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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 421, कुल 668 में से

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पृष्ठ 421

३१० नाट्यशास्त्रम्
आकारस्तु १ स्मृते कार्यम् २ उकारश्चाभ्यसूयिते ।
परिदेविते च हाकारम् ३ ओङ्कारोऽध्ययने तथा ॥ ११६ ॥
स्मरण में 'आ' का असूया में 'ऊ' का, रोदन में 'हा' का तथा वेदों के
अध्ययन में 'ओम्' का प्रयोग होना चाहिए ॥ ११६ ॥
ह्रस्वदीर्घप्लुतानीह यथाभावं यथारसम् ।
४ काव्यबन्धेष्वशेषेषु ह्यक्षराणि प्रयोजयेत् ॥ ११७ ॥
इसके अतिरिक्त सभी प्रकार की काव्य-रचनाओं में भाव तथा रसों की
स्थिति के अनुरूप ह्रस्व, दीर्घ तथा प्लुत अक्षरों का प्रयोग करना
चाहिए १ ॥ ११७ ॥
५ यच्छन्दः पूर्वमेवोक्तं विषमार्द्धसमे समम् ।
६ उदारमधुरैः शब्दैस्तत् ७ कार्यन्तु रसानुगम् ॥ ११८ ॥
पूर्व अध्याय में जिन सम, अर्धसम तथा विषम छन्दों को बतलाया
गया है उनका उदार तथा मधुर-शब्दावली द्वारा काव्यों में अर्थानुसारी
प्रयोग किया जाए ॥ ११८ ॥
शब्दानुदारमधुरान् प्रमदाभिधेयान् ८
९ नाट्याश्रयासु कृतिषु प्रयतेत कर्तुम् ।
तैर्भूषिता भुवि विभान्ति हि काव्यबन्धाः
पद्माकरा विकसिता इव राजहंसैः ॥ ११९ ॥
नाटककार अपनी रचना में ऐसे शब्दों का प्रयोग करे जो औदार्य गुण
१. आशय यह कि दूर से बुलाने आदि के लिये व्याकरण शास्त्र में अभिहित
प्लुत आदि नियमों का भी प्रयोग विधिवत् करना चाहिए ।
१. अकारस्तु स्मृते कार्ये—ग० ।
२. हुङ्कारं वाप्यसूयिते—ख०; उकारश्चाप्यसूचिते—ग० ।
३. हुंकार—ख० ।
४. एतानि काव्ययोगेषु त्वक्षराणि निवेशयेत् क, काव्ययोगेष्वक्षराणि यथा
शोभं निवेशयेत्—ख० । काव्ययोगेषु सर्वेषु ह्यक्षराणि तु योजयेत्—ग०; ।
५. ये बन्धाः पूर्वमुद्दिष्टा विषमार्धसमा समाः—ख० ।
६. उदारशब्दैर्मधुरैः कार्यास्तेऽर्थवशान्नुगाः—ग० ।
७. कार्यास्ते स्यु रसानुगाः—ख० । ८. प्रमदाभिनेयान्—ख०; ग० ।
९. नाट्याश्रितान्—क०; नाट्याश्रयान् नु—ख० ।