः ॥ १७ ॥
विदूषकेन राज्ञी च चेटी⁵ च भवतीत्यपि ।
नाम्ना वयस्येत्यपि वा राज्ञा वाच्यो विदूषकः ॥ १८ ॥
ऋषिगण के द्वारा राजा को उसके कुलागत नाम (जैसे पुरुवंश के
लिए “पौरव” शब्द) द्वारा सम्बोधित करना चाहिए और विदूषक के
द्वारा राजा को “वयस्य” तथा 'राजन्' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
तथा इसी (विदूषक) के द्वारा महारानी तथा उनकी दासियों को
'भवती' शब्द से सम्बोधित किया जाए तथा राजा भी विदूषक को उसके
नाम या फिर 'वयस्य' शब्द से सम्बोधित करे ॥ १७-१८ ॥
सर्वस्त्रीभिः पतिर्वाच्यः आर्यपुत्रेति यौवने ।
⁶अन्यदा पुनरार्येति महाराजेति भूपतिः ॥ १९ ॥
१. भद्रं ते—क० ।
२. शेषां स्वयमुपागतैः—ख०; शेषास्तु समयाश्रितैः—ग० ।
३. परिजनेन वा—क० । ४. हि—ख०; ग० ।
५. चेट्या च—ख०; ग० ।
६. पद्यार्धमेतत् ख० पुस्तके नास्ति ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५३
सभी स्त्रियों को यौवन में अपने पति को 'आर्यपुत्र' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए। परन्तु कुछ अवस्थाओं में पति को केवल 'आर्य' शब्द से भी
सम्बोधित किया जा सकता है। यदि पति राजा हो तो उसे महारानी द्वारा
'महाराज' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १९ ॥
आर्येति पूर्वजो भ्राता वाच्यः पुत्र इवानुजः¹।
पुरुषाभाषणं ह्येवं कार्यं नाट्ये प्रयोक्तृभिः ॥ २० ॥
बड़े भाई को 'आर्य' शब्द से तथा छोटे भाई को अपने पुत्र के समान
उपयुक्त शब्द द्वारा सम्बोधित करना चाहिए । पुरुष पात्रों के द्वारा नाटकों
में सम्बोधन का यही विधान है ॥ २० ॥
पुनः स्त्रीणां ²प्रवक्ष्यामि यथाभाष्यास्तु नाटके ।
तपस्विन्यो देवताश्च वाच्या भगवतीति च ॥ २१ ॥
अब मैं स्त्रियों के द्वारा स्त्रियों के प्रति नाटक में किये जाने वाले
सम्बोधन शब्द बतलाता हूँ। तपस्वी स्त्रियाँ तथा देवी को 'भगवती' शब्द से
सम्बोधित किया जाए ॥ २१ ॥
³गुरुभार्या तु वक्तव्या स्थानीया भवतीति च ।
पूज्य गुरुजन की पत्नियों या अन्य ज्येष्ठावस्था की स्त्रियों ( स्थानीय )
को 'भवती' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
ग्राम्या⁴ च भद्रेति वाच्या⁵ वै ⁶वृद्धाम्बेति च नाटके ॥ २२ ॥
पहुंच या भेंट के उपयुक्त ग्रामीण स्त्री ( ग्राम्या ) को 'भद्रे' तथा बूढ़ी
स्त्री को 'अम्बा' ( माता शब्द से भी ) शब्द से सम्बोधित करना
चाहिए ॥ २२ ॥
महारानी के प्रति सम्बोधन शब्द—
⁷राजपत्नस्तु सम्भाष्याः सर्वाः परिजनेन वै ।
भट्टिनी स्वामिनी ⁸देवीत्येवं वै नाटके बुधैः ॥ २३ ॥
१. अस्मादनन्तरं—योषिद्भिरथ काम्येति राजपुत्रेति योधनैः । इति
पद्यार्धमधिकं क—पुस्तके दृश्यते ।
२. स्त्रीणाञ्च वक्ष्यामि संभाषां नाटकाश्रयाम्—ग० ।
३. गुरुरायेति—क० । ४. गम्या—क० ।
