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नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

सप्तदशोऽध्यायः ३०७
[ अनेकार्थविशेषैर्यत् सूक्तैः सौष्ठवसंयुतैः¹।
²उपेतमतिचित्रार्थैरुदात्तं तच्च कीर्त्यते ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक विशेष अर्थों से जो रचनागत पदावली निपुणता-
पूर्वक कहे गए सुन्दर शब्दों के कारण अनेक विचित्र अर्थों को धारण करे तो
उसे 'उदात्त' गुण जानो । ]
कान्ति—
यन्मनः³ श्रोत्रविषयमाह्लादयति⁴ हीन्दुवत् ।
⁵लीलाद्यर्थोपपन्नां वा तां कान्तिं कवयो विदुः ॥ १०५ ॥
जिस रचना में पात्र की शृङ्गारक्रीडा का किया जाने वाला वर्णन मन
और कानों को जब आह्लादित कर दे तो उसे 'कान्ति' गुण जानो ॥१०५॥
कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः ।' इत्यादि ।
इसी प्रकार जब चित्रपदों के बन्ध से विकटत्व या पदों के नर्तन करने जैसी
काव्यरचना हो तो उसे भी 'उदारता' ही कहते हैं । जैसे—
'स्वचरणविनिविष्टैर्नपुरैर्नर्तकीनां झटिति रणितमासीत्तत्र चित्रं कलञ्चा' इत्यादि ।
यहाँ आचार्य हेमचन्द्र ने 'अनेकार्थविशेषैः' पाठ को गृहीत किया है ।
१. जो काव्यरचना शृङ्गार रस के विभावादि से या लीला आदि चेष्टाओं के
वर्णन से मन को आह्लादित करती हो उसे 'कान्ति' समझना चाहिए ।
इसे ही अन्य आचार्य दीप्तरसता का नाम देते हैं । जैसे—'प्रेयान्
सोऽयमपाकृतः सशपथं पादानतः कान्तया' (अ० श० ) इत्यादि । यहाँ
ईर्ष्या अनुभाव, रति भाव तथा औत्सुक्य संचारी के द्वारा शृङ्गाररस को
दीप्त किये जाने से कान्ति नामक गुण है । इसके अतिरिक्त जो वर्णगत
काव्यबन्ध से श्रोत्र को आह्लादित करे तो ऐसी काव्यरचना भी 'कान्ति'
गुणशालिनी ही होगी । जैसे—'कुरङ्गिनेत्रालीस्तवकितवनालीपरिसरः'
इत्यादि । यहाँ समासयुक्त रचना श्रोत्र को आह्लादित करते हुए
एकतानता को बनाए रखती है, अतः मधुर काव्य के कारण 'कान्ति'
गुण यहाँ भी समझना चाहिए ।
१. संज्ञितैः—क० । २. उपेतमनतिग्राह्यैरुदारं—क० ।
३. यो मनःश्रोत्रविषयः प्रसादजनको भवेत्—ग० ।
४. प्रह्लादजननं भवेत्—प्रह्लादजननं तथा—क० ।
५. शब्दबन्धोऽत्रयोगेन स कान्त इति भण्यते—शब्दबन्धात्थंयोगेन तत्कान्तिरिति
भण्यते—, शब्दतत्वार्थसंयोगे तत्कान्तिरिवित कीर्त्यते—क०; शब्दबन्धः
प्रयोगेण स कान्त इति भण्यते—ग० ।

३०८ नाट्यशास्त्रम्
रसानुसारी अलंकार तथा छन्दों का प्रयोग-विधान—
एवमेते ह्यलङ्कारा गुणा दोषाश्च कीर्तिताः ।
प्रयोगमेषाञ्च पुनर्वक्ष्यामि रससंश्रयम् ॥ १०६ ॥
काव्य-रचना में स्थित अलंकार, दोष तथा गुणों का निरूपण किया
गया । अब मैं उनका रसाश्रित प्रयोग बतलाता हूं ॥ १०६ ॥
लघ्वक्षरप्रायकृतमुपमारूपकाश्रयम् ।
काव्यं कार्यन्तु १नाट्यज्ञैर्वीररौद्राद्भुताश्रयम् ॥ १०७ ॥
वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों के वर्णन में काव्य रचना लघु अक्षरों
से युक्त हो तथा उसमें उपमा या रूपक अलंकारों का प्रयोग होना
चाहिए ॥ १०७ ॥
गुर्वक्षरप्रायकृतं बीभत्से करुणे तथा ।
कदाचिद्वीररौद्राभ्यां २यदाधर्षणजं भवेत् ॥ १०८ ॥
बीभत्स ( तथा करुण ) रस में गुरु अक्षरों वाली रचना हो और जब
रौद्र तथा वीर रसों से करुण रस का वर्णन हो तब भी यथाशक्य
( कदाचित् ) गुरु अक्षरों वाली रचना होना चाहिए ॥ १०८ ॥
३रूपदीपकसंयुक्तमार्यावृत्तसमाश्रयम् ।
शृङ्गारे तु रसे कार्यं ४मृदुवृत्तं तथैव च ॥ १०९ ॥
शृङ्गाररस में रूपक तथा दीपक अलंकारों का तथा आर्यावृत्त का तथा
( फिर ) कोमल वृत्तों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १०९ ॥
उत्तरोत्तरसंयुक्तं वीरे पाठ्यन्तु ५ यद्भवॆत् ।
जगत्यातिजगत्या ६ तु सङ्कृत्या चैव योजयेत् ॥ ११० ॥
वीररस की रचना में संयुक्त वर्णों का उत्तरोत्तर (अधिक) प्रयोग
होना चाहिए तथा उसमें अतिजगती तथा संस्कृति जैसे वृत्तों का भी प्रयोग
होना चाहिए ॥ ११० ॥
१. शास्त्रज्ञैः—ख० ; काव्यज्ञैः—ग० ।
२. यथा—क० । ३. नार्यावृत्त—ख० ।
४. काव्यं स्यान्नाटकाश्रयम्—ख० ।
५. काव्यन्तु—ख०; ग० ।
६. जगत्यां वा सङ्कृत्यां वापि तद्भवेत्—ख०; ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३०९
१युद्धसम्पेटयोस्तज्ज्ञैरुत्कृतिः सम्प्रकीर्तिता ।
करुणे शक्वरी चैव२ तथा चातिधृतिर्भवेत् ॥ १११ ॥
युद्ध तथा उपद्रवों (संकट) के वर्णन में 'उत्कृति' छन्द का तथा
करुण-रस में शक्वरी तथा अतिधृति छन्दों की योजना करना उचित
होता है ॥ १११ ॥
यद्वीरे कीर्तितं३ छन्दस्तद्रौद्रेऽपि प्रयोजयेत् ।
शेषाणामर्थयोगेन छन्दः कार्यं४ प्रयोक्तृभिः ॥ ११२ ॥
जो 'छन्द' वीररस के लिए उपयुक्त हों उन्हें रौद्ररस में भी प्रयोग हेतु
उचित समझना चाहिए। शेष रसों में उनके अर्थानुसार यथोचित छन्दों की
योजना की जाए ॥ ११२ ॥
अक्षरों की रसानुकूल योजना-विधि—
त्रिविधं ह्याक्षरं५ कार्यं कविभिर्नाटकाश्रयम् ।
ह्रस्वं६ दीर्घं प्लुतश्चैव ७रसभावविभावकम् ॥ ११३ ॥
नाटकों (काव्य) की रचना में कविजन विभिन्न रसों तथा भावों की
अभिव्यक्ति के लिए ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करें ॥ ११३ ॥
एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं द्विमात्रं दीर्घमुच्यते ।
प्लुतश्चैव त्रिमात्रं स्याद् अक्षरं ८वर्णसंश्रयम् ॥ ११४ ॥
स्वरों के उच्चारणों के नियम के अनुसार एक मात्रा का अक्षर ह्रस्व, दो
मात्राओं का दीर्घ तथा तीन मात्राओं का प्लुत कहलाता है ॥ ११४ ॥
प्लुत वर्ण का प्रयोग विधान—
स्मृते ९चासूयिते चैव तथा च परिदेविते ।
पठतां ब्राह्मणानाञ्च लुतमक्षरमिष्यते ॥ ११५ ॥
किसी बात के स्मरण करने, असूया तथा रोदन क्रियाओं में तथा
ब्राह्मणों द्वारा वेद पठन करने में 'प्लुत' की योजना करनी चाहिए ॥ ११५ ॥
१. तथैव युद्धसंस्फोटावुत्कृत्यां सम्प्रकीर्तितम्—क०; तथैव युद्धसम्पेटावुत्कृत्यां
सम्प्रकीर्तितो—ख०; ग० ।
२. ज्ञेया तथैवातिधृति—ख०; ग० ।
३. कीर्त्यंते छन्दस्तद्रौद्रे सम्प्रयोजयेत्—ख० । ४. तथा रसः—ख० ।
५. काव्ये विज्ञेयं—ख०; काव्यं विज्ञेयं—ग० ।
६. प्लुतं ह्रस्वञ्च दीर्घञ्च—क० । ७. पदबन्धसमाश्रयम्—क० ।
८. स्वरयोजनात्—ग० । ९. वासूयिते—ख; चास्रयुते—ग० ।

