नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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भाषाओं में संस्कार रूप विशेष गुण विद्यमान होने से इनका सातों द्वीपों में
प्रचलन है ॥ २७ ॥
जातिभाषा—
द्विविधा१ जातिभाषा च प्रयोगे समुदाहृता ।
२म्लेच्छशब्दोपचारा३ च ४भारतं वर्षमाश्रिता ॥ २८ ॥
नाटक में प्रयोग की जाने वाली जाति भाषा दो प्रकार की होती है ।
इनमें अनेक अनार्य तथा म्लेच्छों के द्वारा व्यवहार में आने वाले शब्द
समाविष्ट रहते हैं, जो कि भारतवर्ष में बोली जाती है ॥ २८ ॥
जात्यन्तरी-भाषा—
अथ योन्यन्तरी भाषा ५ग्राम्यारण्यपशूद्भवा ।
नाना-विहङ्गजा६ चैव नाट्यधर्मीप्रतिष्ठिता७ ॥ २९ ॥
तथा जात्यन्तरी भाषा१ वह है जो ग्राम में तथा जंगल में रहने वाले
पशुओं तथा पक्षियों की भाषा होती हो—इसका नाट्यधर्मी विधान से नाटक
आदि प्रयोगों में अनुसरण किया जाए ॥ २९ ॥
पाठ्य के दो प्रकार—
जातिभाषाश्रयं८ पाठ्यं द्विविधं समुदाहृतम् ।
प्राकृतं संस्कृतञ्चैव ९चातुर्वर्ण्यसमाश्रयम् ॥ ३० ॥
भरत ने विस्पष्ट उल्लेख नहीं किया । भोज ने अतिभाषा तथा जाति-
भाषा को क्रमशः श्रुति, पुराण ( आर्ष ) और लौकिक-भाषा माना है ।
१. नाट्यशास्त्र या इसके अनुसार निर्मित किसी संस्कृत नाट्य रचना में
जात्यन्तरीभाषा का प्रयोग प्राप्त नहीं होता न ही ( इसके ) अन्यत्र
भी उद्धरण या प्रयुक्त शब्द मिलते हैं ।
१. विविधा—ख० । २. म्लेच्छदेशप्रयुक्ता च—क० ।
३. चाराच्च—क० ।
४. तथा भारतसंश्रया—, तथा भारमाश्रिता—क० ।
५. ग्राम्यारण्य—ख० । ६. विहगजा चैव—ग० ।
७. नाटचधर्मे प्रतिष्ठिता—, नाटचधर्मप्रयोगजा०, नाटचधर्म प्रयोगतः—क०;
नाटचधर्मी प्रयोगतः—ख०; ग० ।
८. भाषाश्रितं—क० । ९ चातुर्वण्यादिसंश्रयम्—क० ।