नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३३७
जातिभाषा में होने वाला पाठ्य दो प्रकार का होता है। जो कि
चारों ब्राह्मणादि वर्णों से सम्बद्ध है। वह हैं—एक संस्कृतपाठ्य तथा दूसरा
प्राकृत पाठ्य ॥ ३० ॥
संस्कृत पाठ्य के प्रदेश या अवसर—
धीरोद्धते सललिते^१ धीरोदात्ते तथैव च ।
धीरप्रशान्ते^२ च तथा पाठ्यं योजयन्तु संस्कृतम् ॥ ३१ ॥
जो धीरोद्धत, धीरललित, धीरोदात्त या धीरप्रशान्त^१ प्रकार के नायक
हों तो उनमें संस्कृतपाठ्य की योजना की जाए ॥ ३१ ॥
प्राकृत पाठ्य के प्रदेश या अवसर—
^३एतेषामपि सर्वेषां नायकानां ^४प्रयोगजम् ।
कारणव्यपदेशेन प्राकृतं सम्प्रयोजयेत् ॥ ३२ ॥
इन सभी नायकों में प्राकृत पाठ्य की योजना भी की जा सकती है,
जब कि इस प्रकार के अवसर या आवश्यकता आ पड़े ॥ ३२ ॥
[ ^५दारिद्र्याध्ययनाभावयदच्छादिभिरेव वा ]
^६ऐश्वर्येण प्रमत्तानां दारिद्र्येण^७ प्लुतात्मनाम् ।
^८उन्मत्तस्यापि पठतः संस्कृतं^९ न प्रयोजयेत् ॥ ३३ ॥
यदि कोई उत्तम—पात्र अपने राज्य या ऐश्वर्य के प्राप्त होने पर अपने
पद में मत्त हो या फिर दरिद्रता से अभिभूत हो या उन्मत्त हो जाए तो
१. नायकों आदि के भेद तथा लक्षणादि ना० शा० अ० १६ में देखिये ।
१. धीरललिते—ख०; ग० ।
२. प्रशान्तके चैव—क० ।
३. एषामेव तु—ख०, ग० ।
४. प्रयोगजा—क०; प्रयोगतः—ख०; ग० ।
५. पद्यार्धमेतत् ख० ग० पुस्तकयोर्नास्ति ।
६. ऐश्वर्येण प्रमत्तस्य—ख०; ग० ।
७. दारिद्र्येणाप्लुतस्य च—क०; दारिद्र्येण प्लुतस्य च—ग० ।
८. अनधीतोत्तमानाञ्च—क०; उत्तमस्यापि बुवतः—ख०; उत्तमस्यापि
पठतः ग० ।
९. प्राकृतं सम्प्रयोजयेत्—ख०; ग० ।
२२ ना० शा० द्वि०