३१० नाट्यशास्त्रम्
आकारस्तु १ स्मृते कार्यम् २ उकारश्चाभ्यसूयिते ।
परिदेविते च हाकारम् ३ ओङ्कारोऽध्ययने तथा ॥ ११६ ॥
स्मरण में 'आ' का असूया में 'ऊ' का, रोदन में 'हा' का तथा वेदों के
अध्ययन में 'ओम्' का प्रयोग होना चाहिए ॥ ११६ ॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् ।
४ काव्यबन्धेष्वशेषेषु ह्यक्षराणि प्रयोजयेत् ॥ ११७ ॥
इसके अतिरिक्त सभी प्रकार की काव्य-रचनाओं में भाव तथा रसों की
स्थिति के अनुरूप ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करना
चाहिए १ ॥ ११७ ॥
५ यच्छन्दः पूर्वमेवोक्तं विषमार्द्धसमे समम् ।
६ उदारमधुरैः शब्दैस्तत् ७ कार्यन्तु रसानुगम् ॥ ११८ ॥
पूर्व अध्याय में जिन सम, अर्धसम तथा विषम छन्दों को बतलाया
गया है उनका उदार तथा मधुर-शब्दावली द्वारा काव्यों में अर्थानुसारी
प्रयोग किया जाए ॥ ११८ ॥
शब्दानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान् ८
९ नाट्याश्रयासु कृतिषु प्रयतेत कर्तुम् ।
तैर्भूषिता भुवि विभान्ति हि काव्यबन्धाः
पद्माकरा विकसिता इव राजहंसैः ॥ ११९ ॥
नाटककार अपनी रचना में ऐसे शब्दों का प्रयोग करे जो औदार्य गुण
१. आशय यह कि दूर से बुलाने आदि के लिये व्याकरण शास्त्र में अभिहित
प्लुत आदि नियमों का भी प्रयोग विधिवत् करना चाहिए ।
१. अकारस्तु स्मृते कार्ये—ग० ।
२. हुङ्कारं वाप्यसूयिते—ख०; उकारश्चाप्यसूचिते—ग० ।
३. हुंकार—ख० ।
४. एतानि काव्ययोगेषु त्वक्षराणि निवेशयेत् क, काव्ययोगेष्वक्षराणि यथा
शोभं निवेशयेत्—ख० । काव्ययोगेषु सर्वेषु ह्यक्षराणि तु योजयेत्—ग०; ।
५. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्धसमा समाः—ख० ।
६. उदारशब्दैर्मधुरैः कार्यास्तेऽर्थवशान्नुगाः—ग० ।
७. कार्यास्ते स्यु रसानुगाः—ख० । ८. प्रमदाभिनेयान्—ख०; ग० ।
९. नाट्याश्रितान्—क०; नाट्याश्रयान् नु—ख० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३११
से पूर्ण,१ ( अर्थपूर्ण ) तथा मधुर हों, जिन्हें स्त्रियों के द्वारा उच्चारण किया
( या गाया ) जा सके। यदि इन विशेषताओं से युक्त काव्य रचना होगी तो
वह राजहंसी से युक्त कमल सरोवरों जैसी अति सुन्दर होकर सुशोभित
होगी ॥ ११९ ॥
चेक्रीडितप्रभृतिभिर्विकृतैश्च१ शब्दै-
र्युक्ता२ न भान्ति ललिता भरतप्रयोगाः ।
यज्ञक्रियेव३ ४रुरुचर्मधृतैर्घृताक्तै-
र्वैश्या द्विजैरिव कमण्डलुदण्डहस्तैः ॥ १२० ॥
‘चेक्रीडित’२ जैसे रूक्ष शब्दों ( के प्रयोगों ) से युक्त नाट्यरचना सुन्दर
नहीं लगती। जैसे कृष्णाजिन तथा रूक्ष ( मृग ) चर्म को वहन करने वाले,
यज्ञ के घृत से सने हुए कमण्डल और अक्षमाला युक्त हाथों वाले ब्रह्मचारी
गण का नर्तकी ( वेश्या ) के साथ हो जाना अनुचित होता है ॥ १२० ॥
१. यहाँ कारिका में उदार पद से शब्दगुण तथा मधुर पद से उसी के
अनुकूल माधुर्यादि गुणों का प्रयोग सूचित किया गया है। इसी प्रकार
प्रमदाभिधेय पद की अन्य व्याख्या भी है। तदनुसार प्रमद का अर्थ है
आह्लादजनक जिनका अभिधेय अर्थात् भावार्थ या हृदयगत-क्रियाविशेष
हों ऐसे समग्र अर्थगुणों से युक्त भावों वाली पदावली का नाटकीय रचना
में प्रयोग किया जाए।
२. ‘चेक्रीडित’ पद यङन्त है। यहाँ आदि शब्द से इसी प्रकार के ण्यन्त या
सन्नन्त पदों का भी प्रयोग नटों के लिये उचित नहीं होता यह संकेत
दिया है। यहाँ अन्य व्याख्यान इस प्रकार भी है कि जैसे ललित अर्थात्
सुकुमार प्रयोग कठोर या रूक्ष पदावली से युक्त नहीं रहते ठीक उसी
प्रकार जैसे वेश्याओं के साथ कमण्डलधारी ऋजुवृत्ति ब्रह्मचारी को
रखना अनुचित है या जैसे यज्ञक्रिया में ब्रह्मचारी के साथ वेश्याओं
का रखना अनुचित होता है। इस प्रकार यह दृष्टान्त साधर्म्य तथा
वैधर्म्य दोनों प्रकार से बनकर रसानुकूल एवं व्याकरण शास्त्रसम्मत
प्रसिद्ध तथा प्रचलित शब्द प्रयोगों को ही नाट्यरचना में समावेश के
उपयुक्त निदर्शित करता है।
१. प्रकृतिभि—ख०; ग० । २. मुक्ता—क० ।
३. कृष्णाजिनाक्षरुह—ग० ।
४. शरवमंधुरैः घृताक्तैः—ख०; चर्मधुरैः—ग० ।

