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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 457

३४६ नाट्यशास्त्रम्
हिमवत्-सिन्धुसौवीरान् ये¹ जनाः समुपाश्रिताः ।
²उकारबहुलां ³तज्ज्ञस्तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥ ५९ ॥
वे लोग जो हिमाचल पर्वत, सिन्धु तथा सौवीर देश के (समीपवर्ति
प्रदेशों के) निवासी हों उनकी 'य' कार बहुल भाषी रखी जाए ॥ ५९ ॥
⁴चर्मण्वती नदीतीरे ये ⁵चार्बुदसमाश्रयाः ।
⁶ओकारबहुलां नित्यं तेषु भाषां प्रयोजयेत् ॥ ६० ॥
वे लोग जो चम्बल (चर्मण्वती) नदी के उस पार अरावली पर्वत
(मेवाड़ तथा मारवाड़ आदि प्रदेशों) के समीपवर्ती प्रदेश के निवासी
हों तो उनकी 'आ' (या 'त') कार बहुल भाषा रखनी चाहिए ॥ ६० ॥
एवं भाषाविधानन्तु कर्तव्यं नाटकाश्रयम् ।
अत्र नोक्तं मया यत्तु लोकाद् ग्राह्यं बुधैस्तु तत् ॥ ६१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे भाषाविधानं ⁷नामाष्टादशोऽध्यायः ।
नाटक में रहने वाली विभिन्न भाषाओं के ये ही नियम हैं। इसमें जो
बात कहने में न आई हों उन्हें लोकाचार या सामान्य व्यवहार से लिया जा
सकता है ॥ ६१ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का भाषाविधान नामक अठारहवां अध्याय सम्पूर्ण ।
१. ये च देशाः समाश्रिताः—ख; येऽन्यदेशसमाश्रिताः—ग० ।
२. ओकार—क० । ३. तेषु नित्यं भाषां प्रयोजयेत्—ग० ।
४. सरस्वतीनदीतीरे पारियात्राबुंदाश्रिताः—क०; चर्मण्वती नदीपारे—ख० ।
५. समाश्रिताः—ख० । ६. तकार—क; ख० ।
७. क० ख० पुस्तकयोस्तु नात्राध्यायसमाप्तिः ।