सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

अष्टादशोऽध्यायः
भाषाविधानाध्यायः
प्राकृत-पाठ्य-लक्षण—
एवन्तु¹ संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः² ।
प्राकृतस्य³ तु पाठ्यस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १ ॥
इस प्रकार (पूर्व अध्याय में) मैंने संक्षेप में संस्कृत-पाठ्य¹ के विषय में
बतलाया। अब मैं प्राकृत-पाठ्य का लक्षण कहता हूँ ॥ १ ॥
एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवर्जितम् ।
विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ २ ॥
यही संस्कृतपाठ्य जब संस्कार के गुणों से हीन होकर परिवर्तित
१. पिछले दो अध्यायों में वाचिक अभिनय के निरूपण के प्रसंग में संस्कृत
तथा प्राकृतपाठ्य का उल्लेख किया जा चुका है। इनमें संस्कृतपाठ्य के
सन्दर्भ में विविध छन्दों का लक्षणपूर्वक निरूपण पिछले अध्याय में होने
पर भी प्राकृत पाठ्य का स्वरूप शेष ही रह जाता है। अतएव इस
अध्याय में प्राकृत-पाठ्य का स्वरूप निरूपण आवश्यक होने के कारण
इसकी पूर्व अध्याय से संगति (स्थापित होती) है। 'पाठ्य' का अर्थ
है जो विशेषतापूर्वक पढ़ा या कहा जाए या प्रयत्नपूर्वक पढ़े जाने या
कहे जाने के जो योग्य हो अथवा जो किसी विशेष रूप में या विशेष
विधि के द्वारा उच्चारित हो, क्योंकि आन्तरिक चित्तवृत्ति के अनुरूप
जब किसी वचन का उच्चारण उपयुक्तता किये हुए होता है तभी उसे
पाठ्यसंज्ञा प्राप्त होती है जिसकी आचार्य द्वारा विधिवत् शिक्षा दी जाए
और ऐसा शिक्षित होकर किया हुआ उच्चारण ही 'पाठ्य' कहलाता भी
है। आचार्य अभिनवगुप्त ने पाठ्य शब्द के यही तीन प्रकार के निर्वचन
प्रस्तुत किये हैं। (द्र० अभि० भा०—पठनाहं, पठितुं शक्यम् आचार्य-
यत्नेन वा पठनीयमिति पाठ्यम् ।)
१ पाठ्यन्तु संस्कृतं विप्राः; एतत्तु—क० ।
२. द्विजोत्तमाः—ग० । ३. प्राकृतस्यापि—क० ।

३२६ | नाट्यशास्त्रम्

स्वरूप वाला हो जाता है तो 'प्राकृतपाठ्य' कहलाता है । विभिन्न दशाओं
के कारण परिवर्तित होने वाला इसका अपना विशेष स्वरूप होता है ॥ २ ॥
प्राकृतपाठ्य के तीन प्रकार—
त्रिविधं तच्च¹ विज्ञेयं नाट्ययोगे² समासतः ।
समानशब्दं ³विभ्रष्टं देशीगतमथापि च ॥ ३ ॥
नाट्य प्रदर्शन (या रचना) में होने वाला यह प्राकृतपाठ्य तीन प्रकार
का होता है। यथा—(१) समानशब्दों या तत्सम से होने वाला
(२) विभ्रष्ट या तद्भव शब्दों से होने वाला तथा (३) देशी शब्दों से
होने वाला¹। ३ ॥
[ ⁴पाठ्यमेकन्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा । ]
⁵कमलामलरेणुतरङ्गोलोलसलिलादिवाक्यसम्पन्नम्⁶ ।
प्राकृतबन्धेष्वेवं⁷ ⁸संस्कृतमपि⁹ योगमुपयाति ॥ ४ ॥
संस्कृत के समान प्राकृत में भी कमल, अमल, रेणु, तरंग, लोल, सलिल
आदि समान शब्दों से निर्मित वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात्
ये समान रूप से प्रयुक्त होने से तत्सम शब्द हैं जिनका दोनों भाषाओं में
अपने वाक्यों में नियमित प्रयोग किया जाता है ॥ ४ ॥
ये वर्णाः ¹⁰संयोगस्वरवर्णान्यत्वमूनताञ्चापि¹¹ ।
¹²यान्त्यपदादौ प्रायो विभ्रष्टाँस्तान् विदुर्विप्राः ॥ ५ ॥
जो शब्द स्वर या वर्ण के परिवर्तन के कारण पदों या वाक्यों के साथ
१. समानशब्द, विभ्रष्ट तथा देशीगत को परवर्ती व्याकरण तथा नाट्य के
आचार्यों ने तत्सम, तद्भव ओर देशी शब्द से अभिहित किया ।
१. तद्धि—क० । २. नाट्ययोगं—क० ।
३. शब्दैर्बिनष्टं—क०, शब्दैर्विभ्रष्टं—ख० ।
४. इदं श्लोकार्धं ख० ग० पु० नास्ति ।
५. कमलदलरेणुकेसरतरङ्गसलिलादि—क० ।
६. लोलजालादि, लोलसलीलादि—क० । ७. ष्बेतत्—क० ।
८. संयुक्तमपि, संस्कृतमिव—क० ।
९. मिव प्रयोगमुपयाति—ग० ।
१०. संयुक्ताः—क०; ख०; संयोगात्—ग० ।
११. न्यूनतां वापि—ग० ।
१२. गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते विभ्रष्टा इति ज्ञेयाः—ख०; ग० ।

प्रयोगार्थ सम्बद्ध किये जाने पर अपने समवेत स्वरूप को परिवर्तित कर
लेते हों तो उन्हें विभ्रष्ट या अपभ्रष्ट शब्द समझना चाहिए ॥ ५ ॥
[ ये¹ वर्णा वर्णगता व्यञ्जनयुक्ताश्च ये स्वराः नियताः ।
तानपरस्परवृत्ते प्राकृतयुक्त्या प्रवक्ष्यामि ॥ ]
(तथा वर्ण हों अथवा वर्णों में आने वाले व्यञ्जन से युक्त जो नियत
स्वर हों उनमें परस्पर होने वाली या विद्यमान रहने वाली स्वर या व्यंजन
की स्थिति को भी मैं प्राकृत भाषा के नियमों के अनुरूप निरूपण करता हूँ ।
स्वर तथा असंयुक्त व्यञ्जन—
यथा—²एओआरपराणिअ अंआरपरं³ ⁴अ पाउए णत्थि ।
वसआरमज्झिमाई⁵ ⁶अ कचचवग्गतवग्गणिहणाइँ ॥ ६ ॥
[ एओकारपराणि च अङ्कारपरञ्च प्राकृते नास्ति ।
वसकारमध्ये च कचवर्गंतवर्गनिधनानि ॥ ]


