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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

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पृष्ठ 419

३०८ नाट्यशास्त्रम्
रसानुसारी अलंकार तथा छन्दों का प्रयोग-विधान—
एवमेते ह्यलङ्कारा गुणा दोषाश्च कीर्तिताः ।
प्रयोगमेषाञ्च पुनर्वक्ष्यामि रससंश्रयम् ॥ १०६ ॥
काव्य-रचना में स्थित अलंकार, दोष तथा गुणों का निरूपण किया
गया । अब मैं उनका रसाश्रित प्रयोग बतलाता हूं ॥ १०६ ॥
लघ्वक्षरप्रायकृतमुपमारूपकाश्रयम् ।
काव्यं कार्यन्तु १नाट्यज्ञैर्वीररौद्राद्भुताश्रयम् ॥ १०७ ॥
वीर, रौद्र तथा अद्भुत रसों के वर्णन में काव्य रचना लघु अक्षरों
से युक्त हो तथा उसमें उपमा या रूपक अलंकारों का प्रयोग होना
चाहिए ॥ १०७ ॥
गुर्वक्षरप्रायकृतं बीभत्से करुणे तथा ।
कदाचिद्वीररौद्राभ्यां २यदाधर्षणजं भवेत् ॥ १०८ ॥
बीभत्स ( तथा करुण ) रस में गुरु अक्षरों वाली रचना हो और जब
रौद्र तथा वीर रसों से करुण रस का वर्णन हो तब भी यथाशक्य
( कदाचित् ) गुरु अक्षरों वाली रचना होना चाहिए ॥ १०८ ॥
३रूपदीपकसंयुक्तमार्यावृत्तसमाश्रयम् ।
शृङ्गारे तु रसे कार्यं ४मृदुवृत्तं तथैव च ॥ १०९ ॥
शृङ्गाररस में रूपक तथा दीपक अलंकारों का तथा आर्यावृत्त का तथा
( फिर ) कोमल वृत्तों का प्रयोग करना चाहिए ॥ १०९ ॥
उत्तरोत्तरसंयुक्तं वीरे पाठ्यन्तु ५ यद्भवॆत् ।
जगत्यातिजगत्या ६ तु सङ्कृत्या चैव योजयेत् ॥ ११० ॥
वीररस की रचना में संयुक्त वर्णों का उत्तरोत्तर (अधिक) प्रयोग
होना चाहिए तथा उसमें अतिजगती तथा संस्कृति जैसे वृत्तों का भी प्रयोग
होना चाहिए ॥ ११० ॥
१. शास्त्रज्ञैः—ख० ; काव्यज्ञैः—ग० ।
२. यथा—क० । ३. नार्यावृत्त—ख० ।
४. काव्यं स्यान्नाटकाश्रयम्—ख० ।
५. काव्यन्तु—ख०; ग० ।
६. जगत्यां वा सङ्कृत्यां वापि तद्भवेत्—ख०; ग० ।