५. वक्तव्या—ख०; ग० । ६. वृद्धा वाच्येति नाटके—ग० ।
७. राजपुत्र्यस्तु—क०; राजपत्न्यश्च—ग० ।
८. स्वामिनीत्येवं सर्वदा—क०; देवी इत्येवं—ख०; ग० ।
२३ ना० शा० द्वि०
३५४ नाट्यशास्त्रम्
नाटक में राज पत्नियों को सेवक तथा परिचारिकाओं के द्वारा भट्टिनी,
स्वामिनी तथा देवी शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २३ ॥
देवीति महिषी वाच्या राज्ञा परिजनेन वा ।
भोगिन्यः १परिशिष्टास्तु स्वामिन्य इति वा पुनः ॥ २४ ॥
इनमें पटरानी को 'देवी' शब्द से परिजन तथा राजा के द्वारा भी
सम्बोधित किया जाए । राजा की शेष पत्नियों को परिजन 'भट्टिनी' या
'स्वामिनी' शब्द से सम्बोधित करे ॥ २४ ॥
राजकुमारियों के लिये सम्बोधन—
२कुमार्य्यश्चैव वक्तव्याः प्रेष्याभिर्भर्तृदारिकाः ।
अविवाहित राजकुमारियों को (उनकी) दासियां 'भर्तृदारिका' शब्द से
सम्बोधित करें ।
स्वसेति भगिनी वाच्या ३वत्सेति च यवीयसी ॥ २५ ॥
बड़ी बहिन को 'भगिनी' तथा छोटी बहिन को 'वत्से' शब्द से
सम्बोधित करना चाहिए ॥ २५ ॥
ब्राह्मणी, भिक्षुणी, आदि के सम्बोधन शब्द—
ब्राह्मण्यार्येति वक्तव्या लिङ्गस्था व्रतिनी च या ।
ब्राह्मणी, साधुनी या व्रतधारिणी स्त्री को 'आर्या' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ।
पत्नी के प्रति सम्बोधन शब्द—
पत्नी चार्येति सम्भाष्या ४पितृनाम्ना सुतस्य वा५ ॥ २६ ॥
अपनी धर्मपत्नी को 'आर्या' शब्द से या पिता और पुत्र के नाम से
सम्बद्ध करते हुए शब्दों से सम्बोधित किया जाए ॥ २६ ॥
स्त्रियों के अपनी सखियों के प्रति सम्बोधन—
समानाभिस्तथा सख्यः६ हलेति स्यात् परस्परम् ।
१. भट्टिन्यः इति शेषास्तु— ख०; ग० ।
२. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
३. ज्येष्ठा वत्सेति चानुजा—ख०; ग० ।
४. पितुर्नाम्ना—ख०; ग० । ५. सा—ख०; ग० ।
६. सख्यो हला भाष्याः परस्परम्—ख०; ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५५
स्त्रियों की जो हमजोल या समवयस्का सखियाँ हों उन्हें वे परस्पर
'हला' शब्द से सम्बोधित करें।
स्त्रियों के दासी के प्रति सम्बोधन शब्द—
प्रेष्या हञ्जेति वक्तव्या स्त्रिया¹ यत्तूत्तमा भवेत् ॥ २७ ॥
उत्तम स्त्रियों के द्वारा सेविका या दासी को 'हंजे' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २७ ॥
वेश्या के प्रति सम्बोधन शब्द—
अज्जुकेति च² वक्तव्या वेश्या परिजनेन च ।
³अत्तेति गणिकामाता वाच्या ⁴परिजनेन हि ॥ २८ ॥
वेश्या को उसके परिचारक, सेवक आदि के द्वारा 'अज्जुका' शब्द से
सम्बोधित किया जाए और जब यही वृद्धा हो तो 'अत्ता' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २८ ॥
प्रणयावस्था में पत्नी के लिये सम्बोधन शब्द—