३१२ नाट्यशास्त्रम्
मृदुललितपदार्थं¹ गूढशब्दार्थहीनं
²जनपदसुखभोग्यं ³युक्तिमन्नृत्तयोज्यम् ।
⁴बहुकृतरसमार्गं सन्धिसन्धानयुक्तं
⁵भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये⁶ काव्यलक्षणो
नाम सप्तदशोऽध्यायः ।
❖
जिस नाट्य-रचना में मृदु तथा ललित अर्थों वाली पदावली हो, गूढ़
शब्द तथा अर्थ न हों, प्रेक्षक सुखपूर्वक देख और समझ सकें तथा आनन्द
उपलब्ध करे, जिसमें युक्ति एवं विचारपूर्वक नृत्त की योजना की गई हो,
रस की प्रवाहमय गति हो, सन्धियों का (जिसमें) स्पष्ट स्वरूप परिलक्षित
होता हो वही नाटक संसार में प्रेक्षण योग्य हो जाता है ॥ १२१ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का वागभिनयान्तर्गत (लक्षणालंकार गुण-दोष-निरूपण तथा)
काव्यलक्षण नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
❖
१. पदाढ्यं—ख० ।
२. बुधजनसुखभोग्यं—क०; जनपदसुखबोध्यं—ख०; बुधजनसुखयोग्यं—ग० ।
३. बुद्धिमन्नृत्त—ग० ।
४. बहुरसकृतमार्गं—क०, ग० ।
५. स भवति सुकवि काव्यं नाट्यकाले मनोज्ञम्—क० ।
६. वागभिनयो नाम षोडशोऽध्यायः—क०, ख० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः
विभूषणञ्चाक्षरसंहतिश्च¹ शोभाभिमानौ गुणकीर्तनञ्च ।
प्रोत्साहनाेदाइरणे निरुक्तं गुणानुवादोऽतिशयः सहेतुः ॥ १ ॥
सारूप्य-मिथ्याध्यवसायसिद्धि-पदोच्चयाक्रन्दमनोरथाश्च ।
²आख्यानयाश्चाप्रतिषेधपृच्छादृष्टान्तनिर्भासनसंशयाश्च³ ॥ २ ॥
आशीः प्रियोक्तिः⁴ कपटः क्षमा च प्राप्तिश्च पश्चात्तपनं तथैव ।
अथानुवृत्तिर्ह्युपपत्तियुक्ती ⁵कार्योऽनुनीतिः परिदेवनञ्च ॥ ३ ॥
षट्त्रिंशदेतानि तु⁶ लक्षणानि प्रोक्तानि वै भूषणसम्मितानि ।
काव्येषु ⁷भावार्थगतानि तज्ज्ञैः सम्यक्प्रयोज्यानि यथारसं⁸ तु ॥ ४ ॥
दृश्य काव्य के अङ्गभूत छत्तीस लक्षण¹ होते हैं। जिनके नाम इस
प्रकार हैं—( १ ) विभूषण, ( २ ) अक्षरसंघात, ( ३ ) शोभा, ( ४ ) अभि-
मान, ( ५ ) गुणकीर्तन, ( ६ ) प्रोत्साहना, ( ७ ) उदाहरण, ( ८ ) निरुक्त,
( ९ ) गुणानुवाद, ( १० ) अतिशय, ( ११ ) हेतु, ( १२ ) सारूप्य,
( १३ ) मिथ्याध्यवसाय, ( १४ ) सिद्धि, ( १५ ) पदोच्चय, ( १६ ) आक्रन्द,
( १७ ) मनोरथ, ( १८ ) आख्यान, ( १९ ) याञ्चा, ( २० ) प्रतिषेध,
१. दो भिन्न पाठों में पठित लक्षणों के क्रम में यहाँ अनुबन्धरूप में प्रदत्त
इस पाठ को आचार्य अभिनव गुप्त ने अपनी परम्परा में समागत पाठ
स्वीकृत करते हुए मुख्य माना है । आचार्य पाद ने ही दूसरे पाठ की
भी व्याख्या की तथा इस पाठ की भी व्याख्या की तथा इस पाठ को भी
उद्देश कथन के रूप में भरतमुनि सम्बद्ध भी बतलाया । इस प्रकार दो
पाठों में विभक्त लक्षणों के स्वरूप को लेकर भोज आदि ने चौसठ काव्य
लक्षण निरूपित किये । इन सभी लक्षणों का सोदाहरण विवेचन
'परिशिष्ट' में ही उचित मानकर यहाँ केवल अर्थमात्र ही देकर हम
सन्तोष कर रहे हैं । ( सम्पा० व्याख्या० )
१. चाक्षरसङ्गतिश्च—ख०; चाक्षरसंहितञ्च—ग० ।
२. आख्यानवादाः—ख० । ३. दृष्टाङ्ग—ख० ।
४. प्रियं वै कपटं क्षमा च—ग० । ५. कार्यानुनीती—ग० ।
६. मया समासात्—क० । ७. सोदाहरणेषु—क० ।
८. यथारसानि—क० ।

