नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३५५
स्त्रियों की जो हमजोल या समवयस्का सखियाँ हों उन्हें वे परस्पर
'हला' शब्द से सम्बोधित करें।
स्त्रियों के दासी के प्रति सम्बोधन शब्द—
प्रेष्या हञ्जेति वक्तव्या स्त्रिया¹ यत्तूत्तमा भवेत् ॥ २७ ॥
उत्तम स्त्रियों के द्वारा सेविका या दासी को 'हंजे' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २७ ॥
वेश्या के प्रति सम्बोधन शब्द—
अज्जुकेति च² वक्तव्या वेश्या परिजनेन च ।
³अत्तेति गणिकामाता वाच्या ⁴परिजनेन हि ॥ २८ ॥
वेश्या को उसके परिचारक, सेवक आदि के द्वारा 'अज्जुका' शब्द से
सम्बोधित किया जाए और जब यही वृद्धा हो तो 'अत्ता' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ॥ २८ ॥
प्रणयावस्था में पत्नी के लिये सम्बोधन शब्द—
प्रियेति भार्या शृङ्गारे वाच्या राज्ञेतरेण वा ।
पुरोधः सार्थवाहानां ⁵भार्यास्त्वार्येति सर्वदा ॥ २९ ॥
प्रणयावस्था में राजा के अतिरिक्त सभी पुरुष पत्नी को 'प्रिये' शब्द से
सम्बोधित करें परन्तु पुरोहित और सार्थवाह की पत्नी को सदा 'आर्ये'
शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २९ ॥
नाटक में पात्रों के नाम एवं उनकी विधि—
⁶तल्लिङ्गार्थानि नामानि कार्याणि कविभिः सदा⁷।
औत्पत्तिकानि यानि ⁸स्युरप्रख्यातानि नाटके ॥ ३० ॥
नाट्यकार को नाटक में अप्रख्यात पात्रों के ऐसे नाम जो कल्पित हों तो
वे उनके गुण आदि से सम्बद्ध यौगिक रूप में ही रखना चाहिए ॥ ३० ॥
१. स्त्रियो या तूत्तमा—ख०; ग० ।
२. भवेद्वाच्या—ख०; भवेद्वेश्या वाच्या परिजनेन तु—ग० ।
३. या त्वत्र वृद्धा सा त्वत्ता भाष्या परिजनेन तु—क० ग० ।
४. नाट्यजनेन—ख०; ग० । ५. नार्यस्त्वार्येति—ग० ।
६. तच्चिप्सार्थानि—क०; तल्लिङ्गस्थानि—ग० ।
७. द्विजाः—क०; ख० ।
८. स्युनं प्रत्याख्याति क; न प्रत्याख्यानि—ख०; ग० ।