प्रियेति भार्या शृङ्गारे वाच्या राज्ञेतरेण वा ।
पुरोधः सार्थवाहानां ⁵भार्यास्त्वार्येति सर्वदा ॥ २९ ॥
प्रणयावस्था में राजा के अतिरिक्त सभी पुरुष पत्नी को 'प्रिये' शब्द से
सम्बोधित करें परन्तु पुरोहित और सार्थवाह की पत्नी को सदा 'आर्ये'
शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २९ ॥
नाटक में पात्रों के नाम एवं उनकी विधि—
⁶तल्लिङ्गार्थानि नामानि कार्याणि कविभिः सदा⁷।
औत्पत्तिकानि यानि ⁸स्युरप्रख्यातानि नाटके ॥ ३० ॥
नाट्यकार को नाटक में अप्रख्यात पात्रों के ऐसे नाम जो कल्पित हों तो
वे उनके गुण आदि से सम्बद्ध यौगिक रूप में ही रखना चाहिए ॥ ३० ॥
१. स्त्रियो या तूत्तमा—ख०; ग० ।
२. भवेद्वाच्या—ख०; भवेद्वेश्या वाच्या परिजनेन तु—ग० ।
३. या त्वत्र वृद्धा सा त्वत्ता भाष्या परिजनेन तु—क० ग० ।
४. नाट्यजनेन—ख०; ग० । ५. नार्यस्त्वार्येति—ग० ।
६. तच्चिप्सार्थानि—क०; तल्लिङ्गस्थानि—ग० ।
७. द्विजाः—क०; ख० ।
८. स्युनं प्रत्याख्याति क; न प्रत्याख्यानि—ख०; ग० ।
३५६ नाट्यशास्त्रम्
ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्र के नाम—
'ब्रह्मक्षत्रस्य नामानि 'गोत्रकर्मानुरूपतः ।
काव्ये कार्याणि कविभिः 'शर्मवर्मकृतानि हि ॥ ३१ ॥
इनमें भी ब्राह्मण तथा क्षत्रिय पात्रों के नाम उनके गोत्र तथा कर्म के
अनुरूप रखे जाएँ तथा उनके अन्त में शर्मन् या वर्मन् शब्द को रखा
जाए ॥ ३१ ॥
वैश्य तथा शूरों के नाम—
दत्तप्रायाणि नामानि वणिजां 'सम्प्रयोजयेत् ।
शौर्योदात्तानि नामानि तथा शूरेषु ' योजयेत् ॥ ३२ ॥
वैश्य पात्र के नाम 'दत्त' शब्द से युक्त और शूरों के नाम उनके शौर्य,
औदार्य आदि गुणों के सूचक रहने चाहिए ॥ ३२ ॥
रानियों तथा वेश्या के नाम—
विजयार्थानि नामानि 'राजस्त्रीणाञ्च नित्यशः ।
दत्ता' मित्रा च सेना च वेश्यानामानि' योजयेत् ॥ ३३ ॥
राज-पत्नियों के नाम विजय परक अर्थ के सूचक रखने चाहिए तथा
वेश्याओं के नाम दत्ता, मित्रा तथा सेना शब्दान्त रखे जाएं ॥ ३३ ॥
दासी (प्रेष्या) के नाम—
नाना कुसुमनामानः प्रेष्याः कार्यास्तु नाटके ।
नाटक में प्रेष्याओं (दासियों) के नाम विविध पुष्पों पर रखे जाएं ।
चेट के नाम—
मङ्गलार्थानि नामानि चेटानामपि योजयेत् ' ॥ ३४ ॥
'चेट' (आदि) के नाम मंगलार्थ को लिए हुए रखे जाएं ॥ ३४ ॥
१. ब्राह्मक्षत्रस्य—ग० । २. धर्मकर्मा—क० ।
३. शमंवर्मेति तानि हि—क० । ४. शर्मवर्मेति तानि हि—क० ।
५. अस्मादनन्तरं—कापालिकास्तु घण्टान्तनामानः समुदाहृताः ।' इति
पद्यार्धमधिकं प्रक्षिप्तञ्च क—पुस्तके वर्तते ।
६. शूरै प्रयोजयेत्—क० ।
७. राजस्त्रीणाञ्च कारयेत्—ख; राज्ञां स्त्रीणाञ्च कारयेत्—ग० ।
८. दत्तां मित्राञ्च सेनाञ्च—क० ।
९. वेश्यामित्राणि कारयेत्—क० । १०. कारयेत्—ग० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५७
