नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३१२ नाट्यशास्त्रम्
मृदुललितपदार्थं¹ गूढशब्दार्थहीनं
²जनपदसुखभोग्यं ³युक्तिमन्नृत्तयोज्यम् ।
⁴बहुकृतरसमार्गं सन्धिसन्धानयुक्तं
⁵भवति जगति योग्यं नाटकं प्रेक्षकाणाम् ॥ १२१ ॥
इति भारतीये नाट्यशास्त्रे वागभिनये⁶ काव्यलक्षणो
नाम सप्तदशोऽध्यायः ।
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जिस नाट्य-रचना में मृदु तथा ललित अर्थों वाली पदावली हो, गूढ़
शब्द तथा अर्थ न हों, प्रेक्षक सुखपूर्वक देख और समझ सकें तथा आनन्द
उपलब्ध करे, जिसमें युक्ति एवं विचारपूर्वक नृत्त की योजना की गई हो,
रस की प्रवाहमय गति हो, सन्धियों का (जिसमें) स्पष्ट स्वरूप परिलक्षित
होता हो वही नाटक संसार में प्रेक्षण योग्य हो जाता है ॥ १२१ ॥
भरतनाट्यशास्त्र का वागभिनयान्तर्गत (लक्षणालंकार गुण-दोष-निरूपण तथा)
काव्यलक्षण नामक सत्रहवां अध्याय समाप्त ।
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१. पदाढ्यं—ख० ।
२. बुधजनसुखभोग्यं—क०; जनपदसुखबोध्यं—ख०; बुधजनसुखयोग्यं—ग० ।
३. बुद्धिमन्नृत्त—ग० ।
४. बहुरसकृतमार्गं—क०, ग० ।
५. स भवति सुकवि काव्यं नाट्यकाले मनोज्ञम्—क० ।
६. वागभिनयो नाम षोडशोऽध्यायः—क०, ख० ।