नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३५१
सेवकों का राजकुमार के प्रति सम्बोधन—
स्वामीति युवराजस्तु कुमारो भर्तृदारकः ।
सेवकों के द्वारा युवराज राजकुमार को 'स्वामी' शब्द से तथा शेष
राजकुमारों को 'भर्तृदारक' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
सौम्य भद्रमुखेत्येवं हे पूर्वश्चाधमं वदेत् ॥ १२ ॥
अधम पात्र को हे ( अरे ) शब्द को पूर्व में प्रयुक्त करते हुए “सौम्य”२
या 'भद्रमुख' शब्द से सम्बोधित किया जाए ॥ १२ ॥
यद्यस्य कर्म शिल्पं वा विद्या वा जातिरेव वा ।
स तेन नाम्ना १सम्भाष्यो नाटकादौ२ प्रयोक्तृभिः ॥ १३ ॥
नाटक में जिस व्यक्ति का जो कार्य, हुनर ( शिल्प ) विद्या, जाति, जन्म
( कुल ) या उसकी अवस्था या स्थिति हो तो उसके अनुरूप ही उसे उसी
नाम से सम्बोधित किया जाए ॥ १३ ॥
वत्स पुत्रक तातेति नाम्ना गोत्रेण वा पुनः ।
वाच्यः शिष्यः सुतो वापि पित्रा३ वा ४गुरुणापि वा ॥ १४ ॥
१. इस प्रकार 'स्वामी' शब्द से युवराज को सम्बोधित करने के बजाय
नाटकों में प्रायः राजा को सम्बोधन करना प्राप्त होता है। जैसे स्वप्न-
वासवदत्त में यौगन्धरायण का उदयन को सम्बोधित करना, आदि ।
इसी प्रकार युवराज या राजकुमार के लिये एक सामान्य शब्द का प्रयोग
मिलता है। जैसे प्रतिमा में प्रतिहारी राम को भर्तृदारक शब्द से सम्बोधित
करती है, स्वामि शब्द से नहीं । ( दे० प्र० ना० १।२।९ ) । हां, इस
सन्दर्भ में 'कुमार' शब्द द्वारा सम्बोधित किया जाना अवश्य मिलता
है। जैसे प्रतिमा अं० ३ में भरत का सम्बोधन तथा इसी प्रकार मुद्रा०
रा० में मलयकेतु को भी । 'सौम्य' शब्द का नाटकों में प्रयोग कम
मिलता है पर भद्र या भद्रमुख शब्द का प्रयोग यत्र तत्र अवश्य मिलता
है। जैसे प्रतिमा और शाकु० में ।
२. इस नियम के अधिक उदाहरण नहीं मिलने पर इसका उदाहरण
मृच्छ क० में चारुदत्त के पुत्र द्वारा चाण्डालों को किया गया सम्बोधन
कदाचित् हो सकता है ।
१. भाष्यो हि—क० । २. नाटिकादिषु योक्तृभिः क० ।
३. नाटके नाट्यकोविदैः—क० । ४. गुरुणाथवा—ग० ।