नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
DevanagariHindipublished668 पृष्ठ
पृष्ठ 461, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 461जो पुरुष या स्त्रीपात्र नौकर हों उन्हें तथा कलाकार¹ ( शिल्पी ) या
१. जैसे माल० वि० नाट० में राजा को हरदत्त द्वारा किया गया सम्बोधन
३५० | नाट्यशास्त्रम्
जो पुरुष या स्त्रीपात्र नौकर हों उन्हें तथा कलाकार¹ ( शिल्पी ) या
उसकी पत्नी आदि को उनके स्थिति व्यवसाय या पदानुसार सम्बोधित किया
जाए ॥ ९ ॥
मान्यो¹ भावेति वक्तव्यः किञ्चिदूनस्तु मार्षकः ।
सामान्य पुरुष को 'माघ'² तथा उससे कम स्थिति वाले पुरुष को
'मारिष' शब्द से सम्बोधित किया जाए ।
समान अवस्थावालों के सम्बोधन—
'समानोऽथ वयस्येति हं³ हो हण्डेति चाधमः ॥ १० ॥
समान अवस्था वाले पुरुष एक दूसरे को 'वयस्य'³ शब्द से तथा अधम
पुरुष को 'हंहो' शब्द से सम्बोधित करें ॥ १० ॥
सूत का रथी पुरुष को सम्बोधन—
आयुष्मन्निति वाच्यस्तु रथी ⁴सूतेन सर्वदा ।
सूत के द्वारा रथ में स्थित पुरुष को 'आयुष्मन्'⁴ शब्द से सम्बोधित
किया जाए ।
⁵तपस्वीति प्रशान्तस्तु साधो इति च शब्द्यते ॥ ११ ॥
तपस्वी और प्रशान्त स्वभाव के व्यक्ति को⁵ 'साधो' शब्द से सम्बोधित
किया जाए ॥ ११ ॥
१. जैसे माल० वि० नाट० में राजा को हरदत्त द्वारा किया गया सम्बोधन
( माल० वि० २।१२।४ ) ।
२. जैसे शकार का 'विट' को 'भाव शब्द से सम्बोधन करना व जैसे
अवि० ना० ( भास ) में सूत्रधार का पारिपार्श्विक को 'मारिष'
सम्बोधन ।
३. जैसे मुद्रा० रा० नाटक में सामिद्धार्थक और सुसमिद्धार्थक के परस्पर
सम्बोधन तथा चाणक्य का शिष्य को 'हं हो ब्राह्मण' सम्बोधित करना ।
४. जैसे—शाकु० में ( अंक २ ) में सूत का दुष्यन्त को सम्बोधन तथा शा०
( अं० ५ ) में पुरोहित का दोनों तपस्वी कुमारों को सम्बोधन करना ।
५. 'साधु' शब्द द्वारा सम्बोधित करने का उल्लेख सम्प्रति किन्हीं नाटकों में
प्राप्त नहीं होता ।
१ मार्षो—क० । २. समानो हि—ख; ग० ।
३. होहं वा इति वाधमः—ग० । ४. सूते तु सर्वथा—क० ।
५. तपस्वी च प्रशान्तश्च साधो इति हि शब्द्यते—ख०; ग० ।