१. पद्यमेतत्—ख०, ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
२. 'एओआर' इत्यादिलक्षणश्लोकाः अतीवास्फुटा ख० ग० पुस्तकयोः ।
क० पुस्तकटिप्पण्यां लक्षणश्लोकानां स्थाने गद्यतामापन्नः पाठभेदोऽपि ।
स च यथा—क ख घ त थ ध भ सा हत्वं यान्ति । यथा—फलिह,
मुह, मेह, वसहि, रह, दहि, सोह। दिअहेसु । शषौ सकारौ भवतः ।
यथा—ससंकं विसमेसु । टतदा डत्वं यान्ति । यथा—विड पडि
अदंडासु । ट ठ ड द य राः लत्वं यान्ति । यथा—विअ लालिअ तुल
पवितुला विहलयदीसु । थकारो ढत्वं प्राप्नोति । यथा—वुड्ढो । नकारो
भवति णकारः । यथा—णयणं । पकारो फत्वं याति बत्वञ्च । यथा—
फरुसं कवदं च । धकारः ठत्वं याति । यथा—वठि । लकारो रत्वं याति ।
यथा—किर । टठौ डत्वं प्राप्नुतः । यथा—सढः फढमं फलिअं । तजौ
यत्वं प्राप्नुतः । यथा—कयं धयं । श च ज तदपयवाः स्वरशेषा भवन्ति ।
यथा—विउण, पउप, राइ, बई, णई, कइ, दइआ जयेसु । योगं याति
यथा—अच्छरियं उच्छाहो अच्छरसा पच्छं । तुज्झं सञ्झं विज्झो ।
श्लक्षणं—सल्हं । ग्रीष्मो—गिम्हो । दृष्टो—दिट्ठो । हस्तो—हत्थो ।
यक्षो—जक्खो । ब्रह्मा—बम्हा । बृहस्पतिः—बुहप्पइ । यज्ञो—जञ्ञोत्ति ।
३. अआर —क० । ४. पाइए—क० ।
५. गज्झिआइ—क० । ६. कचचवग्ग —क० ।

३२८ नाट्यशास्त्रम्
जो 'स्वर 'ए' तथा 'ओ' के आगे आने वाले अर्थात् 'ऐ' और 'औ हो,
अनुस्वार के आगे आनेवाले अर्थात् विसर्ग हो प्राकृत भाषा में उनका कोई
प्रयोग नहीं होता। इसी प्रकार प्राकृत भाषा में पाद (अर्थात् चार) स्वरों
(ऋ, ॠ, लृ, लॄ) का तथा 'व' और 'स' के बीच रहने वाले वर्णों
(अर्थात् 'श' 'ष' 'ष') का तथा क, च और त वर्ग के अन्तिम वर्ण
(अर्थात् ङ०, ञ० और न) का भी व्यवहार नहीं होता है। अर्थात् इस
भाषा में ये बारह वर्ण शब्दों (पदों) में नहीं रहते या लुप्त हो जाते हैं ॥६॥
१वच्चन्ति कगतदयवा लोवं अत्थं च२ से वहन्ति सरा ।
३खघथधमा उण ४हत्तं उवेंति अत्थं५ अमुञ्चन्ता ॥ ७ ॥
[ प्राप्नुवन्ति कगतदयवा लोपं अर्धञ्च तेषां वहन्ति स्वराः ।
खघथधमाः पुनः हत्वमुपेयन्ति अर्थञ्चामुञ्चमानाः ॥ ]
क, ख, ग, त, द, य और व का लोप हो जाता है। (शेष स्वरों वाले
उन्हीं शब्दों से वही अर्थ प्रकट होता है। और इनका आधा भाग स्वरों
में मिल जाता है। ख, घ, भ, ध, और भ को 'ह' आदेश हो जाता है।
तथा इस परिवर्तन या आदेश के कारण अर्थ में कोई परिवर्तन नहीं
होता२ ॥ ७ ॥
१. स्वर तथा असंयुक्त व्यंजन विषयक कारिकाएं नाट्यशास्त्र में प्राकृत में
तथा विश्रष्ट-पाठों में प्राप्य है। यहाँ हमने बड़ौदा संस्करण के अनुसार
संशोधन कर पाठ लिया गया है। (इन्हें कुछ विद्वान् प्रक्षिप्त भी मानते
हैं।) हमने इनकी संस्कृत-छाया को लगाकर व्याख्या की है।
२. जैसे स्पष्टतः—दूसरे शब्दों की अवस्था में कठोर ध्वनि या महाप्राणवर्ण
में कोई परिवर्तन नहीं होता है। जैसे—परिघ, अथ, वध, परिह,
अह, वह।
अल्पप्राण व्यंजन यहाँ अन्तःवर्ती अ से युक्त समझे जाना चाहिए इनमें 'अ'
केवल उच्चारणार्थ ही रखा गया है।
सारो (स्वर) से यहाँ 'अर्थ' अभीष्ट है व्यंजन-ध्वनि नहीं।
१. वच्चंति कगत्रजगदावा—वच्चति कटतदवयवाः—क० ।
२. व सिस्वहृत्ति सरा—ख० ।
३. खघधभउण—, खघघुधः उणइ—क०, खद्यधा भद्यथा उण—ख० ।
४. हत्तं उवेंति—हत्त उषति—हत्तं वेंति—क०, हतं तुवेति—ख० ।
५. अंगवअं चंता, अत्थं समुंचंता—अग्ग अमच्चता—क; अत्थं अमुंघना—ख० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३२९
१उप्परहुत्तरआरो २हेट्ठाहुत्ते अ पाअए णत्थि ।
३मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रहदचन्दजाईसु ॥ ८ ॥
[ उपरिस्थ-रकारः अधस्थः च प्राकृते नास्ति ।
मुक्त्वा भद्रवोद्रहदचन्द्रधात्रीषु ॥ ]
प्राकृत में 'र' (रेफ या अर्द्धरकार) का ऐसा कोई प्रयोग नहीं होता जो
किसी वर्ण के ऊपर या नीचे स्थित रहता हो। परन्तु केवल यह नियम मद्र,
वोद्रह, हृद, चन्द्र और धात्री शब्द को छोड़कर समझना चाहिए ॥ ८ ॥
४खघथधभाणहआरो ५मुह-मेहकहावहू-पहूएसु ।
६कगतदयवाणं णिच्चं बीयम्मि ठिओ सरो होइ ॥ ९ ॥
[ खघथधभानां हकारः मुखमेघकथावधू प्रभूतेषु ।
कगतदयवानां नित्यं द्वितीये स्थितः स्वरो भवति ॥ ]
ख, घ, थ, ध, और भ को हकारादेश हो जाता है जैसे—मुख—मुह,
मेघ—मेह, कथा—कहा, वधू = वहु, प्रभूत = पहुअ। तथा क, ग, द,
और व—जो कि इन वर्णों के पूर्वाक्षर हैं इनके प्रतिनिधि रहते हैं सदा
द्वितीय स्वर के रूप में ॥ ९ ॥
१. उंपर अन्तरआरो, उप्पाहृत रयारो, उरउर हारो, उच्चरउरहारो०,
उघरहुत्तरसाहो, उच्चरउरआरो, डप्परहुतुरअरो, इंघर उत्तरहारो—
क०; उधरफुतरसासाहे—ख० ।
२. रेभत्तत्तो अ वाअए णंथि, हेटाहुत्तो अ पाअए णत्थि, हेठ्ठाहुत्तो
अपाणत्थि, हेणणहत्थो अ वाअए णत्थि—हेहाफुत्तप्लययायए णत्थि—
हद्धाहुस्तआ पइए णत्थि—क० ।
३. मोत्तूण भुदावो दहददहचन्द्रजाईसु, मोत्तूण भद्रवोद्रहपद्रद्रह, मोहूण
भाभ्रवोभ्रहरुभट्टगचन्द्र, मांभूषणभूभूओभूवरुभूदुहचन्द्र—(?), मोंतूण
भाद्रबोद्रवभद्रचन्द्र—मोत्तूण वंइडोद्रहपउर्जइसु—क० ।
४. खयषधभाणहयाने—ख० ।
५. मुहकहापह्मुरिच्छेसु—क० ।
६. कगतिदषाण अणिच्चलोपजमपि ओसरो होइ, कगतदयपाण णिच्चं विइअ
मिठिअ सरो होई, कगनदजवाण णिचलोपम्मि उं ओसरो होई—
कगतदजवारमणिच्चं वीयंति डिउसरो होइ—क०; कगतदजब्राण
विच्चा वोयं मिठिउ सरो होइच्छे—ख० ।

