नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 468, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंएकोनविंशोऽध्यायः ३५७
उत्तम पात्रों के नाम—
गम्भीरार्थानि नामानि १ह्युत्तमानां प्रयोजयेत् ।
२यस्मान्नामानुसदृशं कर्म तेषां भविष्यति ॥ ३५ ॥
उत्तम पात्रों के नाम किसी गम्भीर अर्थ के सूचक रखे जाए क्योंकि
उनके कार्य उनके नाम के अनुरूप ही नाटकादि में रहते हैं ॥ ३५ ॥
अन्य पात्रों के नाम—
जातिचेष्टानुरूपाणि शेषाणामपि ३योजयेत् ।
नामानि पुरुषाणाञ्च ४ स्त्रीणाञ्चोक्तानि तत्त्वतः ॥ ३६ ॥
एवं ५नामविधानन्तु कर्तव्यं कविभिः६ सदा ।
( इसके अतिरिक्त ) शेष पात्रों के नाम उनके जन्म, जाति तथा कार्य
के अनुसार रखना चाहिए ।
इस प्रकार स्त्री तथा पुरुषों के नाटक में रहने वाले नामों का मैंने
औचित्यपूर्ण वर्णन कर दिया ।
नाट्यकार को अपनी रचना में इसी विधान के अनुसार पात्रों के नाम१
रखने चाहिए ॥ ३६-३७ ॥
एवं ७भाषाविधानन्तु ज्ञात्वा कर्माण्यशेषतः८ ॥ ३७ ॥
ततः पाठ्यं प्रयुञ्जीत ९षडलङ्कारसंयुतम्१० ।
१. यद्यपि नाट्य शास्त्र में सम्बोधन एवं नाम रखने के विविध नियम
बतलाए परन्तु इनके अनुसार सम्बोधन वर्तमान नाट्यरचनाओं में
उपलब्ध नहीं होते । इससे प्रतीत होता है कि नाट्यशास्त्रीय अध्ययन
या प्राचीन शास्त्रीय परिपाटी की शिथिलता ही इसमें मूलभूत कारण
हुई । यह भी हो सकता है कि इन नियमों की अधिक अपेक्षा न रहने
के कारण ही शायद उपेक्षा की गई हो ।
१. योजयेदुत्तमेषु च—ख०; ग० । २. कस्मान्नामानु—क० ।
३. कारयेत्—ख०; ग० । ४. पुरुषाणान्तु—ख०; ग० ।
५. नामाभिधानन्तु—ग० । ६. कविभिस्त्वथ—ग० ।
७. भाषाविधानानि-क०; भाषाविधानादि ज्ञात्वा सर्वमशेषतः — ख०; ग० ।
८. पद्यार्धस्यास्य पाठान्तरं क—( भ. ) पुस्तके—'भाषाविधानं विज्ञेयं
ततः प्रकृतिसम्भवम् ।' इति ।
९. संश्रयम् — क० ।
१०. ततः पाठचस्य वक्ष्यामि गुणांश्च द्विजसत्तमाः । स्वरै षड्जादिभिर्युक्तं
नानारससमन्वितम् । क० ( ? )