उत्तम पात्रों के नाम—
गम्भीरार्थानि नामानि १ह्युत्तमानां प्रयोजयेत् ।
२यस्मान्नामानुसदृशं कर्म तेषां भविष्यति ॥ ३५ ॥
उत्तम पात्रों के नाम किसी गम्भीर अर्थ के सूचक रखे जाए क्योंकि
उनके कार्य उनके नाम के अनुरूप ही नाटकादि में रहते हैं ॥ ३५ ॥
अन्य पात्रों के नाम—
जातिचेष्टानुरूपाणि शेषाणामपि ३योजयेत् ।
नामानि पुरुषाणाञ्च ४ स्त्रीणाञ्चोक्तानि तत्त्वतः ॥ ३६ ॥
एवं ५नामविधानन्तु कर्तव्यं कविभिः६ सदा ।
( इसके अतिरिक्त ) शेष पात्रों के नाम उनके जन्म, जाति तथा कार्य
के अनुसार रखना चाहिए ।
इस प्रकार स्त्री तथा पुरुषों के नाटक में रहने वाले नामों का मैंने
औचित्यपूर्ण वर्णन कर दिया ।
नाट्यकार को अपनी रचना में इसी विधान के अनुसार पात्रों के नाम१
रखने चाहिए ॥ ३६-३७ ॥
एवं ७भाषाविधानन्तु ज्ञात्वा कर्माण्यशेषतः८ ॥ ३७ ॥
ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत ९षडलङ्कारसंयुतम्१० ।
१. यद्यपि नाट्य शास्त्र में सम्बोधन एवं नाम रखने के विविध नियम
बतलाए परन्तु इनके अनुसार सम्बोधन वर्तमान नाट्यरचनाओं में
उपलब्ध नहीं होते । इससे प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्रीय अध्ययन
या प्राचीन शास्त्रीय परिपाटी की शिथिलता ही इसमें मूलभूत कारण
हुई । यह भी हो सकता है कि इन नियमों की अधिक अपेक्षा न रहने
के कारण ही शायद उपेक्षा की गई हो ।
१. योजयेदुत्तमेषु च—ख०; ग० । २. कस्मान्नामानु—क० ।
३. कारयेत्—ख०; ग० । ४. पुरुषाणान्तु—ख०; ग० ।
५. नामाभिधानन्तु—ग० । ६. कविभिस्त्वथ—ग० ।
७. भाषाविधानानि-क०; भाषाविधानादि ज्ञात्वा सर्वमशेषतः — ख०; ग० ।
८. पद्यार्धस्यास्य पाठान्तरं क—( भ. ) पुस्तके—'भाषाविधानं विज्ञेयं
ततः प्रकृतिसम्भवम् ।' इति ।
९. संश्रयम् — क० ।
१०. ततः पाठचस्य वक्ष्यामि गुणांश्च द्विजसत्तमाः । स्वरै षड्जादिभिर्युक्तं
नानारससमन्वितम् । क० ( ? )
३५८ नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार विस्तारपूर्वक भाषा विधान आदि को ठीक तरह से
जानकर नाट्यकार को छः अलंकारों से युक्त 'पाठ्य' की योजना करनी
चाहिए ॥ ३७-३८ ॥
पाठ्य के गुण एवं स्वरूप—
पाठ्यगुणानिदानीं वक्ष्यामः । तद्यथा—सप्तस्वराः, त्रीणि
स्थानानि, चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकुः, षडलङ्काराः षडङ्गानीति ।
एषामिदानीं १लक्षणमभिव्याख्यास्यामः । तत्र सप्तस्वराः नाम-षड्ज-
र्षभ गान्धार मध्यमपञ्चम धैवत निषादाः । त एते रसेषूपपाद्याः । यथा—
अब मैं 'पाठ्य' के गुणों का वर्णन करता हूँ। इसमें सात स्वर, तीन
स्थान, चार वर्ण, दो प्रकार की काकु, छः अलंकार तथा पांच अंग होते हैं।
अब मैं क्रमशः उनके लक्षण बतलाता हूँ !