३३० नाट्यशास्त्रम्
'छ इति षकारो नित्यं बोद्धव्यः २षट्पदादियोगेषु ।
३किलशब्दान्त्यो रेफो भवति तथा ४खुत्ति खलु शब्दः ॥१०॥
१'षट्पद' आदि ( शब्द या गण ? ) में रहने वाले 'ष' को प्राकृत भाषा
में नित्य 'छ' हो जाता है । जैसे—छतपद । किल शब्द का अन्तिम 'ल' का
'र' हो जाता है और 'कु' शब्द को 'खु' ख ( आदेश ) हो जाता है ॥१०॥
'ड इति च भवति टकारो ६भटकटककुटीतटाद्येषु ।
सत्वं च भवति शषयोः ७सर्वत्र यथा विसं सङ्का ॥ ११ ॥
'ट' का 'ड' हो जाता है भट, कुटी, तट इत्यादि शब्दों में
( जैसे—भट = भड, कुटी = कुडी, तट = तड ) । तथा सर्वत्र 'श' ष के
स्थान पर 'स' कार आदेश हो जाता है । जैसे विष = विस, शंका = संका
इत्यादि ॥ ११ ॥
अस्पष्टश्च दकारो भवत्यनादौ तकार ८इतराद्यः ।
'बडवातडागतुल्यो ९भवति डकारोऽपि च लकारः ॥ १२ ॥
१. षट्पदादिगण के विषय में आचार्य अभिनवगुप्त कुछ भी संकेत नहीं
करते । न ही अन्यत्र इस गम का विवरण या संकेत प्राप्त है ।
१. छे इति षकारो, च इति चकारो, इत्ति यकारो; छ इति षआरो—हृषि
उषिति षकारो—क० ।
२. षट्पादे तु, अपदादियोगे तु, षट्पदानि योग्ये तु—क० ।
३. कृति शब्दो रेफान्तेन भवन्ति तथा पुत्रि खलुशब्दः; किलं शब्दो कोरे
भवति तदा खुत्ति खलु शब्दः; खिल शब्दाद्यो रेफो—क०; किल शब्दो
रेफान्तो—ख० ।
४. खुत्ति खिलशब्दः, भवति तथा त्ति खलु शब्दः, तथा खुनिखलशब्दः-क० ।
५. त इति च भवति टकाते, ड इति च टकारो—क० ।
६. भटकटककुटीकुटावटाद्येषु, भटकटकुटीकुटावडाद्येषु, कटकटक......,
नडकडुकुटी तडाष्वेषु, नटकटुटीतटाद्येषु-क०, भटकुटकुटितटाद्येषु—ख० ।
७. विससंका, यथा हि विससंका, तथापि ससकादेशः, तथापि ससकादेः
सा—क०; सर्वत्र तथाहि विससंका—ख० ।
८. इतराद्याः—क०; इतराद्ये—ख० ।
९. बडवाडडाग, वडवडवा—क० ।
१०. भवन्ति डकारोऽपि लकारं—क० ।

'इतर' आदि शब्दों में स्थित 'त' को—जो कि शब्द के प्रारंभ में विद्यमान
नहीं—अस्पष्ट 'द' के रूप में उच्चारित किया जाता है तथा बडवा और
तडाग शब्द में विद्यमान 'ड' का ल हो जाता है। जैसे—बडवा = बलवा ।
तडाग = तलाग¹ ॥ १२ ॥
¹वर्द्धनगते च भावे ²धकारवर्णोऽपि ढत्वमुपयाति ।
सर्वत्र च प्रयोगे भवति ³नकारोऽपि च णत्वमुपयाति ॥१३॥
'ध' वर्ण को (जो शठ, पाठ, पीठिका आदि शब्दों में हो-) 'ढ' हो जाता
है । सभी प्रयोगों में 'न' कार के स्थान पर 'ण' कार का उच्चारण किया
है । जैसे:--आपान = आवाण ।
आपाणं आवाणं भवति पकारेण ⁴वत्वयुक्तेन ।
⁵अयथातथादिकेषु तु ⁶थकारवर्णो व्रजति धत्वम् ॥ १४ ॥
'प' कार को 'व' कार हो जाता है। जैसे आपान = आवाण ।
और यथा तथा शब्द के अतिरिक्त शब्दों में स्थित 'थ' कार को 'ध' कार
हो जाता है ।
⁷परुसं फरुसं विद्यात् पकारवर्णोऽपि ⁸फत्वमुपयाति ।
यस्तु मृतः ⁹सोऽपि मओ यश्च मृगः सोऽपि तथैव ॥१५॥
१. जो बिना किसी विभेद के 'ड' उच्चारण किया जाता है वह 'द' है, जो
लकार की छाया लिए हुए है। इसे अस्पष्ट होने से लघुप्रयत्न के द्वारा
उच्चार्य समझना चाहिए जैसे :—उदर = उलरम् । ( अभि० भारती० )
२. वर्द्धन में 'द्व' को ढ हो जाता है। यथा—वर्द्धनम् = वड्ढणम् ।
१. वधुमधुशब्दे च तथा, शठपाठपीठि आदि सु, शठपाठपीठिकादिषु—क०,
पद्ममधुशब्दे च तथा—ख० ।
२. धकार वर्णो हकारतां याति; टकारवर्णोऽपि ठत्वमुपयाति, ठकारवर्णोऽपि
ढत्व—क० ।
३. मकारोऽपि च णकारः—क०; ख० ।
४. आवाणं आधाणं भवति वकारेण च धयुक्तेन, पकारेण नत्वयुक्तेन—क० ।
५. अयथातथादिषु केषु—क० ।
६. भकार वर्णो, धकार वर्णो व्रजति पत्वम्, थकारवर्णो व्रजति हत्वम्—क० ।
७. परुसं हरुसं—क० । ८. पकारवर्णोऽपि हत्वमुपयाति—क० ।
९. सोऽपि मटो, सोऽपि मंडोडि यस्तु मृतः सोऽपि मओ—क० । यस्तु मृगः
सोऽपि मओ यस्तु मृतः सोऽपि तथैव—ख० ।

