नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३४३
इनमें (से) राजा के अन्तःपुर (रनिवास) के रक्षक तथा सेवकों की
मागधी भाषा तथा राजपुत्र,१ चेट तथा श्रेष्ठिजन की अर्धमागधी भाषा
नियत रहनी चाहिए ॥ ४९ ॥
प्राच्या विदूषकादीनां १धूर्तानामप्यवन्तिजा ।
नायिकानां सखीनाञ्च २शूरसेन्यविरोधिनी ॥ ५० ॥
विदूषक२ तथा उसके सदृश पात्रों की प्राच्या भाषा तथा धूर्तवृत्ति के पात्रों
की 'अवन्ती भाषा' रखी जाए। यदि कोई अड़चन (या असुविधा) न हो
तो नायिका तथा उनकी सारी सखियों की शौरसेनी भाषा रखी जाए ॥५०॥
३योधनागरकादीनां दाक्षिणात्याथ दीव्यताम्४ ।
वाह्लीकभाषोदीच्यानां ५खसानाञ्च स्वदेशजा ॥ ५१ ॥
सैनिकों, (योध) जुआरियों, नगरमुख्य आरक्षक (नागरक) की
दाक्षिणात्या३ भाषा तथा भारत के उत्तर भाग के निवासी खसों की अपनी
देश भाषा वाह्लीकी रखी जाए ॥ ५१ ॥
१. राजपुत्र = सेवक क्षत्रिय, अर्थात् जो अन्तःपुर में सेवक हो तथा क्षत्रिय-
जाति के हों। श्रेष्ठि पात्र का संस्कृत भाषा या प्राकृत में संवाद प्राप्य
है। जैसे मुद्राराक्षस में चन्दनदास का प्राकृत में संभाषण। परन्तु
अर्धमागधी भाषा में इनके संभाषण (नियम) की किसी नाट्य-रचना
द्वारा पुष्टि नहीं मिलती।
२. विदूषक की मृच्छकटिक में 'प्राच्या' भाषा रखी गयी है तथा अन्य
लक्षण ग्रन्थों में भी विदूषक की प्राच्या भाषा रखने का नियम है।
विदूषक के शौरसेनी में या अन्य भाषा में संवाद नाट्य रचनाओं में
विरलता से ही प्राप्त हैं। अवन्तीभाषा का प्रयोग मृच्छकटिक में वीरक
और चन्दनक (अंक ६) एक पारस्परिक विवाद में करते हैं। अवन्ती
भाषा के अधिक प्राचीन नमूने तथा विशेष-विवरण आदि रूपकों में
नहीं मिलते।
३. मृच्छकटिक में चन्दनक की भाषा दाक्षिणात्या है ऐसा पृथ्वीधर का
मत है। दाक्षिणात्या के स्वरूप के बारे में अन्यत्र कहीं से भी अधिक
ज्ञात नहीं होता है।
१. योज्या भाषा अवन्तिजा—ग० ।
२. सुरसेना विरोधिनी—ख०; सौरसेन्य—ग० ।
३. योध—ख०; योधनागरिकादीनां—ग०। ४. दीप्यताम्—क० ।
५. खषाणां च स्वदेशजा—; स्वसानाञ्चैव भूमिषु—क० ।