सात स्वर हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा
निषाद । इन स्वरों को विभिन्न रसों के अनुसार उपयुक्त एवं अनुकूल स्थिति
में रखना चाहिए ।
विभिन्न रसों के अनुकूल सात स्वर—
हास्य शृङ्गारयोः कार्यों स्वरौ मध्यमपञ्चमौ ॥ ३८ ॥
षड्जर्षभौ २तथा चैव वीररौद्राद्भुतेष्वथ ।
गान्धारश्च३ निषादश्च कर्तव्यौ करुणे रसे ॥ ३९ ॥
धैवतश्चैव कर्तव्यो बीभत्से सभयानके ।
हास्य तथा शृंगार रस में मध्यम तथा पंचम स्वर तथा वीर, रौद्र और
अद्भुत रस में षड्ज और ऋषभ स्वर रखना चाहिए। करुणरस में
गान्धार तथा निषाद और बीभत्स और भयानक रस में धैवत स्वर रखा
जाए ॥ ३८-४० ॥
स्वरों के तीन स्थान तथा उनका उपयोग—
त्रीणि४ स्थानानि—उरः कण्ठ शिरः इति । भवत्यपि५ च—
शारीर्यामथ वीणायां त्रिभ्यः स्थानेभ्य एव च ॥ ४० ॥
१. लक्षणान्यभिधास्यामः क०, स्तेषामिदानीं लक्षणान्यभिव्याख्यास्यामः ग० ।
२. च कर्तव्यो—क० ।
३. निषादश्चैव गान्धारः करुणे संविधीयते । क० ।
४. त्रीणि स्थानान्युरःकण्ठशिरांसीति भवन्त्यपि ।- ख०; ग० ।
५. भवति चात्र श्लोकः—क० ।
एकोनविंशोऽध्यायः ३५९
१उरसः शिरसः कण्ठात् स्वरः काकुः प्रवर्तते ।
स्वरों के तीन स्थान हैं उरस्थल, कण्ठ तथा शीर्ष । जैसे—मानव
ये शरीर में हैं उसी प्रकार वीणा में स्वर के तीन स्थान नियत होते हैं । वे
हैं—छाती, कण्ठ तथा मस्तक१ ॥ ४०-४१ ॥
आभाषणञ्च२ दूरस्थे शिरसा सम्प्रयोजयेत् ॥ ४१ ॥
३नातिदूरे च कण्ठेन ह्युरसा चैव पार्श्वतः ।
बहुत दूरी पर स्थित किसी व्यक्ति को बुलाने में शीर्षस्वर को उच्चारित
किया जाए । जो थोड़ी दूरी पर स्थित हो उसे कण्ठ-स्वर से तथा जो समीप
हो उसे छाती के स्थान से निस्सृत स्वर से बुलाया जाए ॥ ४१-४२ ॥
४उरसोदाहृतं वाक्यं शिरसा५ दीपयेद् बुधः ॥ ४२ ॥
६कण्ठेन शमनं कुर्यात् पाठ्ययोगेषु७ सर्वदा ।
पाठ्य स्वर के पाठ के समय जब किसी वाक्य को छाती के स्थान से
सस्वर प्रारंभ किया जाए तो उसे शीर्ष स्थान तक खींचना चाहिए तथा
कण्ठ स्थान पर उतारना चाहिए ॥ ४२-४३ ॥
१. स्वरों की उत्पत्ति नाद से हुई । जीवात्मा जब बोलने की इच्छा करता
करता है तो सर्व प्रथम उसे मानसिक प्रेरणा होती है । मन शरीर में
स्थित अग्नि को प्रेरित करता है अग्नि पवन को और पवन नाभि
स्थान से उठकर क्रमशः हृदय, कंठ और सिर ( शीर्ष ) में गति उत्पन्न
करते हुए अन्त में मुख द्वारा ध्वनिरूप में प्रकट होता है । इस नाभि
स्थान से उत्पन्न ध्वनि को सूक्ष्म रूप में 'नाद' कहा जाता है । इस नाद