३१४ नाट्यशास्त्रम्
( २१ ) पृच्छा, ( २२ ) दृष्टान्त, ( २३ ) निर्भासन, ( २४ ) संशय,
( २५ ) आशीः, ( २६ ) प्रियोक्ति, ( २७ ) कपट, ( २८ ) क्षमा,
( २९ ) प्राप्ति, ( ३० ) पश्चात्तापः, ( ३१ ) अनुवृत्ति, ( ३२ ) उपपत्ति,
( ३३ ) युक्ति, ( ३४ ) कार्य, ( ३५ ) अनुनीति या अनुनय तथा
( ३६ ) परिदेवन ॥ १-४ ॥
विभूषण—
अलङ्कारैर्गुणैश्चैव बहुभिर्यदलङ्कृतम् ।
भूषणैरिव विन्यस्तैस्तद्विभूषणमिति स्मृतम् ॥ ५ ॥
जो रचना अनेक अलङ्कार तथा गुणों से अलंकृत होने के कारण
अलंकार से सजाए गए व्यक्ति की तरह सुशोभित होने लगे तो विविध
अर्थगुण सूचक ऐसे लक्षण को 'विभूषण' समझना चाहिए ॥ ५ ॥
अक्षरसंघात—
'१यत्राल्पैरक्षरैः श्लिष्टैर्विचित्रार्थोपवर्णनम्२ ।
३तदप्यक्षरसङ्घातं विद्याल्लक्षणसंज्ञितम् ॥ ६ ॥
जहाँ थोड़े अक्षरों के प्रयोग से श्लेषगत वैशिष्ट्य के कारण विविध एवं
वैचित्र्य सम्पन्न अर्थ की अभिव्यक्ति होती हो तो उसे 'अक्षरसंघात'२ नामक
लक्षण समझना चाहिए ॥ ६ ॥
शोभा—
सिद्धैरर्थैः समं कृत्वा ४ह्यसिद्धोऽर्थः प्रसाध्यते ।
यत्र ५श्लक्ष्णा विचित्रार्था सा शोभेत्यभिसंज्ञिता६ ॥ ७ ॥
यदि असिद्ध या अज्ञातार्थ की सिद्ध या ज्ञात रूप में उद्धृत करते हुए
श्लेष के कारण नवीन या मनोहारि स्थिति में अर्थाभिव्यक्ति होती हो ऐसे
लक्षण को 'शोभा'३ समझना चाहिए ॥ ७ ॥
१. 'विभूषण' का पर्याय अन्य पाठ में 'भूषण' दिया है ।
२. 'अक्षरसंघात' दोनों पाठों में समान प्राप्त होता है ।
३. 'शोभा' का लक्षण भी दोनों पाठों में समान है ।
१. यत्रार्थैः—क० ।
२. विचित्रैरुपवर्णितम्—क०; विचित्रमुपवर्ण्यते—ग० ।
३ तमप्यक्षर—ग० । ४. यत्रासिद्धं—क० ।
५. श्लिष्टा—क०; श्लक्ष्णविचित्रार्थाः—ख०, ग० ।
६. त्यभिधीयते—ख०; ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१५
अभिमान—
धार्यमाणस्तु¹ बहुभिर्वचनैः कार्ययुक्तिभिः ।
न² यः पर्यवतिष्ठेत सोऽभिमानस्तु संज्ञितः³ ॥ ८ ॥
जब कोई पुरुष अनेक कथनों, कार्यों तथा युक्तियों के द्वारा समझाने
पर भी उसे नहीं समझ पाता या सन्तुष्ट न होता हो तो ऐसे लक्षण को
'अभिमान'¹ समझना चाहिए ॥ ८ ॥
गुणकीर्तन—
कीर्त्यमानैर्गुणैर्यत्र विविधार्थसमुद्भवैः ।
दोषा⁴ न परिकथ्यन्ते तज्ज्ञेयं गुणकीर्तनम् ॥ ९ ॥
जब एक व्यक्ति के अनेक गुणों को—विविध उद्देश्यों से उद्भूत अर्थों में
बतलाने के समय—दोषों का उद्घाटन न किया जाए तो ऐसी रचना को
'गुणकीर्तन'² समझना चाहिए ॥ ९ ॥
प्रोत्साहन—
उत्साहजननैः स्पष्टैरथैरौपम्यसंश्रयैः ।
प्रसिद्धैरुपगूढञ्च⁵ ज्ञेयं प्रोत्साहनं बुधैः ॥ १० ॥
जहाँ औपम्य का आश्रय या अन्वेषण करते हुए उत्साहवर्द्धक एवं
सुस्पष्ट अर्थ के द्वारा प्रसिद्ध व्यक्तित्व का वर्णन किया जाए तो ऐसे लक्षण को
'प्रोत्साहन'³ समझना चाहिए ॥ १० ॥
उदाहरण—
यत्रैकस्यापि⁶ शब्दस्य दर्शनात् सुबहून्यपि ।
यान्ति सिद्धिमनुक्तानि⁷ तदुदाहरणं स्मृतम् ॥ ११ ॥
१. 'अभिमान' के समान लक्षण होने पर अन्य पाठ में 'सारूप्य' ( इसके
स्थान पर ) प्राप्त होता है ।
२. 'गुणकीर्तन' दोनों पाठों में गृहीत है किन्तु दोनों में ( इसके ) लक्षण
भिन्न है ।
३. प्रोत्साहन के स्थान पर अन्य पाठ में प्रियवचन या प्रियोक्ति प्राप्त
होता है ।
१. वार्यमाणस्तु—ख०; ग० । २. नार्यो यन्नानुतिष्ठन्ति—क० ।
३. भिमानः प्रकीर्तितः—क० । ४. दोषांशान् परिकल्प्यन्ते—क० ।
५. रुपगूढन्तु—क० । ६. यत्रैकस्यैव—क० ।
७. मनुक्तादि—ख०; ग० ।

