नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअष्टादशोऽध्यायः ३३५
इस प्रकार संस्कृत तथा प्राकृतभाषा के उच्चारण ( पाठ्य ) को सीखा
जाए। अब मैं देशी भाषाओं का विभागपूर्वक वर्णन करता हूँ ॥ २४ ॥
भाषाओं के चार प्रकार—
भाषा चतुर्विधा ज्ञेया १दशरूपे प्रयोगतः ।
संस्कृतं प्राकृतञ्चैव यत्र पाठ्यं प्रयुज्यते ॥ २५ ॥
नाटक आदि में प्रयुक्त की जाने वाली भाषाएँ चार प्रकार की होती हैं,
जिनमें पाठ्य रखा जाए। वे या तो संस्कृत या प्राकृत भाषा ( के किन्ही
प्रकारों में से ) होती हैं ॥ २५ ॥
'अतिभाषार्यभाषा च जातिभाषा तथैव च ।
तथा योन्यन्तरी चैव ३भाषा नाट्ये प्रकीर्तिता ॥ २६ ॥
भाषाओं के नाट्य प्रयोग में होने वाले चार प्रकार होते हैं—यथा—
(१) अतिभाषा, (२) आर्यभाषा, (३) जातिभाषा तथा (४) जात्यन्तरी भाषा
( योन्यन्तरी भाषा )१ ॥ २६ ॥
'अतिभाषा तु देवानामार्यभाषा' तु भूभुजाम् ।
संस्कारगुणसंयुक्ता६ ७सप्तद्वीपप्रतिष्ठिता ॥ २७ ॥
देवगण की 'अतिभाषा' तथा भूपालों की 'आर्यभाषा'२ होती है। इन
१. आचार्य अभिनवगुप्त ने अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों के मत में आर्य भाषा की
अन्य भाषाओं से विलक्षणता का निदान उनका वैदिक शब्द बाहुल्य
बतलाया ( जो दूसरे टीकाकारों का मत है )। इनका स्वयं का मत है
कि वक्तृभेद से संस्कृत तथा प्राकृत-पाठ्य के चार प्रकार हो गए थे जैसा
कि भरत ने भी माना है।
२. अतिभाषा तथा आर्यभाषा संभवतः भारतयोरोपीय भाषा की कोई बोली
होंगी। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि संस्कृत का एक भाषा के रूप में
१. दशरूपेषु योक्तृभिः—क; देशरूपप्रयोगतः—ख०; ग० ।
२. अभिभाषा—क० ।
३. भाषा वै नाटकाश्रयाः—क०; भाषा नाट्यप्रकीर्तिताः—ग० ।
४. सत्यादिभाषा देवानां—क०; अभिभाषा तु देवानां—ख० ।
५ आर्यभाषेति कीर्तिता—क० । ६. सम्पन्ना—क० ।
७. सम्यङ्न्यायप्रतिष्ठिता, सम्यक् राज्ये प्रतिष्ठता; सम्यग् नाट्यप्रतिष्ठिता—
क०; सम्यग्ग्रामप्रतिष्ठिता—ख० ।