नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 469, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ें३५८ नाट्यशास्त्रम्
इस प्रकार विस्तारपूर्वक भाषा विधान आदि को ठीक तरह से
जानकर नाट्यकार को छः अलंकारों से युक्त 'पाठ्य' की योजना करनी
चाहिए ॥ ३७-३८ ॥
पाठ्य के गुण एवं स्वरूप—
पाठ्यगुणानिदानीं वक्ष्यामः । तद्यथा—सप्तस्वराः, त्रीणि
स्थानानि, चत्वारो वर्णाः, द्विविधा काकुः, षडलङ्काराः षडङ्गानीति ।
एषामिदानीं १लक्षणमभिव्याख्यास्यामः । तत्र सप्तस्वराः नाम-षड्ज-
र्षभ गान्धार मध्यमपञ्चम धैवत निषादाः । त एते रसेषूपपाद्याः । यथा—
अब मैं 'पाठ्य' के गुणों का वर्णन करता हूँ। इसमें सात स्वर, तीन
स्थान, चार वर्ण, दो प्रकार की काकु, छः अलंकार तथा पांच अंग होते हैं।
अब मैं क्रमशः उनके लक्षण बतलाता हूँ !
सात स्वर हैं—षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा
निषाद । इन स्वरों को विभिन्न रसों के अनुसार उपयुक्त एवं अनुकूल स्थिति
में रखना चाहिए ।
विभिन्न रसों के अनुकूल सात स्वर—
हास्य शृङ्गारयोः कार्यों स्वरौ मध्यमपञ्चमौ ॥ ३८ ॥
षड्जर्षभौ २तथा चैव वीररौद्राद्भुतेष्वथ ।
गान्धारश्च३ निषादश्च कर्तव्यौ करुणे रसे ॥ ३९ ॥
धैवतश्चैव कर्तव्यो बीभत्से सभयानके ।
हास्य तथा शृंगार रस में मध्यम तथा पंचम स्वर तथा वीर, रौद्र और
अद्भुत रस में षड्ज और ऋषभ स्वर रखना चाहिए। करुणरस में
गान्धार तथा निषाद और बीभत्स और भयानक रस में धैवत स्वर रखा
जाए ॥ ३८-४० ॥
स्वरों के तीन स्थान तथा उनका उपयोग—
त्रीणि४ स्थानानि—उरः कण्ठ शिरः इति । भवत्यपि५ च—
शारीर्यामथ वीणायां त्रिभ्यः स्थानेभ्य एव च ॥ ४० ॥
१. लक्षणान्यभिधास्यामः क०, स्तेषामिदानीं लक्षणान्यभिव्याख्यास्यामः ग० ।
२. च कर्तव्यो—क० ।
३. निषादश्चैव गान्धारः करुणे संविधीयते । क० ।
४. त्रीणि स्थानान्युरःकण्ठशिरांसीति भवन्त्यपि ।- ख०; ग० ।
५. भवति चात्र श्लोकः—क० ।