३१६ नाट्यशास्त्रम्
जब किसी एक शब्द के उच्चारित होते ही अनेक अकथित या
असंकेतित अर्थों की भी सूचना प्राप्त होने लगे तो उसे ‘उदाहरण’¹ समझना
चाहिए ॥ ११ ॥
निरुक्त—
निरुक्तं द्विविधं प्रोक्तं ¹तथ्यञ्चातथ्यमेव च ।
²सिद्धिपूर्वं भवेत्तथ्यमतथ्यञ्चाप्रसाधितम्³ ॥ १२ ॥
निरुक्त के दो प्रभेद हैं—( १ ) तथ्य तथा ( २ ) अतथ्य । इनमें जो
अच्छी तरह से प्रसिद्ध या ज्ञात हो उसे ‘तथ्य’ तथा जो किसी प्रकार इसके
विपरीत हो या अच्छी तरह से प्रसिद्ध न हो उसे ‘अतथ्य’ नामक निरुक्त²
समझना चाहिए ॥ १२ ॥
गुणानुवाद—
⁴गुणानुवादो हीनानामुत्तमैरुपमाकृतः ।
जब किसी हीन विषय की उत्तम विषय से तुलना की जाए तो ऐसे
कथन वाले लक्षण को ‘गुणानुवाद’³ समझना चाहिए ।
अतिशय—
⁵उत्तमार्थाद्विशिष्टो यः स चाप्यतिशयः स्मृतः ॥ १३ ॥
जब किसी उत्तम पदार्थ से तुलना करने पर भी किसी का ( उक्त अर्थ
से भी ) अधिक वैशिष्ट प्रतीत होने लगे तो ऐसे लक्षण को ‘अतिशय’⁴
समझना चाहिए ॥ १३ ॥
हेतु—
बहूनां ⁶भाषमाणानां ⁷त्वेकस्यार्थविनिर्णयम् ।
सिद्धोपमानवचनं हेतुरित्यभिसंज्ञितः ॥ १४ ॥
१. उदाहरण का नाम दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण भिन्न हैं ।
२. अन्य पाठ में निरुक्त के दो विभेदों का उल्लेख नहीं है ।
३. ‘गुणानुवाद’ का अन्य पाठ में ‘गुणातिपात’ अभिधान मिलता है ।
४. यह लक्षण पूर्व पाठ के ‘अतिशय’ के लक्षण का पूरक लक्षण होकर थोड़ी
भिन्नता रखता है । ‘अतिशय’ का दोनों पाठों में सन्निवेश मिलता है ।
१. वातथ्य—ख०; ग० । २. सिद्धि प्रसाधितं तथ्य—क० ।
३. चाप्यसाधकम्—क० । ४. गुणाभिवादो—क० ।
५. उत्तमार्थ विशिष्टो—क०; उत्तमार्थविशेषो—ख०; ग० ।
६. भाष्यमाणानां—ख०; ग० ।
७. अनेकार्थविनिश्चयः—क०; अनेकार्थविनिर्णयात्—ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१७
अनेक व्यक्तियों के कथन को सुनकर किसी एक असाधारण अर्थ का
प्रमाण पुरस्सर वचन के आधार पर निश्चय करना 'हेतु' कहलाता है ॥१४॥
सारूप्य—
१अपदेशस्तु परोक्षो यस्मादुत्पद्यतेऽनुकरणेन ।
लक्षणसमानकरणात्२ सारूप्यं तत्तु विज्ञेयम्३ ॥ १५ ॥
किसी तथ्य को न जानकर यदि अनुकरण के अनुसार आधार लेकर
लक्षण की आलोचना करते हुए सप्रमाण वस्तु का स्थापन किया जाए तो
उसे 'सारूप्य'२ समझना चाहिए ॥ १५ ॥
मिथ्याध्यवसाय—
४अभूतपूर्वैर्यात्रार्थैस्तत्तुल्यार्थस्य निर्णयः ।
स मिथ्याध्यवसायस्तु प्रोच्यते काव्यलक्षणम्५ ॥ १६ ॥
जहाँ किन्हीं अतथ्यभूत या अनृत अर्थों के द्वारा उसी के समान असत्
वस्तु का वक्तृत्वपूर्ण पदावली में निर्धारण या विनिश्चय किया जाता हो तो
उसे 'मिथ्याध्यवसाय'३ नामक काव्य लक्षण समझना चाहिए ॥ १६ ॥
सिद्धि—
बहूनाञ्च प्रधानानां ६मध्ये यन्नाम कीर्त्यते ।
७एकार्थसाधनकृतं सा सिद्धिरिति कीर्तिता ॥ १७ ॥
अनेक प्रसिद्ध या प्रमुख व्यक्ति या पदार्थों के बीच यदि एक अप्रसिद्ध
नाम का अभिधान उसके असाधारणत्व के निदर्शनार्थ निविष्ट किया जाता
है तो उसे 'सिद्धि'४ समझना चाहिए ॥ १७ ॥
१. हेतु का सन्निवेश दोनों पाठों में है परन्तु लक्षण दोनों भिन्न हैं ।
२. सारूप्य के स्थान पर अन्य पाठ में दिष्ट या दृष्ट को रखा गया है ।
३. मिथ्याध्यवसाय के स्थान पर अन्य पाठ में 'विपर्यय' मिलता है ।
४. सिद्धि' का लक्षण दोनों पाठों में मिलता है परन्तु लक्षणों में थोड़ा विभेद
प्राप्त होता है ।
१. अपदेशेन परोक्षो योऽर्थो ह्युत्पद्यते—क० ।
२. योगात्—क० । ३. निर्द्दिश्यम्—क० ।
४. अभूतपूर्वे यत्रार्थे तुल्यस्यार्थस्य निर्णयः—ख०; ग० ।
५. लक्षणे—ख० ।
६. नाम यत्राभिकीर्त्यते—क० ।
७. अभिप्रेतार्थसिद्धयर्थं—क० ।

३१८ नाट्यशास्त्रम्
पदोच्चय—
गुणैर्बहुभिरेकार्थैः पदैर्यः सम्प्रशस्यते ।
पदोच्चयन्तु तं विद्यान्नानार्थग्रथितार्थकम्¹ ॥ १८ ॥
एक ही पदार्थ को निदर्शित करने वाले अनेक शब्द या वचनों के द्वारा
जब किसी वस्तु की प्रशंसा की जाए तो अनेक अर्थों या वचनों द्वारा
इष्ट वस्तु को स्वरूप प्रदान करने वाले ऐसे लक्षण को 'पदोच्चय' समझना
चाहिए ॥ १८ ॥
आक्रन्द—
आत्मभावमुपन्यस्य² परसादृश्ययुक्तिभिः ।
तीव्रार्थभाषणं यत् स्यादाक्रन्दः स तु कीर्तितः ॥ १९ ॥
अन्य पुरुष के सम्मुख जब सादृश्य या समानता को दर्शाने वाली युक्तियों
से अपने अभीष्ट अप्रत्यक्ष अभिप्राय को प्रमुखतः स्पष्ट कथन (के) द्वारा
स्वभावाविष्करण करते हुए रखा जाए तो वह 'आक्रन्द'² कहलाता है ॥ १९ ॥
मनोरथ—
हृदयस्थस्य भावस्य ³सुश्लिष्टार्थप्रदर्शकम् ।
⁴अन्यापदेशकथनैर्मनोरथ इति स्मृतः ॥ २० ॥
जब किसी गूढ़ मनोगत भाव को अन्य वस्तु के कथन के व्याज के द्वारा
बतलाया जाए तो ऐसी सुनियोजित वाक्यावली को 'मनोरथ'³ समझना
चाहिए ॥ २० ॥
आख्यान—
⁵पृष्टैरपृष्टैरथवा निर्णयः क्रियते तु यः ।
आख्यानमिति तज्ज्ञेयं लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ २१ ॥
१. 'पदोच्चय' का नाम तथा लक्षण दोनों पाठों में मिलता है ।
२. 'आक्रन्द' के स्थान पर अन्य पाठ में 'तुल्यतर्क' रखा गया है ।
३. 'मनोरथ' का लक्षण दोनों पाठों में गृहीत है ।
१. ग्रथनात्मकम्—क; मथनात्मकम्—ख०; कथनात्मकम्—ग० ।
२. भावेष्वपत्यस्य—ख०; ग० ।
३. सुस्पष्टार्थप्रदर्शकम्—ख०; ग० ।
४. कथनं—ख०; ग० ।
५. अपृष्टैरथवा पृष्टै—ख०; ग० ।