३३२ नाट्यशास्त्रम्
किसी स्थान पर स्थित 'प' को 'फ' हो जाता है । जैसे—परूसं=फरूसं
तथा 'मृग' और मृत शब्द का प्राकृत में एक ही 'मओ' रूप बनता है१ ॥१५॥
१ओकारत्वं गच्छेदौकारश्चौषधादिषु नियुक्तः ।
२प्रचलाचिराचलादिषु ३भवति चकारोऽपि तु यकारः ॥१६॥
'ओषध' आदि शब्दों में स्थित 'औ'को 'ओ'कार हो जाता है । जैसे—
औषध = ओसढ़ । तथा प्रचय, अचिर और अचल शब्दों में स्थित 'च'२ को
'य' हो जाता है । यथा प्रचय = पयय, अचिर=अयिर, अचल=अयल ॥१६॥
४अपरस्परनिष्पन्ना ह्येवं प्राकृतसमाश्रया वर्णाः ।
संयुक्तानां तु पुनर्वक्ष्ये परिवृत्तिसंयोगम् ॥ १७ ॥
इस प्रकार मैंने असंयुक्त वर्णों वाले प्राकृत शब्दों के वर्ण ( परिवर्तन )
विषयक नियम बतलाए । अब मैं संयुक्त वर्णों के ( विषय में ) होने वाले
परिवर्तन, आदेश आदि नियमों को बतलाता हूँ ॥ १७ ॥
संयुक्त-व्यञ्जन—
५श्वप्सत्सथ्याः छ इति तथा भ्यह्यध्या ६भवन्ति तु झकाराः ।
७ष्ठः ट्टः स्तः त्थः ष्मो म्ह क्ष्णो ण्हः ष्णो ण्हः क्षः खकाररूपोऽपि ॥१८॥
१ मृग तथा मृत शब्द में स्थित 'मा' में एक संघर्षीकृत या ऊष्म 'द' होगा
जो 'याश्रुति' के अनुसार प्राचीन काल में ही ध्वनिपरिवर्तन के कारण
लुप्त हो जाने से संप्रति प्रतीत नहीं होता है ।
२. यहाँ 'च' के लिए संभवतः याश्रुति को मानना उसके सहसा सुस्पष्ट लोप
को प्रकट नहीं करता प्रतीत होता है ।
१. ओकारत्वं गच्छन्ताकार—क०; ओकारत्वं गच्छत्योवार—ख०; ग० ।
२. प्रचलायिताचल—प्रचलापिताचला—क०; प्रचया चिरा—ख०; ग० ।
३. चकारवर्णोऽपि च यकारः—ख०; ग० ।
४. अपरस्वरनिष्पन्ना—ख०; ग० ।
५. झप्सश्चः छ इति तथा राज्ञै तु तकार योग उपयातः, तच्छो अच्छरपच्छ
रूपे च्सं संज्ञाह्य स च सझौ—( ? ) क०; श्चत्सप्सां च्छ इति ध्यम्हयो-
र्भवति तुज्झकारः—ख०; ग० ।
६. व्रजति वै झत्वम्—क० ।
७. ष्ठो ट्टो स्तोत्रः शेषो लक्ष्मक्ष्मो ह्वक्षणः खकाररूपोऽवि, स्तत्थोष्ट्ठः क्ष्ण
ख इति चैव स्यात्, श्चत्सथ्याः छ इत्यह्व्याम्बा भवन्ति तु झकाराः,
यूष्ट स्तः त्थः भ्याह्लः क्लाष्टा ह्लक्षः ख इति चैव स्यात् ( ? )—क०;
ष्ठः ट्ठः स्तः त्थ ष्णलक्ष्णां ह्रः क्षः खकाररूपो हि—ख०; ग० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३३३
श्व, प्स, त्थ और थ्य को 'छ' कार तथा ध्य, ह्य और ध्य को 'झ'
कार हो जाता है। इसी प्रकार ष्ट को 'ट्ठ' स्त को 'त्थ' ष्म को 'म्ह' ष्ण,
क्ष्ण का 'ण्ह' और 'क्ष' का 'क्ख' आदेश हो जाता है ॥ १८ ॥
१आश्चर्यं अच्छरियं निश्चयमिच्छन्ति २णिच्छयं च यथा ।
३वत्सं वच्छं च यथा अप्सरसं तद्वदच्छरं ।
४उत्साहो उच्छाहो पथ्यं पच्छं च विज्ञेयम् ॥ १९ ॥
इन नियमों से इस प्रकार शब्द हो जाते हैं:—ये क्रमशः 'आश्चर्य का
अच्छरियं (श्व के स्थान पर 'च्छ'। निश्चय का णिच्छय (वही नियम)।
उत्साह का अच्छाह (त्स के स्थान पर 'च्छ') तथा पथ्य का पच्छ (थ्य
के स्थान पर 'छ') हो जाता है ॥ १९ ॥
तुभ्यं तुज्झं मह्यं मज्झं विन्ध्यश्च भवति ५विज्झोत्ति ।
६दृष्टो दट्ठोत्ति तथा हस्तोऽपि च भवति हत्थोत्ति ॥ २० ॥
तथा तुभ्यं का तुज्झं (भ्य के स्थान पर 'झ')। मह्यम् का मज्झम्
(ह्य के स्थान पर 'झ')। दृष्ट का दट्ठ (ष्ट के स्थान पर 'ट्ठ')। और
हस्त का हत्थ ('स्थ' के स्थान पर त्थ) ॥ २० ॥
ग्रीष्मो ७गिम्होत्ति तथा श्लक्ष्णं सण्हं ८सदा तु विज्ञेयम् ।
९उष्णं उण्हं यक्षो जक्खो पलंकु भवति पर्यङ्के ॥२१॥
इसी प्रकार ग्रीष्म का गिम्ह (ष्म के स्थान पर 'म्ह')। श्लक्ष्ण का
सण्ह (क्ष्ण के स्थान पर 'ण्ह')। उष्ण का उण्ह (ष्ण का ण्ह अथवा
१. आश्चर्यान्मात्सर्ये—क०, आश्चर्यं मात्सर्ये चेत्यनयोर्यंस्य रियं च तथा—
ख०; ग० ।
२. णिच्छयंति तथा—क० ।
३. श्लोकार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयो नास्ति ।
४. उत्साहश्चोत्साहो—ख०; ग०। ५. विज्झ इति—ख० ।
६. दृष्टो दट्ठ इति स्यात् हस्तोऽपि च हत्थ इत्येवम्—ख०; ग० ।
७ गिम्ह इति, गिह्मन्ति—क०; गिम्हो च तथा—ख०; ग० ।
८. सण्हं तु सदा—क०; ण्हुं तु सदा—ख०; ग० ।
९. उष्णञ्च भवेदुण्हं यक्षो जक्खोत्ति योण्ह श्च भवति पल्लङ्क; उष्णञ्च
भवेदुष्णं यक्षो जक्खोत्ति पर्यन्तम्—क०; कृष्णं कण्हं च भवेद्यक्षो जक्खो
पल्लंक पर्यङ्के—ख० ।

३३४ | नाट्यशास्त्रम्
कृष्ण का कण्ह—वही नियम ), यक्ष का जक्ख ( क्ष के स्थान पर 'ख' )
तथा पर्यङ्क का पल्लंक ( र + य के स्थान पर 'ल' ) ॥ २१ ॥
१विपरीतं हमयोगे ब्रह्मादौ स्यात् बृहस्पतौ २फत्वम् ।
३यज्ञो भवति तु ४जण्णो भीष्मो ५भिम्होत्ति विज्ञेयः ॥ २२ ॥
ब्रह्मादि शब्दों में ह और म के योग में एक दूसरे के विपरीत स्थान में
ये अक्षर हो जाते हैं जैसे ब्रह्मा—बम्हा । ( यहां 'ह' और 'म' उलट कर
एक दूसरे के स्थान पर हो गए हैं । ) तथा बृहस्पति शब्द में 'ब' को 'फ'
हो जाता है जैसे—बृहस्पति—बुहप्फई । इसी प्रकार 'यज्ञ' का 'जण्ह तथा
भीष्म का भिम्ह रूप हो जाता है ॥ २२ ॥
६उपरिगतोऽधस्ताद्वा भवेत्ककारादिकस्तु यो वर्णः ।
स हि संयोग-विहीनः शुद्धः७ कार्यः प्रयोगेऽस्मिन् ॥ २३ ॥
जब 'क' किसी वर्ण के साथ संयुक्त हो या इस वर्ण के सिरे पर रेफ
आदि अन्य वर्ण हो तो इनका उच्चारण दशा में संयोग रहित रूप होता
है । जैसे १शक्र = सक्क । अर्क = अवक आदि ( यहां र के संयुक्तवर्ण होने
पर भी क ही शेष रहा ) ॥ २३ ॥
८एवमेतत्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा९ ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि देशभाषाविकल्पनम् ॥ २४ ॥
१. सक्क आदि रूप स्पष्टतः स्वरभक्ति के नियम से सम्बद्ध हैं । किलेश
( क्लेश ), दुवार ( द्वार ) आदि भी इसी नियम के अतिरिक्त उदाहरण
हो सकते हैं ।
१. ब्रह्मा च भवति बम्हो बृहस्पतिर्वे बुहप्फइ भवति—क०; विपरीत
मयोगेन ब्रह्मादो—ख०; ग० ।
२. हत्वम्—क० । ३. यज्ञश्च भवति—क० ।
४. जण्हो, यण्णो—क० ।
५. भिम्हत्ति—भिम्हृत्ति—भीह्म इति—क० ।
६. उपरिगतो हस्ताद्वा—ख०; उपरिगते तोऽधस्तान्वा—ग० ।
७. शुद्धं कार्य प्रयोगेऽस्मिन्—ग० ।
८. पाठ्यमेतत्तु—क०; एवमेव तु—ग० ।
९. एवमेतत् मया प्रोक्तं किञ्चित्प्राकृतलक्षणम् ।
शेषं देशीप्रसिद्धञ्च ज्ञेयं विप्राः प्रयोगतः ॥
इति पाठः क० पुस्तके च ।

