नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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(उसकी इन विकल या मदमत्त दशाओं में) संस्कृत¹ भाषा की योजना
नहीं रहनी चाहिए । अर्थात् ऐसी दशा में इस पात्र की भी प्राकृतभाषा रखी
जाए ॥ ३३ ॥
¹व्याजलिङ्गप्रविष्टानां² ³श्रमणानां तपस्विनाम् ।
भिक्षुचक्रचराणाञ्च⁴ प्राकृतं सम्प्रयोजयेत् ॥ ३४ ॥
वे पात्र जो किसी व्याज² से साधु सन्यासी का वेष धारण किये हों,
जो पात्र जैन साधु, साधु, भिक्षु तथा बाजीगर हों तो उनमें प्राकृतपाठ्य की
योजना की जाए ॥ ३४ ॥
⁵बाले गृहोपसृष्टे च स्त्रीणां⁶ स्त्रीप्रकृतौ तथा ।
नीचे मत्ते सलिङ्गे च प्राकृतं पाठ्यमिष्यते⁷ ॥ ३५ ॥
१. जैसे 'अर्जुन' पात्र के बृहन्नला के रूप में अज्ञातवास में रहने पर उसकी
भाषा मागधी या शौरसेनी रखना उचित है । नाट्यशास्त्र के इस उल्लेख
के अनुकूल स्थिति तथा अनुसरण का किसी संस्कृत नाटक में विवरण
नहीं मिलता । हां, 'विक्रमोर्वशीयम्' में दैव के कारण विरही राजा की
उन्माद अवस्था का वर्णन तथा प्राकृतापभ्रंश में संभाषण अवश्य
उपलब्ध होता है और इस पर नाट्यशास्त्र के उपर्युक्त नियम की
छाया भी कदाचित् स्पष्ट परिलक्षित होती है ।
२. व्याज से साधु का वेश धारण करने का उल्लेख भास के 'कर्णभारम्' में
प्राप्त होता है जहां इन्द्र ब्राह्मण का वेष धारण करता है तब प्रयुक्त
भाषा वहां प्राकृत मिलती है । विराधगुप्त का 'मुद्राराक्षस' में सपेरे की
अवस्था में प्राकृत भाषा में संभाषण तथा यौगन्धरायण का अन्य
(भिक्षु) स्वरूप धारण करने पर 'प्रतिज्ञायौगन्धरायण' में प्राकृत
संभाषण उपर्युक्त नियमों के स्पष्टतः उदाहरण है ।
१. ऋतुलिङ्ग—क० । २. प्रतिष्ठानां—ख० ग० ।
३. श्रवणानां—क० ।
४. चक्रधराणाञ्च—क०; चाष्टचराणाञ्च ख०; ग० ।
५. पद्यमेतत्—कपुस्तके नास्ति ।
६. स्त्रीणाञ्च प्रकृतौ तथा—ख० ।
७. पद्यस्यास्य स्थाने क पुस्तके तु—
भागवततापसोन्मत्तबालनीचग्रहोपसृष्टेषु ।
स्त्रीनीचजातिषु तथा नपुंसके प्राकृतं योज्यम् ॥—इति पद्यं लभ्यते ।