नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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अथवा छन्दतः कार्या $^१$देशभाषा प्रयोक्तृभिः ।
नानादेशसमुत्थं हि $^२$काव्यं भवति नाटके ॥ ४६ ॥
या फिर स्वेच्छानुसार नाट्य निर्देशक इनकी कोई एक लोकभाषा रख लें
क्योंकि नाट्यरचनाएँ तो विभिन्न प्रदेशों की भाषा में रचित काव्यरचनाओं से
युक्त लिखी जा सकती हैं ॥ ४६ ॥
सात मुख्य भाषाएँ—
मागध्यवन्तिजा प्राच्या $^३$शौरसेन्यर्धमागधी ।
वाह्लीका दाक्षिणात्या च सप्त भाषाः प्रकीर्तिताः ॥ ४७ ॥
सात मुख्य (प्राकृत) भाषाएं हैं—(१) मागधी (२) अवन्ती
(३) प्राच्या (४) सौरसेनी या शूरसेनी (५) अर्धमागधी (६) वाह्लीका
तथा (७) दाक्षिणात्या ॥ ४७ ॥
$^४$शकाराभीर-चाण्डालशबरद्रमिलान्ध्रजाः$^५$ ।
हीना $^६$वनेचराणाञ्च विभाषा नाटके स्मृताः$^७$ ॥ ४८ ॥
नाट्यरचना में इसके अतिरिक्त कुछ विभाषाएँ$^१$ भी—जो गौण स्थिति
रखती हों—रखी जाती है। जिनमें हैं—शाकारी, आभीरी, चाण्डाली,
शाबरी, द्रामिडी, आन्ध्री तथा वनेचरों की अपनी जंगली भाषाएँ ॥ ४८ ॥
मुख्य (प्राकृत) भाषाओं का उपयोग या व्यवहार—
मागधी तु $^८$नरेन्द्राणामन्तः पुरसमाश्रया ।
चेटानां राजपुत्राणां $^९$श्रेष्ठिनाञ्चार्धमागधी ॥ ४९ ॥
१. विभाषा का लक्षण मृच्छटिक के प्राचीन टीकाकार पृथ्वोधर ने 'विविधाः
भाषा हीन-प्रयोज्यत्वात् विभाषाः' दिया है। अर्थात् नीचपात्रों के द्वारा
व्यवहार में आनेवाली विविध भाषाएं विभाषा कहलाती है। नाट्यशास्त्र
में विद्यमान विभाषाओं में शाकारी, ढक्की तथा चाण्डाली का प्रयोग
मृच्छकटिक में भी मिलता है। संभवतः भरत को अपने समय में इन
सभी विभाषाओं की उदाहरण रूप में उपलब्धि रही हो।
१. दैवी भाषा—क० । २. कार्यं—क० ।
३. शूरसेना—क०; सूरसेन्यर्धं—ख०; ग० ।
४. शबराभीर—ख०; ग० ।
५. सचरद्रमिडोद्भूजाः—ख०; द्रविडोड्ड्रजाः—ग० ।
६. वनचराणां—क० । ७. स्मृता—ग० ।
८. नराणाञ्चैवान्तःपुरनिवासिनाम्—क०; ग० । ९. श्रेष्ठीनां—ग० ।