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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 455, कुल 668 में से

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पृष्ठ 455

३४४ नाट्यशास्त्रम्
विभाषाओं (या उपभाषाओं) का उपयोग—
१शकाराणां शकादीनां तत्स्वभावश्च यो गणः ।
शकार² भाषा योक्तव्या ³चाण्डाली ४पुल्कसादिषु ॥ ५२ ॥
शकार, शक, तथा (शबर जाति के या) उसके अनुरूप स्वभाववाले
वर्गों (गणः) की शाकारी भाषा रखी जाए तथा पुल्कस डोम और इसके
समान अन्य नीच जातियों की 'चाण्डाली' भाषा रखी जाए ॥ ५२ ॥
५अङ्गार-कारक-व्याधकाष्ठयन्त्रोपजीविनाम्६ ।
योज्या७ शकारभाषा तु किञ्चिद्वानौकसी तथा ॥ ५३ ॥
कोयलों के व्यवसायी, बहेलिये (व्याध), लकड़ी और पत्तों को जंगल
से ढोकर अपनी जीविका चलाने वाले श्रमिक जैसे पात्रों की तथा जंगल के
निवासीजन की भी शाबरी (शाकारी) भाषा रखनी चाहिए ॥ ५३ ॥
८गजाश्वाजाविकोष्ट्रादिघोषस्थाननिवासिनाम् ।
आभीरोक्तिः शाबरी वा९ द्रामिडी १०वनचारिषु ॥ ५४ ॥
जहां हाथी, घोड़े, बकरे, भेड़, ऊंट या बैल गायों को बांधा या रखा
जाता हो—उन स्थानों के निवासियों की आभीरी२ या शाबरीभाषा रखी
जाए तथा द्रविड़ आदि देशों के व्यक्तियों या वनवासियों की 'द्राविड़ी' भाषा
रखी जाती है ॥ ५४ ॥
१. मृच्छकटिक में ही शकार ऐसा उपलब्ध पात्र है और उसीकी शाकारी
भाषा भी प्रयुक्त हुई है। इसके अतिरिक्त चाण्डालों द्वारा चाण्डाली भाषा
का (भी) व्यवहार इसी प्रकरण में मिल जाता है ।
२. आभीरी और द्राविड़ीभाषा के रूप उपलब्ध संस्कृत रूपकों में नहीं
मिलते, हो सकता है कि यह कोई द्राविड़ी बोली होगी, शायद यह
उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों की भी बोली हो—जैसा कि भाषाविदों
का अनुमान है ।
१. शकार—घोषकादीनां—क०; शवराणां शकादीनां—ख०; ग० ।
२. सकार—क० । ३. पाञ्चाली—ख०; ग० ।
४. पुत्कसादिषु—क० । ५. कारव्याधानां—ख०; ग० ।
६. पत्रयन्त्रोप—क० । ७. ज्ञेया शबरभाषा तु—ख० ।
८. गवाश्वाजाविकोष्ट्रादि—ख० ।
९. स्यात्—क० । १०. द्रिमिलादिषु—ख० ।