के तीन प्रकार हैं । हृदय से उत्पन्न नाद को मन्द्र, कंठ से उत्पन्न नाद
को मध्य तथा शीर्ष में उत्पन्न नाद को तार कहते हैं । यहां इसी आशय
से स्वरों के स्थानों का शास्त्रकार द्वारा निर्देश किया गया है ।
१. उरसा शिरसा—क० ।
२. आभाषणं तु दूरस्थं शिरस्थेन स्वरेण हि । कण्ठेन नातिदूरे स्यादुरसा
चैव—क० ।
३. नातिदूरे च कण्ठे च ह्युरसा च समीपतः ।—ख०; नातिदूरेऽपि कण्ठना-
ध्युरसा चापि पार्श्वतः—ग० ।
४. उरसोदाहरेद्—क० । ५. शिरसोद्दीपयेद्—ख० ।
६. कण्ठेन शमयेच्चैव—क० । ७. योगे तु नित्यशः—क० ।
३६० नाट्यशास्त्रम्
चार वर्ण तथा उनका व्यवहार—
उदात्तश्चानुदात्तश्च स्वरितः कम्पितस्तथा।
वर्णाश्चत्वार एव स्युः पाठ्ययोगे तपोधनाः ॥ ४३ ॥
पाठ्य पाठ में चार स्वर ( उच्चारण स्थान ) होते हैं। यथा—उदात्त,
अनुदात्त, स्वरित तथा कम्पित ॥ ४३ ॥
तत्र हास्यशृङ्गारयोः स्वरितोदात्तैः,१ वीररौद्राद्भुतेषूदात्तकम्पितैः,२
करुणबीभत्सभयानकेष्वनुदात्तस्वरितकम्पितैरिति ३।
हास्य तथा शृङ्गार रस में स्वरित और उदात्त स्वर, वीर, रौद्र तथा
अद्भुत रसों में उदात्त तथा कम्पित स्वर, करुण, वात्सल्य और भयानक
रस में अनुदात्त, स्वरित और कम्पित स्वर रहने चाहिए ।
काकु के दो प्रकार—
द्विविधा काकुः—साकाङ्क्षा निराकाङ्क्षा४ चेति । वाक्यस्य साकाङ्क्ष-
निराकाङ्क्षत्वात् ।
काकु के दो प्रकार हैं—एक साकांक्ष तथा दूसरा निराकांक्ष । क्योंकि
वाक्य का आशय इन्हीं दो बातों से सम्बद्ध या इन्हीं पर निर्भर
रहता है ।
“अनियुक्तार्थकं वाक्यं साकाङ्क्षमिति संज्ञितम् ।
नियुक्तार्थन्तु यद्वाक्यं निराकाङ्क्षं तदुच्यते ॥ ४४ ॥
वह वाक्य जिसमें अपना पूर्ण रूप से अर्थ प्रकट (निर्णीत) नहीं
होता 'साकांक्ष' तथा जिसमें अपना अर्थ पूर्ण रूप से प्रकट होता हो
'निराकांक्ष' कहलाता है ॥ ४४ ॥
तत्र साकाङ्क्षं नाम—‘तारादिमन्द्रान्तमनियुक्तार्थमनिर्यार्तित-
वर्णालङ्कारं कण्ठोरःस्थलस्थानगतम् । निराकाङ्क्षं नामनियुक्तार्थं
निर्यार्तितवर्णालङ्कारं ‘शिरस्थानगतं मन्द्रादितारान्तमिति’ ।
१. स्वरितोदात्तैर्वर्णैः पाठ्यमुपपाद्यं—क० ।
२. उदात्तं कम्पितं—क० । ३. कम्पितैर्वर्णैः पाठ्यमुपाद्यम्—क० ।
४. निराकाङ्क्षेति—ख० । ५. अनियुक्तकमेकं—क० ।
६. तत्र साकाङ्क्षा नाम वाक्यं—क० । ७. अनियुक्तार्थं—क० ।
८. निराकाङ्क्षा नाम नियुक्तार्थ—क० । ९. कण्ठोरःस्थान—क० ।
१०. तारान्तं पाठ्यमिति—क; तारागतमिति—ग० ।