अष्टादशोऽध्यायः ३३५
इस प्रकार संस्कृत तथा प्राकृतभाषा के उच्चारण ( पाठ्य ) को सीखा
जाए। अब मैं देशी भाषाओं का विभागपूर्वक वर्णन करता हूँ ॥ २४ ॥
भाषाओं के चार प्रकार—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया १दशरूपे प्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥ २५ ॥
नाटक आदि में प्रयुक्त की जाने वाली भाषाएँ चार प्रकार की होती हैं,
जिनमें पाठ्य रखा जाए। वे या तो संस्कृत या प्राकृत भाषा ( के किन्ही
प्रकारों में से ) होती हैं ॥ २५ ॥
'अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव ३भाषा नाट्ये प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥
भाषाओं के नाट्य प्रयोग में होने वाले चार प्रकार होते हैं—यथा—
(१) अतिभाषा, (२) आर्यभाषा, (३) जातिभाषा तथा (४) जात्यन्तरी भाषा
( योन्यन्तरी भाषा )१ ॥ २६ ॥
'अतिभाषा तु देवानामार्यभाषा' तु भूभुजाम् ।
संस्कारगुणसंयुक्ता६ ७सप्तद्वीपप्रतिष्ठिता ॥ २७ ॥
देवगण की 'अतिभाषा' तथा भूपालों की 'आर्यभाषा'२ होती है। इन
१. आचार्य अभिनवगुप्त ने अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों के मत में आर्य भाषा की
अन्य भाषाओं से विलक्षणता का निदान उनका वैदिक शब्द बाहुल्य
बतलाया ( जो दूसरे टीकाकारों का मत है )। इनका स्वयं का मत है
कि वक्तृभेद से संस्कृत तथा प्राकृत-पाठ्य के चार प्रकार हो गए थे जैसा
कि भरत ने भी माना है।
२. अतिभाषा तथा आर्यभाषा संभवतः भारतयोरोपीय भाषा की कोई बोली
होंगी। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत का एक भाषा के रूप में
१. दशरूपेषु योक्तृभिः—क; देशरूपप्रयोगतः—ख०; ग० ।
२. अभिभाषा—क० ।
३. भाषा वै नाटकाश्रयाः—क०; भाषा नाट्यप्रकीर्तिताः—ग० ।
४. सत्यादिभाषा देवानां—क०; अभिभाषा तु देवानां—ख० ।
५ आर्यभाषेति कीर्तिता—क० । ६. सम्पन्ना—क० ।
७. सम्यङ्न्यायप्रतिष्ठिता, सम्यक् राज्ये प्रतिष्ठता; सम्यग् नाट्यप्रतिष्ठिता—
क०; सम्यग्ग्रामप्रतिष्ठिता—ख० ।

३३६ नाट्यशास्त्रम्
भाषाओं में संस्कार रूप विशेष गुण विद्यमान होने से इनका सातों द्वीपों में
प्रचलन है ॥ २७ ॥
जातिभाषा—
द्विविधा१ जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
२म्लेच्छशब्दोपचारा३ च ४भारतं वर्षमाश्रिता ॥ २८ ॥
नाटक में प्रयोग की जाने वाली जाति भाषा दो प्रकार की होती है ।
इनमें अनेक अनार्य तथा म्लेच्छों के द्वारा व्यवहार में आने वाले शब्द
समाविष्ट रहते हैं, जो कि भारतवर्ष में बोली जाती है ॥ २८ ॥
जात्यन्तरी-भाषा—
अथ योन्यन्तरी भाषा ५ग्राम्यारण्यपशूद्भवा ।
नाना-विहङ्गजा६ चैव नाट्यधर्मीप्रतिष्ठिता७ ॥ २९ ॥
तथा जात्यन्तरी भाषा१ वह है जो ग्राम में तथा जंगल में रहने वाले
पशुओं तथा पक्षियों की भाषा होती हो—इसका नाट्यधर्मी विधान से नाटक
आदि प्रयोगों में अनुसरण किया जाए ॥ २९ ॥
पाठ्य के दो प्रकार—
जातिभाषाश्रयं८ पाठ्यं द्विविधं समुदाहृतम् ।
प्राकृतं संस्कृतञ्चैव ९चातुर्वर्ण्यसमाश्रयम् ॥ ३० ॥
भरत ने विस्पष्ट उल्लेख नहीं किया । भोज ने अतिभाषा तथा जाति-
भाषा को क्रमशः श्रुति, पुराण ( आर्ष ) और लौकिक-भाषा माना है ।
१. नाट्यशास्त्र या इसके अनुसार निर्मित किसी संस्कृत नाट्य रचना में
जात्यन्तरीभाषा का प्रयोग प्राप्त नहीं होता न ही ( इसके ) अन्यत्र
भी उद्धरण या प्रयुक्त शब्द मिलते हैं ।
१. विविधा—ख० । २. म्लेच्छदेशप्रयुक्ता च—क० ।
३. चाराच्च—क० ।
४. तथा भारतसंश्रया—, तथा भारमाश्रिता—क० ।
५. ग्राम्यारण्य—ख० । ६. विहगजा चैव—ग० ।
७. नाटचधर्मे प्रतिष्ठिता—, नाटचधर्मप्रयोगजा०, नाटचधर्म प्रयोगतः—क०;
नाटचधर्मी प्रयोगतः—ख०; ग० ।
८. भाषाश्रितं—क० । ९ चातुर्वण्यादिसंश्रयम्—क० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३३७
जातिभाषा में होने वाला पाठ्य दो प्रकार का होता है। जो कि
चारों ब्राह्मणादि वर्णों से सम्बद्ध है। वह हैं—एक संस्कृतपाठ्य तथा दूसरा
प्राकृत पाठ्य ॥ ३० ॥
संस्कृत पाठ्य के प्रदेश या अवसर—
धीरोद्धते सललिते^१ धीरोदात्ते तथैव च ।
धीरप्रशान्ते^२ च तथा पाठ्यं योजयन्तु संस्कृतम् ॥ ३१ ॥
जो धीरोद्धत, धीरललित, धीरोदात्त या धीरप्रशान्त^१ प्रकार के नायक
हों तो उनमें संस्कृतपाठ्य की योजना की जाए ॥ ३१ ॥
प्राकृत पाठ्य के प्रदेश या अवसर—
^३एतेषामपि सर्वेषां नायकानां ^४प्रयोगजम् ।
कारणव्यपदेशेन प्राकृतं सम्प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
इन सभी नायकों में प्राकृत पाठ्य की योजना भी की जा सकती है,
जब कि इस प्रकार के अवसर या आवश्यकता आ पड़े ॥ ३२ ॥
[ ^५दारिद्र्याध्ययनाभावयदच्छादिभिरेव वा ]
^६ऐश्वर्येण प्रमत्तानां दारिद्र्येण^७ प्लुतात्मनाम् ।
^८उन्मत्तस्यापि पठतः संस्कृतं^९ न प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
यदि कोई उत्तम—पात्र अपने राज्य या ऐश्वर्य के प्राप्त होने पर अपने
पद में मत्त हो या फिर दरिद्रता से अभिभूत हो या उन्मत्त हो जाए तो
१. नायकों आदि के भेद तथा लक्षणादि ना० शा० अ० १६ में देखिये ।
१. धीरललिते—ख०; ग० ।
२. प्रशान्तके चैव—क० ।
३. एषामेव तु—ख०, ग० ।
४. प्रयोगजा—क०; प्रयोगतः—ख०; ग० ।
५. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
६. ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य—ख०; ग० ।
७. दारिद्र्येणाप्लुतस्य च—क०; दारिद्र्येण प्लुतस्य च—ग० ।
८. अनधीतोत्तमानाञ्च—क०; उत्तमस्यापि बुवतः—ख०; उत्तमस्यापि
पठतः ग० ।
९. प्राकृतं सम्प्रयोजयेत्—ख०; ग० ।
२२ ना० शा० द्वि०

