नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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नाटक में राज पत्नियों को सेवक तथा परिचारिकाओं के द्वारा भट्टिनी,
स्वामिनी तथा देवी शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ २३ ॥
देवीति महिषी वाच्या राज्ञा परिजनेन वा ।
भोगिन्यः १परिशिष्टास्तु स्वामिन्य इति वा पुनः ॥ २४ ॥
इनमें पटरानी को 'देवी' शब्द से परिजन तथा राजा के द्वारा भी
सम्बोधित किया जाए । राजा की शेष पत्नियों को परिजन 'भट्टिनी' या
'स्वामिनी' शब्द से सम्बोधित करे ॥ २४ ॥
राजकुमारियों के लिये सम्बोधन—
२कुमार्य्यश्चैव वक्तव्याः प्रेष्याभिर्भर्तृदारिकाः ।
अविवाहित राजकुमारियों को (उनकी) दासियां 'भर्तृदारिका' शब्द से
सम्बोधित करें ।
स्वसेति भगिनी वाच्या ३वत्सेति च यवीयसी ॥ २५ ॥
बड़ी बहिन को 'भगिनी' तथा छोटी बहिन को 'वत्से' शब्द से
सम्बोधित करना चाहिए ॥ २५ ॥
ब्राह्मणी, भिक्षुणी, आदि के सम्बोधन शब्द—
ब्राह्मण्यार्येति वक्तव्या लिङ्गस्था व्रतिनी च या ।
ब्राह्मणी, साधुनी या व्रतधारिणी स्त्री को 'आर्या' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए ।
पत्नी के प्रति सम्बोधन शब्द—
पत्नी चार्येति सम्भाष्या ४पितृनाम्ना सुतस्य वा५ ॥ २६ ॥
अपनी धर्मपत्नी को 'आर्या' शब्द से या पिता और पुत्र के नाम से
सम्बद्ध करते हुए शब्दों से सम्बोधित किया जाए ॥ २६ ॥
स्त्रियों के अपनी सखियों के प्रति सम्बोधन—
समानाभिस्तथा सख्यः६ हलेति स्यात् परस्परम् ।
१. भट्टिन्यः इति शेषास्तु— ख०; ग० ।
२. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
३. ज्येष्ठा वत्सेति चानुजा—ख०; ग० ।
४. पितुर्नाम्ना—ख०; ग० । ५. सा—ख०; ग० ।
६. सख्यो हला भाष्याः परस्परम्—ख०; ग० ।