नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३३९
इसी प्रकार बालक, किसी भूत या पिशाच से ग्रस्त या लगे हुए व्यक्ति,
स्त्री प्रकृति के पुरुष, नीच जाति के पुरुष तथा कफनी झोला धारी पाखण्ड
साधुओं जैसे पात्रों की भी भाषा प्राकृत रखी जाए ॥ ३५ ॥
प्राकृत पाठ्यविधि के अपवाद—
परिव्राणमुनिशाक्येषु¹ चोक्षेषु² श्रोत्रियेषु च ।
शिष्टा³ ये चैव लिङ्गस्थाः संस्कृतं तेषु योजयेत् ॥ ३६ ॥
परन्तु जो पात्र संन्यासी, साधु, बौद्धभिक्षु, श्रोत्रिय तथा वेदपाठी ब्राह्मण
हों और जो अपनी प्रतिष्ठा या स्थिति के अनुरूप आचार-व्यवहार रखते
हों तो उनकी (नाट्यप्रयोग में) संस्कृत भाषा रखी जाए ॥ ३६ ॥
⁴राज्ञाश्च गणिकायाश्च शिल्पकार्यास्तथैव च ।
⁵कालावस्थान्तरकृतं योज्यं पाठ्यन्तु संस्कृतम् ॥ ३७ ॥
यदि विशेष अवसर या स्थिति आ पड़े तो महारानी, वेश्या¹ तथा
शिल्पकारी (दासी) आदि जैसे स्त्री पात्र भी संस्कृत-भाषा का व्यवहार कर
सकते हैं ॥ ३७ ॥
सन्धिविग्रहसम्बन्धं⁶ तथा⁷ चापि शुभाशुभम् ।
ग्रहनक्षत्रचरितं खगानां रुतमेव च ॥ ३८ ॥
सर्वमेतत्तु⁸ विज्ञेयं ⁹काव्यबन्धे शुभाशुभम् ।
नृपपत्न्या¹⁰ स्मृतं तस्मात् काले पाठ्यन्तु संस्कृतम् ॥ ३६ ॥
महारानी का इन अवसरों या अवस्थाओं में संस्कृतभाषा में संवाद (पाठ्य)
१. रानी, महारानी या मुख्य नायिका के रूप में स्त्रीपात्र द्वारा संस्कृत-
संभाषण विशेष अवस्था में प्रायः अनेक नाटकों में प्राप्य है । उदाहरणार्थ
मालविकाग्निमित्र में मालविका द्वारा, मृच्छकटिक में वसन्तसेना
द्वारा तथा मालती-माधव में मालती द्वारा संस्कृत-पाठ्य का सहारा
लिया गया है ।
१ मुनिशान्तेषु—ख० ।
२. चोक्षेषु—क० ; शाक्येषु—ख० चैक्षषु (?)—ग० ।
३. द्विजा—क; ग० । ४. देव्याश्च—क० ।
५. कलावस्था—क०; कार्यावस्था—ग० । ६. सम्पन्नं—क० ।
७. तथा च प्राप्तवाग्गतिम्—क०; तथा चाप्यशुभं शुभम्—ख० ।
८. मेतद्धि—ख०; ग० । ९. कार्यबन्धे—ग० ।
१०. भवेतु पाठ्यं संस्कृतं द्विजसत्तमाः—क० ।