३३८ नाट्यशास्त्रम्
(उसकी इन विकल या मदमत्त दशाओं में) संस्कृत¹ भाषा की योजना
नहीं रहनी चाहिए । अर्थात् ऐसी दशा में इस पात्र की भी प्राकृतभाषा रखी
जाए ॥ ३३ ॥
¹व्याजलिङ्गप्रविष्टानां² ³श्रमणानां तपस्विनाम् ।
भिक्षुचक्रचराणाञ्च⁴ प्राकृतं सम्प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥
वे पात्र जो किसी व्याज² से साधु सन्यासी का वेष धारण किये हों,
जो पात्र जैन साधु, साधु, भिक्षु तथा बाजीगर हों तो उनमें प्राकृतपाठ्य की
योजना की जाए ॥ ३४ ॥
⁵बाले गृहोपसृष्टे च स्त्रीणां⁶ स्त्रीप्रकृतौ तथा ।
नीचे मत्ते सलिङ्गे च प्राकृतं पाठ्यमिष्यते⁷ ॥ ३५ ॥
१. जैसे 'अर्जुन' पात्र के बृहन्नला के रूप में अज्ञातवास में रहने पर उसकी
भाषा मागधी या शौरसेनी रखना उचित है । नाट्यशास्त्र के इस उल्लेख
के अनुकूल स्थिति तथा अनुसरण का किसी संस्कृत नाटक में विवरण
नहीं मिलता । हां, 'विक्रमोर्वशीयम्' में दैव के कारण विरही राजा की
उन्माद अवस्था का वर्णन तथा प्राकृतापभ्रंश में संभाषण अवश्य
उपलब्ध होता है और इस पर नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त नियम की
छाया भी कदाचित् स्पष्ट परिलक्षित होती है ।
२. व्याज से साधु का वेश धारण करने का उल्लेख भास के 'कर्णभारम्' में
प्राप्त होता है जहां इन्द्र ब्राह्मण का वेष धारण करता है तब प्रयुक्त
भाषा वहां प्राकृत मिलती है । विराधगुप्त का 'मुद्राराक्षस' में सपेरे की
अवस्था में प्राकृत भाषा में संभाषण तथा यौगन्धरायण का अन्य
(भिक्षु) स्वरूप धारण करने पर 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' में प्राकृत
संभाषण उपर्युक्त नियमों के स्पष्टतः उदाहरण है ।
१. ऋतुलिङ्ग—क० । २. प्रतिष्ठानां—ख० ग० ।
३. श्रवणानां—क० ।
४. चक्रधराणाञ्च—क०; चाष्टचराणाञ्च ख०; ग० ।
५. पद्यमेतत्—कपुस्तके नास्ति ।
६. स्त्रीणाञ्च प्रकृतौ तथा—ख० ।
७. पद्यस्यास्य स्थाने क पुस्तके तु—
भागवततापसोन्मत्तबालनीचग्रहोपसृष्टेषु ।
स्त्रीनीचजातिषु तथा नपुंसके प्राकृतं योज्यम् ॥—इति पद्यं लभ्यते ।

अष्टादशोऽध्यायः ३३९
इसी प्रकार बालक, किसी भूत या पिशाच से ग्रस्त या लगे हुए व्यक्ति,
स्त्री प्रकृति के पुरुष, नीच जाति के पुरुष तथा कफनी झोला धारी पाखण्ड
साधुओं जैसे पात्रों की भी भाषा प्राकृत रखी जाए ॥ ३५ ॥
प्राकृत पाठ्यविधि के अपवाद—
परिव्राणमुनिशाक्येषु¹ चोक्षेषु² श्रोत्रियेषु च ।
शिष्टा³ ये चैव लिङ्गस्थाः संस्कृतं तेषु योजयेत् ॥ ३६ ॥
परन्तु जो पात्र संन्यासी, साधु, बौद्धभिक्षु, श्रोत्रिय तथा वेदपाठी ब्राह्मण
हों और जो अपनी प्रतिष्ठा या स्थिति के अनुरूप आचार-व्यवहार रखते
हों तो उनकी (नाट्यप्रयोग में) संस्कृत भाषा रखी जाए ॥ ३६ ॥
⁴राज्ञाश्च गणिकायाश्च शिल्पकार्यास्तथैव च ।
⁵कालावस्थान्तरकृतं योज्यं पाठ्यन्तु संस्कृतम् ॥ ३७ ॥
यदि विशेष अवसर या स्थिति आ पड़े तो महारानी, वेश्या¹ तथा
शिल्पकारी (दासी) आदि जैसे स्त्री पात्र भी संस्कृत-भाषा का व्यवहार कर
सकते हैं ॥ ३७ ॥
सन्धिविग्रहसम्बन्धं⁶ तथा⁷ चापि शुभाशुभम् ।
ग्रहनक्षत्रचरितं खगानां रुतमेव च ॥ ३८ ॥
सर्वमेतत्तु⁸ विज्ञेयं ⁹काव्यबन्धे शुभाशुभम् ।
नृपपत्न्या¹⁰ स्मृतं तस्मात् काले पाठ्यन्तु संस्कृतम् ॥ ३६ ॥
महारानी का इन अवसरों या अवस्थाओं में संस्कृतभाषा में संवाद (पाठ्य)
१. रानी, महारानी या मुख्य नायिका के रूप में स्त्रीपात्र द्वारा संस्कृत-
संभाषण विशेष अवस्था में प्रायः अनेक नाटकों में प्राप्य है । उदाहरणार्थ
मालविकाग्निमित्र में मालविका द्वारा, मृच्छकटिक में वसन्तसेना
द्वारा तथा मालती-माधव में मालती द्वारा संस्कृत-पाठ्य का सहारा
लिया गया है ।
१ मुनिशान्तेषु—ख० ।
२. चोक्षेषु—क० ; शाक्येषु—ख० चैक्षषु (?)—ग० ।
३. द्विजा—क; ग० । ४. देव्याश्च—क० ।
५. कलावस्था—क०; कार्यावस्था—ग० । ६. सम्पन्नं—क० ।
७. तथा च प्राप्तवाग्गतिम्—क०; तथा चाप्यशुभं शुभम्—ख० ।
८. मेतद्धि—ख०; ग० । ९. कार्यबन्धे—ग० ।
१०. भवेतु पाठ्यं संस्कृतं द्विजसत्तमाः—क० ।

