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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 460, कुल 668 में से

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पृष्ठ 460

एकोनविंशोऽध्यायः ३४९
उनकी इच्छानुसार सम्बोधित किया जाए तथा राजाओं को भी ब्राह्मणों को
पूज्य मान कर ऐसे सम्बोधन किये जाने पर उन्हें क्षमा करना चाहिए ॥६॥
ब्राह्मण का मन्त्री के प्रति सम्बोधन शब्द—
ब्राह्मणैः १सचिवो वाच्यो ह्यमात्य सचिवेति वा२ ।
शेषैरन्यजनैर्वाच्यो हीनैरार्येति नित्यशः ॥ ७ ॥
ब्राह्मणों के द्वारा मन्त्री को “अमात्य” तथा “सचिव” शब्द से
सम्बोधित किया जाए तथा अन्य अधम तथा छोटे पद धारी पात्रों के द्वारा
उन्हें 'आर्य' शब्द से सदा सम्बोधित किया जाए ॥ ७ ॥
समान अवस्था के व्यक्तियों के प्रति सम्बोधन—
समैः सम्भाषणं कार्यं येन नाम्ना स संज्ञितः ।
-समान वयस्कों द्वारा जिसका जो नाम हो उसे उसी नाम से सम्बोधित
किया जाए१।
हीन अवस्था के व्यक्तियों से सम्बोधन शब्द—
हीनैः३ सपरिवारन्तु नाम्ना सम्भाष्य उत्तमः ॥ ८ ॥
अधम पात्र के द्वारा उत्तम पुरुष को उसका नाम४ लेकर सम्बोधित
किया जाए (जब कि वह ऐसा करने की असामान्य अवस्था रखे) ॥ ८ ॥
सेवक, शिल्पी आदि के लिये संबोधन—
४नियोगाधिकृतश्चैव पुरुषाः योषितस्तथा ।
५सेवकाः शिल्पिनश्चैव सम्भाष्यास्ते तथैव हि ॥ ९ ॥
१. इस नियम के अनुसार नाट्यरचनाओं में सम्बोधन अधिक मिलते
नहीं हैं।
२. जैसे राक्षस को आर्य के अतिरिक्त प्रतीहारी का अमात्य सम्बोधन
करना। (दे० मुद्रा० रा०)
३. जैसे मुद्राराक्षस में चाणक्य का राक्षस को दिया गया सम्बोधन।
४. जैसे चारुदत्त द्वारा अपनी सेविका को उसका नाम लेते हुए (यथा —
रदनिके) सम्बोधित करना।
१. सचिवैर्वाच्यं—क०; सचिवैर्भाष्यो—ख०। २. वै—क०।
३. सपरिचारं तु वाच्यं नामोत्तमस्य तु—क०; सपरिहारं तु—ख०; ग०।
४. नियोगाधिकृता ये तु याः स्त्रियः पुरुषास्तथा—ख०; ग०।
५. कारुकाः—क०; कारकाः—ग०।