सप्तदशाध्यायानुबन्धः ३१९
जब प्रश्नपूर्वक या बिना किसी प्रश्न या पूछताछ के ही किसी बात का
निश्चय किया जाए तो उसे 'आख्यान'१ समझना चाहिए ॥ २१ ॥
याच्ञा—
आदौ १यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
यत्र२ प्रियं पुनर्वाक्यं सा याच्ञा परिकीर्तिता ॥ २२ ॥
जिस वचन को हितकर समझ कर आरम्भ में कहने पर क्रोध की तथा
अन्त में हर्ष की उत्पत्ति हो तथा जो प्रियजन को (उनकी ही भलाई के
लिये) कहा जाता हो तो ऐसा कथन 'याच्ञा'२ कहलाता है ॥ २२ ॥
प्रतिषेध—
कार्येषु विपरीतेषु यदि ३किञ्चित्प्रवर्तते ।
निवार्यते च कार्यज्ञैः प्रतिषेधः प्रकीर्तितः ॥ २३ ॥
यदि कोई विपरीत कार्य में प्रवृत्त हो या किसी की निषिद्ध कार्य में
प्रवृत्ति को देखकर उसे कार्यज्ञ या अनुभवी पुरुष उस कार्य से निवृत्त होने
या हटने का उपदेश देता हो तो ऐसा कथन 'प्रतिषेध'३ कहलाता है ॥२३॥
पृच्छा—
यत्राकारोद्भवैर्वाक्यैरात्मानमथवा परम् ।
४पृच्छन्निवाभिधत्तेऽर्थं सा पृच्छेत्यभिसंज्ञिता ॥ २४ ॥
१. 'आख्यान' के स्थान पर अन्य पाठ में 'प्रसिद्धि' प्राप्त होता है।
२. 'याच्ञा' के स्थान पर अन्य पाठ में 'दाक्षिण्य' प्राप्त होता है। याच्ञा
का अन्य लक्षण भी प्राप्त होता है। जैसे :—
लाभोपपत्तिमाख्याय स्वयं दूतमुखेन वा ।
प्रार्थ्यते यत्र कन्या या सा याञ्चेत्यभिधीयते ॥
अर्थात् स्वयं या दूत के द्वारा लाभ की उपलब्धि या संभावना को दर्शाते हुए
जब किसी कन्या की प्रार्थना की जाए तो उसे 'याच्ञा' कहते हैं। अन्य
विद्वानों का मत है कि केवल कन्या मात्र की याचना करने से यह
याचना के एक पार्श्व की ही सूचक होगी। कुछ अन्य इसे प्रियवचन से
मेल खाने के कारण 'प्रियोक्ति' नामक लक्षण के स्थान पर मानते हैं।
३. 'प्रतिषेध' के स्थान पर अन्य पाठ में 'लेश' रखा गया है।
१. च क्रोधजं नित्यं—क० । २. यत्तु—ख० ; ग० ।
३. कश्चित्—ख० ; ग० । ४. पृच्छत्यभिनयेनार्थं—ख० ; ग० ।

३२० नाट्यशास्त्रम्
जब किन्हीं गूढ़ अभिप्रायों को संकेतित करने वाले वाक्यों के द्वारा
अन्य व्यक्ति या स्वयं को ही पूछते हुए जब किसी तथ्य या अर्थ का कथन
किया जाए तो उसे 'पृच्छा'¹ समझना चाहिए ॥ २४ ॥
दृष्टान्त—
विद्वान्¹ पूर्वोपलब्धौ यत् समत्त्वमुपपादयेत् ।
निदर्शनकृतस्तज्ज्ञैः स दृष्टान्त इति स्मृतः ॥ २५ ॥
जब कोई विद्वान् व्यक्ति किसी पदार्थ की समता को अपनी पूर्व उपलब्ध
वस्तु के साथ तुलना करते हुए स्थापित करे या बतलावे तो उसे 'दृष्टान्त'²
नामक लक्षण समझना चाहिए ॥ २५ ॥
निर्भासन—
अनेकयुक्तिमद्वाक्यमनेकार्थप्रसाधकम्² ।
³अनेकवाक्यसंयुक्तं⁴ तन्निर्भासनमुच्यते ॥ २६ ॥
जो कथन अनेक युक्तियों से युक्त, अनेक वाक्यों से भरा हुआ एवं
अनेक उद्देश्य या प्रयोजन का साधक होता है तो उसे 'निर्भासन'³ समझना
चाहिए ॥ २६ ॥
संशय—
अपरिज्ञाततत्त्वार्थं यत्र वाक्यं समाप्यते ।
⁵सोऽनेकत्वाद्धिचाराणां संशयः परिकीर्तितः ॥ २७ ॥
जब वाक्य की समाप्ति किसी तथ्य या तात्त्विक अर्थ को जाने बिना ही
१. 'पृच्छा' का दोनों पाठों में समान रूप से सन्निवेश है ।
२. 'दृष्टान्त' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भिन्न हैं ।
३. निर्भास या निर्भासन के स्थान पर अन्य पाठ में 'माला' मिलता है ।
१. विद्वन् पूर्वो—क०; सिद्धं पूर्वोपलब्धो यः—ख०; ग० ।
२. मनेकप्रकृतिस्थितम्—क० ।
३. वचनैर्युक्तं—क० ।
४. मासनं नाम तद्भवेत् —ख०, ग० ।
५. अनेकत्वाद्धि—ख०; ग० । क ( भ० ) पुस्तके तु संशयस्य लक्षणं
भिद्यते—तद्यथा—“परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराथैर्व्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥” इति ।

सप्तदशोऽध्यायः ३२१
हो जाए तो अनेक विचारों के द्वारा प्रयुक्त ऐसे कथन को 'संशय' समझना
चाहिए ॥ २७ ॥
आशीः—
यथा¹ शास्त्रार्थसम्पन्नां² मनोरथसमुद्भवम्³ ।
अप्रार्थनीयामन्यां⁴ वा विदुस्तामाशिषं बुधाः ॥ २८ ॥
जब किसी नीति या शास्त्र के अनुसार मनोऽनुकूल भावना से उद्भूत
बिना किसी प्रार्थना के करने पर जो आशीर्वाद दिया जाता हो तो उसे
विद्वज्जन 'आशीः'² नामक लक्षण कहते हैं ॥ २८ ॥
प्रियवचन—
आदौ यत् क्रोधजनन मन्ते हर्षप्रवर्धनम् ।
तत् प्रियं वचनं ज्ञेयमाशीर्वादसमन्वितम् ॥ २९ ॥
जो आरम्भ में क्रोध को और अन्त में हर्ष को उत्पन्न करते हुए किसी
आशीर्वाद की सूचना देता हो तो ऐसा कथन 'प्रियवचन'³ (या प्रियोक्ति)
कहलाता है ॥ २९ ॥
कपटसंघात—
⁵छलयुक्त्या त्वन्येषामभिसन्धानाभिभावकं कपटम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तौ विज्ञेयः कपटसङ्घातः ॥ ३० ॥
१. 'संशय' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान है । इसके
अतिरिक्त 'भ' पाठ के अनुसार—
परप्रशंसावचनं प्रयुक्तं योऽभ्यसूयते ।
पूर्वोत्तराभ्याघातः संशयः स तु कीर्तितः ॥
(अन्य पुरुष की प्रशंसा में कहे गये कथन को सुनकर जिसके मन में असूया
उत्पन्न हो तथा पूर्व कथन से उत्तर कथन का इसी कारण जब विरोध होने लगे
तो इसे 'संशय' समझना चाहिए ।)
२. 'आशीः' के स्थान पर अन्य पाठ में 'निदर्शन' मिलता है ।
३. प्रियवचन या प्रियोक्ति के स्थान पर अन्य पाठ में 'अंश' प्राप्त
होता है ।
१. यदा—क०; यत्र—ग० । २. सम्पन्नं—क० ।
३. समुद्भवम्—क० । ४. नीयमन्यं वा—क० ।
५. छलयुक्त्या यदान्येषां मत्वा नायकभावनम् ।
द्वित्रिप्रयोगयुक्तेन ज्ञेयं कपटसंज्ञितम् ॥—क० ।
२१ ना० शा० द्वि०

