नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
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संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 458सम्बोधन शब्दावली प्रयोग विधान—
एकोनविंशोऽध्यायः
सम्बोधन तथा काकुस्वर-व्यंजनाध्याय
सम्बोधन शब्दावली प्रयोग विधान—
एवं भाषाविधानन्तु मया¹ प्रोक्तं द्विजोत्तमाः।
पुनर्वाक्यविधानन्तु² लौकिकं सन्निबोधत ॥ १ ॥
उत्तमैर्मध्यमैर्वाच्यैर्ये सम्भाष्या यथा नराः ।
³समानोत्कृष्टहीनाश्च नाटके तान्निबोधत ॥ २ ॥
मुनियो, मैंने नाट्यरचना में प्रयुक्त की जाने वाली विविध भाषाओं के
नियम बतलाए। अब मैं लौकिकवाक्यों में व्यवहार किये जाने वाले उत्तम,
मध्यम तथा अधम पात्रों के द्वारा उत्तम, मध्यम तथा अधम पात्रों को
सम्बोधित किये जाने वाले नियत शब्द तथा उनके प्रयोग के विधान¹ को
बतलाता हूं ॥ १-२ ॥
देवता, गुरुजन तथा विद्वानों के लिए सम्बोधन शब्द—
देवानामपि ये देवा महात्मानो महर्षयः।
भगवन्निति ते वाच्या ⁴यास्तेषां योषितस्तथा ॥ ३ ॥
जो देवताओं में भी श्रेष्ठतम स्थान लिए हुए देवगण हों, महात्मागण
तथा महर्षि हों तो उन्हें “भगवन्”² शब्द से तथा उनकी पत्नियों को भी
इसी प्रकार ( 'भगवती' शब्द से ) सम्बोधित करना चाहिए ॥ ३ ॥
१. संस्कृत तथा प्राकृत नाट्यरचनाओं में होने वाले सभी व्यवहार तथा
तदुचित सम्बोधन इस अध्याय में पूर्ण रूप से भरत द्वारा नहीं बतलाए
गए। केवल कुछ सम्बोधन शब्द ही समझाने के लिये दिये गए हैं।
परवर्ती नाट्यशास्त्रीय रचनाओं में भी उक्त विषय पर थोड़ा बहुत
परिवर्तित उल्लेख ही प्राप्त होता है ।
२. जैसे शाकु० ( ४ अ० ) में काश्यप को दिया गया सम्बोधन । इत्यादि ।
१. यथावद्द्विजसत्तमाः—क० ।
२. प्रचारन्तु—ख०; विचारं तु—ग० ।
३. समानो वाल्पहीनो वा—क० ।
४. याश्चैषां—क; यास्तासां—ख० ।