नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३४१
१छन्दतः प्राकृतं २पाठ्यं स्मृतमप्सरसां³ भुवि ।
मानुषाणाञ्च⁴ कर्तव्यं कारणार्थव्यपेक्षया ॥ ४३ ॥
अप्सराओं के स्त्री जाति होने के कारण तथा उनके पृथ्वी पर विचरण
विहार की अवस्थाओं में स्वाभाविक या स्वेच्छापूर्वक प्राकृत पाठ्य रखना
उचित है परन्तु ये ही जब किसी मानव की पत्नी के रूप में रहे तो
अवसरानुकूल संस्कृत या प्राकृत कोई भी पाठ्य रखा जाए ॥ ४३ ॥
न बर्बरकिरातान्ध्रद्रमिलाद्यासु⁵ जातिषु ।
६नाट्यप्रयोगे कर्तव्यं पाठ्यं⁷ भाषासमाश्रयम् ॥ ४४ ॥
परन्तु १बर्बर, किरात, आन्ध्र तथा द्रामिड (द्रविड) जाति के पात्रों की
नाट्यरचनाओं में उनकी अपनी जातीय भाषाएँ न रखी जाएँ ॥ ४४ ॥
८सर्वास्वेव हि शुद्धास्तु जातिषु⁹ द्विजसत्तमाः ।
१०शौरसेनीं समाश्रित्य भाषां काव्येषु योजयेत् ॥ ४५ ॥
किन्तु इन जातियों की केवल शौरसेनी से मिलती जुलती किन्ही
प्रचलित ²भाषाओं का (अवसर आने पर) प्रयोग किया जाए ॥ ४५ ॥
१. बर्बर आदि के विषय में ना० शा० अध्याय १३।९९ का विवरण तथा
टिप्पणियां द्रष्टव्य है ।
२. इनमें मागधी, अर्धमागधी तथा शौरसेनी के अतिरिक्त अवन्ती, प्राच्या,
वाल्हीका और दाक्षिणात्या के नाम भर यहाँ दिये गए हैं । मृच्छकटिक में
अवन्ती तथा प्राच्या के उदाहरण मिलते हैं । वाल्हीका का स्वरूप क्या
था यह नाटकों के प्रयोग के आधार पर सम्प्रति प्राप्त नहीं हैं । यहाँ
महाराष्ट्री प्राकृत का उल्लेख भरत द्वारा न किया जाना (भरत की)
प्राचीनता की ओर संकेत करता है क्योंकि शौरसेनी का उत्तरकालीन
स्वर महाराष्ट्री की रचना में स्पष्टतः परिलक्षित होता है ।
१. छन्दसां—क०; छन्दस्तः—ख० । २. वाक्यं—क०; ग० ।
३. मप्सरसामपि—क० । ४. मानुषाणाञ्च—क०; ग० ।
५. द्रविडा—ख० । ६. नाटचयोगेषु—क०; नाटचयोगे तु—ख०; ग० ।
७. काव्यं—ख०; ग० ।
८. जातिष्वेतासु सर्वासु—ख०; ग० । ९. श्रद्धासु च—ख०; ग० ।
१०. शौरसेनं समाश्रित्य भाषाः कार्यास्तु नाटके—क०; भाषा कार्या तु
नाटके—ख०; ग० ।