नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३३३
श्व, प्स, त्थ और थ्य को 'छ' कार तथा ध्य, ह्य और ध्य को 'झ'
कार हो जाता है। इसी प्रकार ष्ट को 'ट्ठ' स्त को 'त्थ' ष्म को 'म्ह' ष्ण,
क्ष्ण का 'ण्ह' और 'क्ष' का 'क्ख' आदेश हो जाता है ॥ १८ ॥
१आश्चर्यं अच्छरियं निश्चयमिच्छन्ति २णिच्छयं च यथा ।
३वत्सं वच्छं च यथा अप्सरसं तद्वदच्छरं ।
४उत्साहो उच्छाहो पथ्यं पच्छं च विज्ञेयम् ॥ १९ ॥
इन नियमों से इस प्रकार शब्द हो जाते हैं:—ये क्रमशः 'आश्चर्य का
अच्छरियं (श्व के स्थान पर 'च्छ'। निश्चय का णिच्छय (वही नियम)।
उत्साह का अच्छाह (त्स के स्थान पर 'च्छ') तथा पथ्य का पच्छ (थ्य
के स्थान पर 'छ') हो जाता है ॥ १९ ॥
तुभ्यं तुज्झं मह्यं मज्झं विन्ध्यश्च भवति ५विज्झोत्ति ।
६दृष्टो दट्ठोत्ति तथा हस्तोऽपि च भवति हत्थोत्ति ॥ २० ॥
तथा तुभ्यं का तुज्झं (भ्य के स्थान पर 'झ')। मह्यम् का मज्झम्
(ह्य के स्थान पर 'झ')। दृष्ट का दट्ठ (ष्ट के स्थान पर 'ट्ठ')। और
हस्त का हत्थ ('स्थ' के स्थान पर त्थ) ॥ २० ॥
ग्रीष्मो ७गिम्होत्ति तथा श्लक्ष्णं सण्हं ८सदा तु विज्ञेयम् ।
९उष्णं उण्हं यक्षो जक्खो पलंकु भवति पर्यङ्के ॥२१॥
इसी प्रकार ग्रीष्म का गिम्ह (ष्म के स्थान पर 'म्ह')। श्लक्ष्ण का
सण्ह (क्ष्ण के स्थान पर 'ण्ह')। उष्ण का उण्ह (ष्ण का ण्ह अथवा
१. आश्चर्यान्मात्सर्ये—क०, आश्चर्यं मात्सर्ये चेत्यनयोर्यंस्य रियं च तथा—
ख०; ग० ।
२. णिच्छयंति तथा—क० ।
३. श्लोकार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयो नास्ति ।
४. उत्साहश्चोत्साहो—ख०; ग०। ५. विज्झ इति—ख० ।
६. दृष्टो दट्ठ इति स्यात् हस्तोऽपि च हत्थ इत्येवम्—ख०; ग० ।
७ गिम्ह इति, गिह्मन्ति—क०; गिम्हो च तथा—ख०; ग० ।
८. सण्हं तु सदा—क०; ण्हुं तु सदा—ख०; ग० ।
९. उष्णञ्च भवेदुण्हं यक्षो जक्खोत्ति योण्ह श्च भवति पल्लङ्क; उष्णञ्च
भवेदुष्णं यक्षो जक्खोत्ति पर्यन्तम्—क०; कृष्णं कण्हं च भवेद्यक्षो जक्खो
पल्लंक पर्यङ्के—ख० ।