३२२ नाट्यशास्त्रम्
जब एक साथ किसी को छलने या भ्रम उत्पन्न करने के लिये दो या
तीन बार कपट प्रयोग का सहारा लेते हुए कथन किया जाए तो ऐसी उक्ति
को 'कपटसंघात'१ समझना चाहिए ॥ ३० ॥
क्षमा—
दुर्जनोदाहृतै रूक्षैः सतां१ मध्येऽभिताडितः२ ।
अक्रोधः क्रोधजननैर्वाक्यैर्यैः सा क्षमा भवेत् ॥ ३१ ॥
जब किन्हीं दुष्ट पुरुषों के द्वारा सज्जनों के समक्ष सभा में अभिहित
उत्तेजक एवं क्रोध के उत्पन्न करने वाले वचनों से अभिभूत होने पर भी जो
व्यक्ति शान्त एवं क्रोधहीन दशा में स्थित हो तो ऐसे गुण को 'क्षमा'२
समझना चाहिए ॥ ३१ ॥
प्राप्ति—
दृष्ट्वावयवं३ किञ्चिद्भावो४ यत्रानुमीयते ।
प्राप्तिं५ तामभिजानीयाल्लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३२ ॥
जब (किन्ही) चेष्टाओं को देखकर ही किसी के मनोगत भाव को जान
लिया जाए उसे उत्तम नाटकों में स्थित 'प्राप्ति'३ नामक लक्षण समझना
चाहिए ॥ ३२ ॥
१. 'कपट' या 'कपटसंघात' के स्थान पर अन्य पाठ में 'गर्हण' मिलता है ।
भोज ने कपट का लक्षण इस प्रकार दिया है—
अदिव्यं दिव्यमपि वा कृत्वा रूपविपर्ययम् ।
अविद्वान् वञ्च्यते येन कपटं तदुदाहृतम् ॥
अर्थात् जब किसी दिव्य या अदिव्य वेश को धारण कर अपने रूप में
परिवर्तन के द्वारा किसी साधारण मनुष्य (अविद्वान्) को धोखा दिया जाता हो
तो यह कार्य 'कपट' कहलाता है ।
२. क्षमा के स्थान पर अन्य पाठ में 'विशेषण' मिलता है ।
३. 'प्राप्ति' का दोनों पाठों में निवेश है । लक्षण भी समान हैं ।
१. सतां मध्ये—क० । २. तिताडितः—ख०; ग० ।
३. दृष्ट्वावयवं—ख०; दृष्टैर्वावयवैः—ग० ।
४. यत्रोपनीयते—क०; यत्रोपमीयते—ख०; ग० ।
५. तामपि—ग० ।

सप्तदशोऽध्यायः ३२३
पश्चात्ताप—अकार्यं सहसा कृत्वाऽकृत्वा कार्यमथापि वा ।
सन्तापो मनसो यस्तु पश्चात्तापः १प्रकीर्तितः ॥ ३३ ॥
किसी अविचारित या असत् कार्य को या किसी कार्य को (पूर्ण) करने के
बाद या न करने के बाद जो मानसिक ताप होता हो तो ऐसी दशा में होने
वाले कथन को 'पश्चात्ताप'१ कहते हैं ॥ ३३ ॥
अनुवृत्ति—
प्रश्रयेणार्थसंयुक्तं यत् परस्यानुवर्तनम् ।
स्नेहाद्दाक्षिण्ययोगाद्वा सानुवृत्तिस्तु संज्ञिता ॥ ३४ ॥
जब किसी व्यक्ति के कथन का सौजन्यवश, प्रेम या पक्षपात के कारण
अनुसरण या समर्थन किया जाता है तो उसे 'अनुवृत्ति'२ कहते हैं ॥ ३४ ॥
उपपत्ति—
प्राप्तानां२ यत्र दोषाणां क्रियते शमनं पुनः ।
सा३ ज्ञेया ह्युपपत्तिस्तु लक्षणं नाटकाश्रयम् ॥ ३५ ॥
असत् या अवास्तविक दोषों के उपस्थित होने पर उनका उचित रूप
से जब उपपत्तिपूर्वक निराकरण किया जाता है तो ऐसा कथन 'उपपत्ति'३
कहलाता है, जिसका नाटकों में प्रयोग होता है ॥ ३५ ॥
युक्ति—साध्यते योऽर्थसम्बन्धो४ महद्भिः समवायतः ।
परस्परानुकूल्येन सा युक्तिः परिकीर्तिता ॥ ३६ ॥
जिस विचार की समानता एवं परस्पर अनुकूलता के आधार पर
उत्कृष्टता के साथ प्रतिपादन या सिद्धि की जाए तो ऐसा कथन 'युक्ति'४
कहलाता है ॥ ३६ ॥
कार्य—५यत्रापसारयन् दोषं गुणमर्थेन योजयेत् ।
६गुणाभिवादं दोषाद्वा कार्यं ७तल्लक्षणं विदुः ॥ ३७ ॥
१. 'पश्चात्ताप' के स्थान पर अन्य पाठ में 'विचार' मिलता है ।
२. 'अनुवृत्ति' के स्थान पर 'अनुनय' मिलता है ।
३. 'उपपत्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'उपदिष्ट' मिलता है ।
४. 'युक्ति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अभिप्राय' मिलता है ।
१. स उच्यते—क० । २. प्रोक्तानां—क० । ३. ज्ञेया सा—क० ।
४. सन्तानो—क० । ५. यत्र सङ्कीर्तयन्—क० ।
६. गुणकीर्तिते हि दोष—क०; गुणातिवादो दोषाद्वा—ख०; ग० ।
७. तदिह कीर्तितम्—ख०; तदिह संज्ञितम्—ग० ।

३२४ नाट्यशास्त्रम्
जब किसी पदार्थ या व्यक्ति के गुण को दोष अथवा दोष को गुण में
परिणत करते हुए उपपादित किया जाता है तो ऐसा कथन 'कार्य'१
कहलाता है ॥ ३७ ॥
अनुनीति—
१अपूर्वक्रोधजनितमपराधं प्रमृज्य२ यत् ।
सेवार्थं मधुरं वाक्यं ३साऽनुनीतिः प्रकीर्तिता ॥ ३८ ॥
क्रोधवश किसी के एक अपराध को बिसार कर जब प्रेमवश या सेवा
भावना से प्रेरित होकर मधुर वचन का उच्चारण किया जाता है तो ऐसे
कथन को 'अनुनीति'२ कहते हैं ॥ ३८ ॥
परिदेवन—
४दोषैर्यदन्यनामोक्तैः प्रसिद्धार्थैः५ प्रयोजितम्६ ।
अन्यत्रार्थेन ७सम्बद्धं ज्ञेयं तत् परिदेवनम्८ ॥ ३९ ॥
दूसरों के नाम पर उच्चारित दोषों की प्रसिद्ध बातों द्वारा प्रयुक्त वचनों
को या गुणों का आधार लेकर जब अन्यत्र सम्बद्ध किया जाए या उसे
अन्यथा प्रतिपादित किया जाए तो मिथ्यादोष के उपपादन से पूर्ण ऐसे
कथन को 'परिदेवन'३ कहते हैं ॥ ३९ ॥
इति सप्तदशाध्यायानुबन्धः समाप्तः ।
१. 'कार्य' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अर्थापत्ति' मिलता है ।
२. 'अनुनीति' के स्थान पर अन्य पाठ में 'अनुनय' मिलता है । आचार्य
अभिनव गुप्त ने इसके स्थान पर 'प्रसिद्धि' को भी निर्देशित किया है ।
३. 'परिदेवन' के स्थान पर 'क्षोभ' को अन्य पाठ में रखा गया है
तथा 'अनुक्तिसिद्धि' को भी । भोज ने इसे परिवादन तथा सर्वेश्वर ने
परिवेदन माना है। शारदातनय ने परिवाद का संक्षिप्त लक्षण करते
हुए 'परिवादो मृषादोषः' अर्थात् मिथ्यादोष के उपपादन को 'परिवाद'
बतलाया है ।
१. अपूर्वक्षोभ—क० । २. प्रमार्जयेत्—ख०; ग० ।
३. मनुनीतिः—ख०; ग० । ४. यद्दोषैरन्य—ख०; ग० ।
५. प्रसिद्धार्थंप्रयोजनम्—क० । ६. प्रयोजयेत्—ख०; ग० ।
७. सम्बन्धो—ख०; ग० । ८. परिवादनम्—क० ।

