नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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कृष्ण का कण्ह—वही नियम ), यक्ष का जक्ख ( क्ष के स्थान पर 'ख' )
तथा पर्यङ्क का पल्लंक ( र + य के स्थान पर 'ल' ) ॥ २१ ॥
१विपरीतं हमयोगे ब्रह्मादौ स्यात् बृहस्पतौ २फत्वम् ।
३यज्ञो भवति तु ४जण्णो भीष्मो ५भिम्होत्ति विज्ञेयः ॥ २२ ॥
ब्रह्मादि शब्दों में ह और म के योग में एक दूसरे के विपरीत स्थान में
ये अक्षर हो जाते हैं जैसे ब्रह्मा—बम्हा । ( यहां 'ह' और 'म' उलट कर
एक दूसरे के स्थान पर हो गए हैं । ) तथा बृहस्पति शब्द में 'ब' को 'फ'
हो जाता है जैसे—बृहस्पति—बुहप्फई । इसी प्रकार 'यज्ञ' का 'जण्ह तथा
भीष्म का भिम्ह रूप हो जाता है ॥ २२ ॥
६उपरिगतोऽधस्ताद्वा भवेत्ककारादिकस्तु यो वर्णः ।
स हि संयोग-विहीनः शुद्धः७ कार्यः प्रयोगेऽस्मिन् ॥ २३ ॥
जब 'क' किसी वर्ण के साथ संयुक्त हो या इस वर्ण के सिरे पर रेफ
आदि अन्य वर्ण हो तो इनका उच्चारण दशा में संयोग रहित रूप होता
है । जैसे १शक्र = सक्क । अर्क = अवक आदि ( यहां र के संयुक्तवर्ण होने
पर भी क ही शेष रहा ) ॥ २३ ॥
८एवमेतत्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा९ ।
अत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि देशभाषाविकल्पनम् ॥ २४ ॥
१. सक्क आदि रूप स्पष्टतः स्वरभक्ति के नियम से सम्बद्ध हैं । किलेश
( क्लेश ), दुवार ( द्वार ) आदि भी इसी नियम के अतिरिक्त उदाहरण
हो सकते हैं ।
१. ब्रह्मा च भवति बम्हो बृहस्पतिर्वे बुहप्फइ भवति—क०; विपरीत
मयोगेन ब्रह्मादो—ख०; ग० ।
२. हत्वम्—क० । ३. यज्ञश्च भवति—क० ।
४. जण्हो, यण्णो—क० ।
५. भिम्हत्ति—भिम्हृत्ति—भीह्म इति—क० ।
६. उपरिगतो हस्ताद्वा—ख०; उपरिगते तोऽधस्तान्वा—ग० ।
७. शुद्धं कार्य प्रयोगेऽस्मिन्—ग० ।
८. पाठ्यमेतत्तु—क०; एवमेव तु—ग० ।
९. एवमेतत् मया प्रोक्तं किञ्चित्प्राकृतलक्षणम् ।
शेषं देशीप्रसिद्धञ्च ज्ञेयं विप्राः प्रयोगतः ॥
इति पाठः क० पुस्तके च ।