३४० नाट्यशास्त्रम्
रखा जाए जबकि—कोई संधि या विग्रह से सम्बन्धित बात चल रही हो,
आकाश में किसी उदितनक्षत्र के शुभ या अशुभ फल पर विचार किया जा
रहा हो तथा किसी पक्षी की आवाज सुनकर उससे राजा के शुभ या अशुभ
भविष्य की कल्पना की जानी हो ॥ ३८-३९ ॥
क्रीडार्थं सर्वलोकस्य १प्रयोगे च सुखाश्रयम् ।
२कलाभ्यासाश्रयञ्चैव पाठ्यं वेश्यासु संस्कृतम् ॥ ४० ॥
विविध रुचि वाले प्रजाजन के विनोद के लिए तथा कलाओं के
व्यवहार और ज्ञान को प्रदर्शित करने के लिए वेश्याओं का संस्कृत भाषा में
( भी ) संवाद रखा जाए जिसकी सरलता पूर्वक नाटक में व्यवस्था की जा
सकती है ॥ ४० ॥
३कलोपचारज्ञानार्थं क्रीडार्थं पार्थिवस्य च ।
निर्दिष्टं शिल्पकार्यास्तु४ नाटके संस्कृतं वचः ॥ ४१ ॥
नाट्य रचनाओं में शिल्पिका ( आदि ) स्त्री-पात्रों की राजा के मनो-
रंजन तथा कलाओं के व्यावहारिक ज्ञान के लिए प्रसंगोचित संस्कृत भाषा
रखनी चाहिए ॥ ४१ ॥
आम्नायसिद्धं ५सर्वासां शुभमप्सरसां वचः ।
संसर्गाद्देवतानाञ्च तद्धि लोकोऽनुवर्तते ॥ ४२ ॥
अप्सराओं के सभी संवाद संस्कृत में रखना शास्त्रानुमोदित
( आम्नायसिद्ध ) है और यही परम्परा भी है । क्योंकि इनका देवताओं से
मुख्यतः संसर्ग रहता है लोक परम्परा में यह तथ्य अधिक रूढ़ भी है ॥४२॥
१. इन सभी नियमों के अनुसार किसी सम्प्राप्त रूपक में संवाद प्राप्त नहीं
होते ।
२. संभवतः भरत के समय ऐसे रूपक अवश्य अस्तित्व में थे जिनमें
अप्सराओं के नायिका के रूप में तथा सहायक पात्र के रूप में रहने पर
संस्कृत भाषा में पूर्णतः संवाद रखे गए हो । सम्प्रति कालिदास के
'विक्रमोर्वशीयम्' में नायिका उर्वशी के संवाद प्राकृत में तथा अन्य
अप्सराओं के संवाद भी मुख्यतः प्राकृत भाषा ( शौरसेनी ) में
उपलब्ध होते ही हैं ।
१. प्रयोगस्य—ख०; ग० । २. क्रीडालीलाथंकञ्चैव—ख०; ग० ।
३. लोकोपचार—ख०; ग० । ४. शिल्पकार्येषु—ख०; ग० ।
५. सर्वेषां दिव्यानां वचनं शुभम्—क०; शुभञ्चाप्सरमां वचः—ग० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३४१
१छन्दतः प्राकृतं २पाठ्यं स्मृतमप्सरसां³ भुवि ।
मानुषाणाञ्च⁴ कर्तव्यं कारणार्थव्यपेक्षया ॥ ४३ ॥
अप्सराओं के स्त्री जाति होने के कारण तथा उनके पृथ्वी पर विचरण
विहार की अवस्थाओं में स्वाभाविक या स्वेच्छापूर्वक प्राकृत पाठ्य रखना
उचित है परन्तु ये ही जब किसी मानव की पत्नी के रूप में रहे तो
अवसरानुकूल संस्कृत या प्राकृत कोई भी पाठ्य रखा जाए ॥ ४३ ॥
न बर्बरकिरातान्ध्रद्रमिलाद्यासु⁵ जातिषु ।
६नाट्यप्रयोगे कर्तव्यं पाठ्यं⁷ भाषासमाश्रयम् ॥ ४४ ॥
परन्तु १बर्बर, किरात, आन्ध्र तथा द्रामिड (द्रविड) जाति के पात्रों की
नाट्यरचनाओं में उनकी अपनी जातीय भाषाएँ न रखी जाएँ ॥ ४४ ॥
८सर्वास्वेव हि शुद्धास्तु जातिषु⁹ द्विजसत्तमाः ।
१०शौरसेनीं समाश्रित्य भाषां काव्येषु योजयेत् ॥ ४५ ॥
किन्तु इन जातियों की केवल शौरसेनी से मिलती जुलती किन्ही
प्रचलित ²भाषाओं का (अवसर आने पर) प्रयोग किया जाए ॥ ४५ ॥
१. बर्बर आदि के विषय में ना० शा० अध्याय १३।९९ का विवरण तथा
टिप्पणियां द्रष्टव्य है ।
२. इनमें मागधी, अर्धमागधी तथा शौरसेनी के अतिरिक्त अवन्ती, प्राच्या,
वाल्हीका और दाक्षिणात्या के नाम भर यहाँ दिये गए हैं । मृच्छकटिक में
अवन्ती तथा प्राच्या के उदाहरण मिलते हैं । वाल्हीका का स्वरूप क्या
था यह नाटकों के प्रयोग के आधार पर सम्प्रति प्राप्त नहीं हैं । यहाँ
महाराष्ट्री प्राकृत का उल्लेख भरत द्वारा न किया जाना (भरत की)
प्राचीनता की ओर संकेत करता है क्योंकि शौरसेनी का उत्तरकालीन
स्वर महाराष्ट्री की रचना में स्पष्टतः परिलक्षित होता है ।
१. छन्दसां—क०; छन्दस्तः—ख० । २. वाक्यं—क०; ग० ।
३. मप्सरसामपि—क० । ४. मानुषाणाञ्च—क०; ग० ।
५. द्रविडा—ख० । ६. नाटचयोगेषु—क०; नाटचयोगे तु—ख०; ग० ।
७. काव्यं—ख०; ग० ।
८. जातिष्वेतासु सर्वासु—ख०; ग० । ९. श्रद्धासु च—ख०; ग० ।
१०. शौरसेनं समाश्रित्य भाषाः कार्यास्तु नाटके—क०; भाषा कार्या तु
नाटके—ख०; ग० ।

३४२ नाट्यशास्त्रम्
अथवा छन्दतः कार्या $^१$देशभाषा प्रयोक्तृभिः ।
नानादेशसमुत्थं हि $^२$काव्यं भवति नाटके ॥ ४६ ॥
या फिर स्वेच्छानुसार नाट्य निर्देशक इनकी कोई एक लोकभाषा रख लें
क्योंकि नाट्यरचनाएँ तो विभिन्न प्रदेशों की भाषा में रचित काव्यरचनाओं से
युक्त लिखी जा सकती हैं ॥ ४६ ॥
सात मुख्य भाषाएँ—
मागध्यवन्तिजा प्राच्या $^३$शौरसेन्यर्धमागधी ।
वाह्लीका दाक्षिणात्या च सप्त भाषाः प्रकीर्तिताः ॥ ४७ ॥
सात मुख्य (प्राकृत) भाषाएं हैं—(१) मागधी (२) अवन्ती
(३) प्राच्या (४) सौरसेनी या शूरसेनी (५) अर्धमागधी (६) वाह्लीका
तथा (७) दाक्षिणात्या ॥ ४७ ॥
$^४$शकाराभीर-चाण्डालशबरद्रमिलान्ध्रजाः$^५$ ।
हीना $^६$वनेचराणाञ्च विभाषा नाटके स्मृताः$^७$ ॥ ४८ ॥
नाट्यरचना में इसके अतिरिक्त कुछ विभाषाएँ$^१$ भी—जो गौण स्थिति
रखती हों—रखी जाती है। जिनमें हैं—शाकारी, आभीरी, चाण्डाली,
शाबरी, द्रामिडी, आन्ध्री तथा वनेचरों की अपनी जंगली भाषाएँ ॥ ४८ ॥
मुख्य (प्राकृत) भाषाओं का उपयोग या व्यवहार—
मागधी तु $^८$नरेन्द्राणामन्तः पुरसमाश्रया ।
चेटानां राजपुत्राणां $^९$श्रेष्ठिनाञ्चार्धमागधी ॥ ४९ ॥
१. विभाषा का लक्षण मृच्छटिक के प्राचीन टीकाकार पृथ्वोधर ने 'विविधाः
भाषा हीन-प्रयोज्यत्वात् विभाषाः' दिया है। अर्थात् नीचपात्रों के द्वारा
व्यवहार में आनेवाली विविध भाषाएं विभाषा कहलाती है। नाट्यशास्त्र
में विद्यमान विभाषाओं में शाकारी, ढक्की तथा चाण्डाली का प्रयोग
मृच्छकटिक में भी मिलता है। संभवतः भरत को अपने समय में इन
सभी विभाषाओं की उदाहरण रूप में उपलब्धि रही हो।
१. दैवी भाषा—क० । २. कार्यं—क० ।
३. शूरसेना—क०; सूरसेन्यर्धं—ख०; ग० ।
४. शबराभीर—ख०; ग० ।
५. सचरद्रमिडोद्भूजाः—ख०; द्रविडोड्ड्रजाः—ग० ।
६. वनचराणां—क० । ७. स्मृता—ग० ।
८. नराणाञ्चैवान्तःपुरनिवासिनाम्—क०; ग० । ९. श्रेष्ठीनां—ग० ।

