नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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रखा जाए जबकि—कोई संधि या विग्रह से सम्बन्धित बात चल रही हो,
आकाश में किसी उदितनक्षत्र के शुभ या अशुभ फल पर विचार किया जा
रहा हो तथा किसी पक्षी की आवाज सुनकर उससे राजा के शुभ या अशुभ
भविष्य की कल्पना की जानी हो ॥ ३८-३९ ॥
क्रीडार्थं सर्वलोकस्य १प्रयोगे च सुखाश्रयम् ।
२कलाभ्यासाश्रयञ्चैव पाठ्यं वेश्यासु संस्कृतम् ॥ ४० ॥
विविध रुचि वाले प्रजाजन के विनोद के लिए तथा कलाओं के
व्यवहार और ज्ञान को प्रदर्शित करने के लिए वेश्याओं का संस्कृत भाषा में
( भी ) संवाद रखा जाए जिसकी सरलता पूर्वक नाटक में व्यवस्था की जा
सकती है ॥ ४० ॥
३कलोपचारज्ञानार्थं क्रीडार्थं पार्थिवस्य च ।
निर्दिष्टं शिल्पकार्यास्तु४ नाटके संस्कृतं वचः ॥ ४१ ॥
नाट्य रचनाओं में शिल्पिका ( आदि ) स्त्री-पात्रों की राजा के मनो-
रंजन तथा कलाओं के व्यावहारिक ज्ञान के लिए प्रसंगोचित संस्कृत भाषा
रखनी चाहिए ॥ ४१ ॥
आम्नायसिद्धं ५सर्वासां शुभमप्सरसां वचः ।
संसर्गाद्देवतानाञ्च तद्धि लोकोऽनुवर्तते ॥ ४२ ॥
अप्सराओं के सभी संवाद संस्कृत में रखना शास्त्रानुमोदित
( आम्नायसिद्ध ) है और यही परम्परा भी है । क्योंकि इनका देवताओं से
मुख्यतः संसर्ग रहता है लोक परम्परा में यह तथ्य अधिक रूढ़ भी है ॥४२॥
१. इन सभी नियमों के अनुसार किसी सम्प्राप्त रूपक में संवाद प्राप्त नहीं
होते ।
२. संभवतः भरत के समय ऐसे रूपक अवश्य अस्तित्व में थे जिनमें
अप्सराओं के नायिका के रूप में तथा सहायक पात्र के रूप में रहने पर
संस्कृत भाषा में पूर्णतः संवाद रखे गए हो । सम्प्रति कालिदास के
'विक्रमोर्वशीयम्' में नायिका उर्वशी के संवाद प्राकृत में तथा अन्य
अप्सराओं के संवाद भी मुख्यतः प्राकृत भाषा ( शौरसेनी ) में
उपलब्ध होते ही हैं ।
१. प्रयोगस्य—ख०; ग० । २. क्रीडालीलाथंकञ्चैव—ख०; ग० ।
३. लोकोपचार—ख०; ग० । ४. शिल्पकार्येषु—ख०; ग० ।
५. सर्वेषां दिव्यानां वचनं शुभम्—क०; शुभञ्चाप्सरमां वचः—ग० ।