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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 420, कुल 668 में से

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पृष्ठ 420

सप्तदशोऽध्यायः ३०९
१युद्धसम्पेटयोस्तज्ज्ञैरुत्कृतिः सम्प्रकीर्तिता ।
करुणे शक्वरी चैव२ तथा चातिधृतिर्भवेत् ॥ १११ ॥
युद्ध तथा उपद्रवों (संकट) के वर्णन में 'उत्कृति' छन्द का तथा
करुण-रस में शक्वरी तथा अतिधृति छन्दों की योजना करना उचित
होता है ॥ १११ ॥
यद्वीरे कीर्तितं३ छन्दस्तद्रौद्रेऽपि प्रयोजयेत् ।
शेषाणामर्थयोगेन छन्दः कार्यं४ प्रयोक्तृभिः ॥ ११२ ॥
जो 'छन्द' वीररस के लिए उपयुक्त हों उन्हें रौद्ररस में भी प्रयोग हेतु
उचित समझना चाहिए। शेष रसों में उनके अर्थानुसार यथोचित छन्दों की
योजना की जाए ॥ ११२ ॥
अक्षरों की रसानुकूल योजना-विधि—
त्रिविधं ह्याक्षरं५ कार्यं कविभिर्नाटकाश्रयम् ।
ह्रस्वं६ दीर्घं प्लुतश्चैव ७रसभावविभावकम् ॥ ११३ ॥
नाटकों (काव्य) की रचना में कविजन विभिन्न रसों तथा भावों की
अभिव्यक्ति के लिए ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करें ॥ ११३ ॥
एकमात्रं भवेद्ध्रस्वं द्विमात्रं दीर्घमुच्यते ।
प्लुतश्चैव त्रिमात्रं स्याद् अक्षरं ८वर्णसंश्रयम् ॥ ११४ ॥
स्वरों के उच्चारणों के नियम के अनुसार एक मात्रा का अक्षर ह्रस्व, दो
मात्राओं का दीर्घ तथा तीन मात्राओं का प्लुत कहलाता है ॥ ११४ ॥
प्लुत वर्ण का प्रयोग विधान—
स्मृते ९चासूयिते चैव तथा च परिदेविते ।
पठतां ब्राह्मणानाञ्च लुतमक्षरमिष्यते ॥ ११५ ॥
किसी बात के स्मरण करने, असूया तथा रोदन क्रियाओं में तथा
ब्राह्मणों द्वारा वेद पठन करने में 'प्लुत' की योजना करनी चाहिए ॥ ११५ ॥
१. तथैव युद्धसंस्फोटावुत्कृत्यां सम्प्रकीर्तितम्—क०; तथैव युद्धसम्पेटावुत्कृत्यां
सम्प्रकीर्तितो—ख०; ग० ।
२. ज्ञेया तथैवातिधृति—ख०; ग० ।
३. कीर्त्यंते छन्दस्तद्रौद्रे सम्प्रयोजयेत्—ख० । ४. तथा रसः—ख० ।
५. काव्ये विज्ञेयं—ख०; काव्यं विज्ञेयं—ग० ।
६. प्लुतं ह्रस्वञ्च दीर्घञ्च—क० । ७. पदबन्धसमाश्रयम्—क० ।
८. स्वरयोजनात्—ग० । ९. वासूयिते—ख; चास्रयुते—ग० ।