अष्टादशोऽध्यायः ३४३
इनमें (से) राजा के अन्तःपुर (रनिवास) के रक्षक तथा सेवकों की
मागधी भाषा तथा राजपुत्र,१ चेट तथा श्रेष्ठिजन की अर्धमागधी भाषा
नियत रहनी चाहिए ॥ ४९ ॥
प्राच्या विदूषकादीनां १धूर्तानामप्यवन्तिजा ।
नायिकानां सखीनाञ्च २शूरसेन्यविरोधिनी ॥ ५० ॥
विदूषक२ तथा उसके सदृश पात्रों की प्राच्या भाषा तथा धूर्तवृत्ति के पात्रों
की 'अवन्ती भाषा' रखी जाए। यदि कोई अड़चन (या असुविधा) न हो
तो नायिका तथा उनकी सारी सखियों की शौरसेनी भाषा रखी जाए ॥५०॥
३योधनागरकादीनां दाक्षिणात्याथ दीव्यताम्४ ।
वाह्लीकभाषोदीच्यानां ५खसानाञ्च स्वदेशजा ॥ ५१ ॥
सैनिकों, (योध) जुआरियों, नगरमुख्य आरक्षक (नागरक) की
दाक्षिणात्या३ भाषा तथा भारत के उत्तर भाग के निवासी खसों की अपनी
देश भाषा वाह्लीकी रखी जाए ॥ ५१ ॥
१. राजपुत्र = सेवक क्षत्रिय, अर्थात् जो अन्तःपुर में सेवक हो तथा क्षत्रिय-
जाति के हों। श्रेष्ठि पात्र का संस्कृत भाषा या प्राकृत में संवाद प्राप्य
है। जैसे मुद्राराक्षस में चन्दनदास का प्राकृत में संभाषण। परन्तु
अर्धमागधी भाषा में इनके संभाषण (नियम) की किसी नाट्य-रचना
द्वारा पुष्टि नहीं मिलती।
२. विदूषक की मृच्छकटिक में 'प्राच्या' भाषा रखी गयी है तथा अन्य
लक्षण ग्रन्थों में भी विदूषक की प्राच्या भाषा रखने का नियम है।
विदूषक के शौरसेनी में या अन्य भाषा में संवाद नाट्य रचनाओं में
विरलता से ही प्राप्त हैं। अवन्तीभाषा का प्रयोग मृच्छकटिक में वीरक
और चन्दनक (अंक ६) एक पारस्परिक विवाद में करते हैं। अवन्ती
भाषा के अधिक प्राचीन नमूने तथा विशेष-विवरण आदि रूपकों में
नहीं मिलते।
३. मृच्छकटिक में चन्दनक की भाषा दाक्षिणात्या है ऐसा पृथ्वीधर का
मत है। दाक्षिणात्या के स्वरूप के बारे में अन्यत्र कहीं से भी अधिक
ज्ञात नहीं होता है।
१. योज्या भाषा अवन्तिजा—ग० ।
२. सुरसेना विरोधिनी—ख०; सौरसेन्य—ग० ।
३. योध—ख०; योधनागरिकादीनां—ग०। ४. दीप्यताम्—क० ।
५. खषाणां च स्वदेशजा—; स्वसानाञ्चैव भूमिषु—क० ।

३४४ नाट्यशास्त्रम्
विभाषाओं (या उपभाषाओं) का उपयोग—
१शकाराणां शकादीनां तत्स्वभावश्च यो गणः ।
शकार² भाषा योक्तव्या ³चाण्डाली ४पुल्कसादिषु ॥ ५२ ॥
शकार, शक, तथा (शबर जाति के या) उसके अनुरूप स्वभाववाले
वर्गों (गणः) की शाकारी भाषा रखी जाए तथा पुल्कस डोम और इसके
समान अन्य नीच जातियों की 'चाण्डाली' भाषा रखी जाए ॥ ५२ ॥
५अङ्गार-कारक-व्याधकाष्ठयन्त्रोपजीविनाम्६ ।
योज्या७ शकारभाषा तु किञ्चिद्वानौकसी तथा ॥ ५३ ॥
कोयलों के व्यवसायी, बहेलिये (व्याध), लकड़ी और पत्तों को जंगल
से ढोकर अपनी जीविका चलाने वाले श्रमिक जैसे पात्रों की तथा जंगल के
निवासीजन की भी शाबरी (शाकारी) भाषा रखनी चाहिए ॥ ५३ ॥
८गजाश्वाजाविकोष्ट्रादिघोषस्थाननिवासिनाम् ।
आभीरोक्तिः शाबरी वा९ द्रामिडी १०वनचारिषु ॥ ५४ ॥
जहां हाथी, घोड़े, बकरे, भेड़, ऊंट या बैल गायों को बांधा या रखा
जाता हो—उन स्थानों के निवासियों की आभीरी२ या शाबरीभाषा रखी
जाए तथा द्रविड़ आदि देशों के व्यक्तियों या वनवासियों की 'द्राविड़ी' भाषा
रखी जाती है ॥ ५४ ॥
१. मृच्छकटिक में ही शकार ऐसा उपलब्ध पात्र है और उसीकी शाकारी
भाषा भी प्रयुक्त हुई है। इसके अतिरिक्त चाण्डालों द्वारा चाण्डाली भाषा
का (भी) व्यवहार इसी प्रकरण में मिल जाता है ।
२. आभीरी और द्राविड़ीभाषा के रूप उपलब्ध संस्कृत रूपकों में नहीं
मिलते, हो सकता है कि यह कोई द्राविड़ी बोली होगी, शायद यह
उत्तर भारत के कुछ क्षेत्रों की भी बोली हो—जैसा कि भाषाविदों
का अनुमान है ।
१. शकार—घोषकादीनां—क०; शवराणां शकादीनां—ख०; ग० ।
२. सकार—क० । ३. पाञ्चाली—ख०; ग० ।
४. पुत्कसादिषु—क० । ५. कारव्याधानां—ख०; ग० ।
६. पत्रयन्त्रोप—क० । ७. ज्ञेया शबरभाषा तु—ख० ।
८. गवाश्वाजाविकोष्ट्रादि—ख० ।
९. स्यात्—क० । १०. द्रिमिलादिषु—ख० ।