अष्टादशोऽध्यायः
भाषाविधानाध्यायः
प्राकृत-पाठ्य-लक्षण—
एवन्तु¹ संस्कृतं पाठ्यं मया प्रोक्तं समासतः² ।
प्राकृतस्य³ तु पाठ्यस्य सम्प्रवक्ष्यामि लक्षणम् ॥ १ ॥
इस प्रकार (पूर्व अध्याय में) मैंने संक्षेप में संस्कृत-पाठ्य¹ के विषय में
बतलाया। अब मैं प्राकृत-पाठ्य का लक्षण कहता हूँ ॥ १ ॥
एतदेव विपर्यस्तं संस्कारगुणवर्जितम् ।
विज्ञेयं प्राकृतं पाठ्यं नानावस्थान्तरात्मकम् ॥ २ ॥
यही संस्कृतपाठ्य जब संस्कार के गुणों से हीन होकर परिवर्तित
१. पिछले दो अध्यायों में वाचिक अभिनय के निरूपण के प्रसंग में संस्कृत
तथा प्राकृतपाठ्य का उल्लेख किया जा चुका है। इनमें संस्कृतपाठ्य के
सन्दर्भ में विविध छन्दों का लक्षणपूर्वक निरूपण पिछले अध्याय में होने
पर भी प्राकृत पाठ्य का स्वरूप शेष ही रह जाता है। अतएव इस
अध्याय में प्राकृत-पाठ्य का स्वरूप निरूपण आवश्यक होने के कारण
इसकी पूर्व अध्याय से संगति (स्थापित होती) है। 'पाठ्य' का अर्थ
है जो विशेषतापूर्वक पढ़ा या कहा जाए या प्रयत्नपूर्वक पढ़े जाने या
कहे जाने के जो योग्य हो अथवा जो किसी विशेष रूप में या विशेष
विधि के द्वारा उच्चारित हो, क्योंकि आन्तरिक चित्तवृत्ति के अनुरूप
जब किसी वचन का उच्चारण उपयुक्तता किये हुए होता है तभी उसे
पाठ्यसंज्ञा प्राप्त होती है जिसकी आचार्य द्वारा विधिवत् शिक्षा दी जाए
और ऐसा शिक्षित होकर किया हुआ उच्चारण ही 'पाठ्य' कहलाता भी
है। आचार्य अभिनवगुप्त ने पाठ्य शब्द के यही तीन प्रकार के निर्वचन
प्रस्तुत किये हैं। (द्र० अभि० भा०—पठनाहं, पठितुं शक्यम् आचार्य-
यत्नेन वा पठनीयमिति पाठ्यम् ।)
१ पाठ्यन्तु संस्कृतं विप्राः; एतत्तु—क० ।
२. द्विजोत्तमाः—ग० । ३. प्राकृतस्यापि—क० ।

३२६ | नाट्यशास्त्रम्

स्वरूप वाला हो जाता है तो 'प्राकृतपाठ्य' कहलाता है । विभिन्न दशाओं
के कारण परिवर्तित होने वाला इसका अपना विशेष स्वरूप होता है ॥ २ ॥
प्राकृतपाठ्य के तीन प्रकार—
त्रिविधं तच्च¹ विज्ञेयं नाट्ययोगे² समासतः ।
समानशब्दं ³विभ्रष्टं देशीगतमथापि च ॥ ३ ॥
नाट्य प्रदर्शन (या रचना) में होने वाला यह प्राकृतपाठ्य तीन प्रकार
का होता है। यथा—(१) समानशब्दों या तत्सम से होने वाला
(२) विभ्रष्ट या तद्भव शब्दों से होने वाला तथा (३) देशी शब्दों से
होने वाला¹। ३ ॥
[ ⁴पाठ्यमेकन्तु विज्ञेयं संस्कृतं प्राकृतं तथा । ]
⁵कमलामलरेणुतरङ्गोलोलसलिलादिवाक्यसम्पन्नम्⁶ ।
प्राकृतबन्धेष्वेवं⁷ ⁸संस्कृतमपि⁹ योगमुपयाति ॥ ४ ॥
संस्कृत के समान प्राकृत में भी कमल, अमल, रेणु, तरंग, लोल, सलिल
आदि समान शब्दों से निर्मित वाक्यों का प्रयोग किया जाता है। अर्थात्
ये समान रूप से प्रयुक्त होने से तत्सम शब्द हैं जिनका दोनों भाषाओं में
अपने वाक्यों में नियमित प्रयोग किया जाता है ॥ ४ ॥
ये वर्णाः ¹⁰संयोगस्वरवर्णान्यत्वमूनताञ्चापि¹¹ ।
¹²यान्त्यपदादौ प्रायो विभ्रष्टाँस्तान् विदुर्विप्राः ॥ ५ ॥
जो शब्द स्वर या वर्ण के परिवर्तन के कारण पदों या वाक्यों के साथ
१. समानशब्द, विभ्रष्ट तथा देशीगत को परवर्ती व्याकरण तथा नाट्य के
आचार्यों ने तत्सम, तद्भव ओर देशी शब्द से अभिहित किया ।
१. तद्धि—क० । २. नाट्ययोगं—क० ।
३. शब्दैर्बिनष्टं—क०, शब्दैर्विभ्रष्टं—ख० ।
४. इदं श्लोकार्धं ख० ग० पु० नास्ति ।
५. कमलदलरेणुकेसरतरङ्गसलिलादि—क० ।
६. लोलजालादि, लोलसलीलादि—क० । ७. ष्बेतत्—क० ।
८. संयुक्तमपि, संस्कृतमिव—क० ।
९. मिव प्रयोगमुपयाति—ग० ।
१०. संयुक्ताः—क०; ख०; संयोगात्—ग० ।
११. न्यूनतां वापि—ग० ।
१२. गच्छन्ति पदन्यस्तास्ते विभ्रष्टा इति ज्ञेयाः—ख०; ग० ।