नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३११
से पूर्ण,१ ( अर्थपूर्ण ) तथा मधुर हों, जिन्हें स्त्रियों के द्वारा उच्चारण किया
( या गाया ) जा सके। यदि इन विशेषताओं से युक्त काव्य रचना होगी तो
वह राजहंसी से युक्त कमल सरोवरों जैसी अति सुन्दर होकर सुशोभित
होगी ॥ ११९ ॥
चेक्रीडितप्रभृतिभिर्विकृतैश्च१ शब्दै-
र्युक्ता२ न भान्ति ललिता भरतप्रयोगाः ।
यज्ञक्रियेव३ ४रुरुचर्मधृतैर्घृताक्तै-
र्वैश्या द्विजैरिव कमण्डलुदण्डहस्तैः ॥ १२० ॥
‘चेक्रीडित’२ जैसे रूक्ष शब्दों ( के प्रयोगों ) से युक्त नाट्यरचना सुन्दर
नहीं लगती। जैसे कृष्णाजिन तथा रूक्ष ( मृग ) चर्म को वहन करने वाले,
यज्ञ के घृत से सने हुए कमण्डल और अक्षमाला युक्त हाथों वाले ब्रह्मचारी
गण का नर्तकी ( वेश्या ) के साथ हो जाना अनुचित होता है ॥ १२० ॥
१. यहाँ कारिका में उदार पद से शब्दगुण तथा मधुर पद से उसी के
अनुकूल माधुर्यादि गुणों का प्रयोग सूचित किया गया है। इसी प्रकार
प्रमदाभिधेय पद की अन्य व्याख्या भी है। तदनुसार प्रमद का अर्थ है
आह्लादजनक जिनका अभिधेय अर्थात् भावार्थ या हृदयगत-क्रियाविशेष
हों ऐसे समग्र अर्थगुणों से युक्त भावों वाली पदावली का नाटकीय रचना
में प्रयोग किया जाए।
२. ‘चेक्रीडित’ पद यङन्त है। यहाँ आदि शब्द से इसी प्रकार के ण्यन्त या
सन्नन्त पदों का भी प्रयोग नटों के लिये उचित नहीं होता यह संकेत
दिया है। यहाँ अन्य व्याख्यान इस प्रकार भी है कि जैसे ललित अर्थात्
सुकुमार प्रयोग कठोर या रूक्ष पदावली से युक्त नहीं रहते ठीक उसी
प्रकार जैसे वेश्याओं के साथ कमण्डलधारी ऋजुवृत्ति ब्रह्मचारी को
रखना अनुचित है या जैसे यज्ञक्रिया में ब्रह्मचारी के साथ वेश्याओं
का रखना अनुचित होता है। इस प्रकार यह दृष्टान्त साधर्म्य तथा
वैधर्म्य दोनों प्रकार से बनकर रसानुकूल एवं व्याकरण शास्त्रसम्मत
प्रसिद्ध तथा प्रचलित शब्द प्रयोगों को ही नाट्यरचना में समावेश के
उपयुक्त निदर्शित करता है।
१. प्रकृतिभि—ख०; ग० । २. मुक्ता—क० ।
३. कृष्णाजिनाक्षरुह—ग० ।
४. शरवमंधुरैः घृताक्तैः—ख०; चर्मधुरैः—ग० ।