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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 418, कुल 668 में से

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पृष्ठ 418

सप्तदशोऽध्यायः ३०७
[ अनेकार्थविशेषैर्यत् सूक्तैः सौष्ठवसंयुतैः¹।
²उपेतमतिचित्रार्थैरुदात्तं तच्च कीर्त्यते ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—अनेक विशेष अर्थों से जो रचनागत पदावली निपुणता-
पूर्वक कहे गए सुन्दर शब्दों के कारण अनेक विचित्र अर्थों को धारण करे तो
उसे 'उदात्त' गुण जानो । ]
कान्ति—
यन्मनः³ श्रोत्रविषयमाह्लादयति⁴ हीन्दुवत् ।
⁵लीलाद्यर्थोपपन्नां वा तां कान्तिं कवयो विदुः ॥ १०५ ॥
जिस रचना में पात्र की शृङ्गारक्रीडा का किया जाने वाला वर्णन मन
और कानों को जब आह्लादित कर दे तो उसे 'कान्ति' गुण जानो ॥१०५॥
कलानां सीमानं परमिह युवामेव भजथः ।' इत्यादि ।
इसी प्रकार जब चित्रपदों के बन्ध से विकटत्व या पदों के नर्तन करने जैसी
काव्यरचना हो तो उसे भी 'उदारता' ही कहते हैं । जैसे—
'स्वचरणविनिविष्टैर्नपुरैर्नर्तकीनां झटिति रणितमासीत्तत्र चित्रं कलञ्चा' इत्यादि ।
यहाँ आचार्य हेमचन्द्र ने 'अनेकार्थविशेषैः' पाठ को गृहीत किया है ।
१. जो काव्यरचना शृङ्गार रस के विभावादि से या लीला आदि चेष्टाओं के
वर्णन से मन को आह्लादित करती हो उसे 'कान्ति' समझना चाहिए ।
इसे ही अन्य आचार्य दीप्तरसता का नाम देते हैं । जैसे—'प्रेयान्
सोऽयमपाकृतः सशपथं पादानतः कान्तया' (अ० श० ) इत्यादि । यहाँ
ईर्ष्या अनुभाव, रति भाव तथा औत्सुक्य संचारी के द्वारा शृङ्गाररस को
दीप्त किये जाने से कान्ति नामक गुण है । इसके अतिरिक्त जो वर्णगत
काव्यबन्ध से श्रोत्र को आह्लादित करे तो ऐसी काव्यरचना भी 'कान्ति'
गुणशालिनी ही होगी । जैसे—'कुरङ्गिनेत्रालीस्तवकितवनालीपरिसरः'
इत्यादि । यहाँ समासयुक्त रचना श्रोत्र को आह्लादित करते हुए
एकतानता को बनाए रखती है, अतः मधुर काव्य के कारण 'कान्ति'
गुण यहाँ भी समझना चाहिए ।
१. संज्ञितैः—क० । २. उपेतमनतिग्राह्यैरुदारं—क० ।
३. यो मनःश्रोत्रविषयः प्रसादजनको भवेत्—ग० ।
४. प्रह्लादजननं भवेत्—प्रह्लादजननं तथा—क० ।
५. शब्दबन्धोऽत्रयोगेन स कान्त इति भण्यते—शब्दबन्धात्थंयोगेन तत्कान्तिरिति
भण्यते—, शब्दतत्वार्थसंयोगे तत्कान्तिरिवित कीर्त्यते—क०; शब्दबन्धः
प्रयोगेण स कान्त इति भण्यते—ग० ।