नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३५३
सभी स्त्रियों को यौवन में अपने पति को 'आर्यपुत्र' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए। परन्तु कुछ अवस्थाओं में पति को केवल 'आर्य' शब्द से भी
सम्बोधित किया जा सकता है। यदि पति राजा हो तो उसे महारानी द्वारा
'महाराज' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १९ ॥
आर्येति पूर्वजो भ्राता वाच्यः पुत्र इवानुजः¹।
पुरुषाभाषणं ह्येवं कार्यं नाट्ये प्रयोक्तृभिः ॥ २० ॥
बड़े भाई को 'आर्य' शब्द से तथा छोटे भाई को अपने पुत्र के समान
उपयुक्त शब्द द्वारा सम्बोधित करना चाहिए । पुरुष पात्रों के द्वारा नाटकों
में सम्बोधन का यही विधान है ॥ २० ॥
पुनः स्त्रीणां ²प्रवक्ष्यामि यथाभाष्यास्तु नाटके ।
तपस्विन्यो देवताश्च वाच्या भगवतीति च ॥ २१ ॥
अब मैं स्त्रियों के द्वारा स्त्रियों के प्रति नाटक में किये जाने वाले
सम्बोधन शब्द बतलाता हूँ। तपस्वी स्त्रियाँ तथा देवी को 'भगवती' शब्द से
सम्बोधित किया जाए ॥ २१ ॥
³गुरुभार्या तु वक्तव्या स्थानीया भवतीति च ।
पूज्य गुरुजन की पत्नियों या अन्य ज्येष्ठावस्था की स्त्रियों ( स्थानीय )
को 'भवती' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
ग्राम्या⁴ च भद्रेति वाच्या⁵ वै ⁶वृद्धाम्बेति च नाटके ॥ २२ ॥
पहुंच या भेंट के उपयुक्त ग्रामीण स्त्री ( ग्राम्या ) को 'भद्रे' तथा बूढ़ी
स्त्री को 'अम्बा' ( माता शब्द से भी ) शब्द से सम्बोधित करना
चाहिए ॥ २२ ॥
महारानी के प्रति सम्बोधन शब्द—
⁷राजपत्नस्तु सम्भाष्याः सर्वाः परिजनेन वै ।
भट्टिनी स्वामिनी ⁸देवीत्येवं वै नाटके बुधैः ॥ २३ ॥
१. अस्मादनन्तरं—योषिद्भिरथ काम्येति राजपुत्रेति योधनैः । इति
पद्यार्धमधिकं क—पुस्तके दृश्यते ।
२. स्त्रीणाञ्च वक्ष्यामि संभाषां नाटकाश्रयाम्—ग० ।
३. गुरुरायेति—क० । ४. गम्या—क० ।
५. वक्तव्या—ख०; ग० । ६. वृद्धा वाच्येति नाटके—ग० ।
७. राजपुत्र्यस्तु—क०; राजपत्न्यश्च—ग० ।
८. स्वामिनीत्येवं सर्वदा—क०; देवी इत्येवं—ख०; ग० ।
२३ ना० शा० द्वि०