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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 463

३५२ नाट्यशास्त्रम्
अपने शिष्य या पुत्र को गुरु के द्वारा वत्स, पुत्र, तात या उसके गोत्र
या नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १४ ॥
सम्भाष्या शाक्यनिर्ग्रन्था ¹भदन्तेति प्रयोक्तृभिः ।
बौद्ध तथा जैन साधुओं को 'भदन्त' शब्द से सम्बोधित करना
चाहिये ।
आमन्त्रणैस्तु पाषण्डा शेषाः² स्वसमयाश्रितैः ॥ १५॥
अन्य पाशुपत आदि सम्प्रदाय के साधुओं को उनके अपने नियमानुसारि
सम्बोधनों से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १५ ॥
देवेति नृपति र्वाच्यो भृत्यैः ³प्रकृतिभिस्तथा ।
भट्टेति सार्वभौमस्तु नित्यं परिजनेन ⁴तु ॥ १६ ॥
राजा को अपने प्रजाजन तथा सेवकों के द्वारा 'देव' शब्द से सम्बोधित
करना चाहिए । परन्तु यदि यही सार्वभौम राजा हो तो सदा इसे 'भट्ट' या
'भर्ता' शब्द से सम्बोधित करना चाहिए ॥ १६ ॥
राजन्नित्यृषिभिर्वाच्यो ह्यपत्यप्रत्ययेन वा ।
वयस्य राजन्निति वा भवेद्वाच्यो महीपतिः ॥ १७ ॥
विदूषकेन राज्ञी च चेटी⁵ च भवतीत्यपि ।
नाम्ना वयस्येत्यपि वा राज्ञा वाच्यो विदूषकः ॥ १८ ॥
ऋषिगण के द्वारा राजा को उसके कुलागत नाम (जैसे पुरुवंश के
लिए “पौरव” शब्द) द्वारा सम्बोधित करना चाहिए और विदूषक के
द्वारा राजा को “वयस्य” तथा 'राजन्' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
तथा इसी (विदूषक) के द्वारा महारानी तथा उनकी दासियों को
'भवती' शब्द से सम्बोधित किया जाए तथा राजा भी विदूषक को उसके
नाम या फिर 'वयस्य' शब्द से सम्बोधित करे ॥ १७-१८ ॥
सर्वस्त्रीभिः पतिर्वाच्यः आर्यपुत्रेति यौवने ।
⁶अन्यदा पुनरार्येति महाराजेति भूपतिः ॥ १९ ॥
१. भद्रं ते—क० ।
२. शेषां स्वयमुपागतैः—ख०; शेषास्तु समयाश्रितैः—ग० ।
३. परिजनेन वा—क० । ४. हि—ख०; ग० ।
५. चेट्या च—ख०; ग० ।
६. पद्यार्धमेतत् ख० पुस्तके नास्ति ।