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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 470, कुल 668 में से

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पृष्ठ 470

एकोनविंशोऽध्यायः ३५९
१उरसः शिरसः कण्ठात् स्वरः काकुः प्रवर्तते ।
स्वरों के तीन स्थान हैं उरस्थल, कण्ठ तथा शीर्ष । जैसे—मानव
ये शरीर में हैं उसी प्रकार वीणा में स्वर के तीन स्थान नियत होते हैं । वे
हैं—छाती, कण्ठ तथा मस्तक१ ॥ ४०-४१ ॥
आभाषणञ्च२ दूरस्थे शिरसा सम्प्रयोजयेत् ॥ ४१ ॥
३नातिदूरे च कण्ठेन ह्युरसा चैव पार्श्वतः ।
बहुत दूरी पर स्थित किसी व्यक्ति को बुलाने में शीर्षस्वर को उच्चारित
किया जाए । जो थोड़ी दूरी पर स्थित हो उसे कण्ठ-स्वर से तथा जो समीप
हो उसे छाती के स्थान से निस्सृत स्वर से बुलाया जाए ॥ ४१-४२ ॥
४उरसोदाहृतं वाक्यं शिरसा५ दीपयेद् बुधः ॥ ४२ ॥
६कण्ठेन शमनं कुर्यात् पाठ्ययोगेषु७ सर्वदा ।
पाठ्य स्वर के पाठ के समय जब किसी वाक्य को छाती के स्थान से
सस्वर प्रारंभ किया जाए तो उसे शीर्ष स्थान तक खींचना चाहिए तथा
कण्ठ स्थान पर उतारना चाहिए ॥ ४२-४३ ॥
१. स्वरों की उत्पत्ति नाद से हुई । जीवात्मा जब बोलने की इच्छा करता
करता है तो सर्व प्रथम उसे मानसिक प्रेरणा होती है । मन शरीर में
स्थित अग्नि को प्रेरित करता है अग्नि पवन को और पवन नाभि
स्थान से उठकर क्रमशः हृदय, कंठ और सिर ( शीर्ष ) में गति उत्पन्न
करते हुए अन्त में मुख द्वारा ध्वनिरूप में प्रकट होता है । इस नाभि
स्थान से उत्पन्न ध्वनि को सूक्ष्म रूप में 'नाद' कहा जाता है । इस नाद
के तीन प्रकार हैं । हृदय से उत्पन्न नाद को मन्द्र, कंठ से उत्पन्न नाद
को मध्य तथा शीर्ष में उत्पन्न नाद को तार कहते हैं । यहां इसी आशय
से स्वरों के स्थानों का शास्त्रकार द्वारा निर्देश किया गया है ।
१. उरसा शिरसा—क० ।
२. आभाषणं तु दूरस्थं शिरस्थेन स्वरेण हि । कण्ठेन नातिदूरे स्यादुरसा
चैव—क० ।
३. नातिदूरे च कण्ठे च ह्युरसा च समीपतः ।—ख०; नातिदूरेऽपि कण्ठना-
ध्युरसा चापि पार्श्वतः—ग० ।
४. उरसोदाहरेद्—क० । ५. शिरसोद्दीपयेद्—ख० ।
६. कण्ठेन शमयेच्चैव—क० । ७. योगे तु नित्यशः—क० ।