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सर्वकोश
नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)

Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary

महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा

DevanagariHindipublished668 पृष्ठ

पृष्ठ 411, कुल 668 में से

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पृष्ठ 411

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३०० नाट्यशास्त्रम्
विसन्धि—यदि शब्दों को परस्पर सन्धि हीन दशा में रखा जाय तो
वहाँ 'विसन्धि' नामक दोष होता है।
'शब्दच्युतश्च विज्ञेयमवर्णस्वरयोजनात्' ॥ ९३ ॥
शब्दच्युत—जहां एक वर्ण या स्वर का लोप कर दिया जाय तो वहाँ
'शब्दच्युत'² दोष होता है ॥ ९३ ॥
³एते दोषा हि काव्यस्य मया सम्यक् प्रकीर्तिताः ।
गुणा विपर्ययादेषां माधुर्यौदार्यलक्षणाः ॥ ९४ ॥
काव्य के ये ही दोष हैं जो मैंने आपको बतलाए। इन्हीं दोषों का
विपरीत स्वरूप में रहना 'गुण' कहलाता है जो उनके लक्षणानुसार माधुर्य,
औदार्य आदि अर्थों को वहन करते हो ॥ ९४ ॥
काव्य-गुण—
श्लेषः प्रसादः समता समाधिः माधुर्यमोजः पदसौकुमार्यम् ।
अर्थस्य च व्यक्तिरुदारता च कान्तिश्च ⁴काव्यस्य गुणा दशैते ॥ ९५ ॥
१. सन्धि के नियमों की उपेक्षा करने से काव्य में विसन्धि दोष हो
जाता है।
२. शब्दच्युत नामक दोष प्राकृतिक कारणों या दैनिक आदत के कारण
किन्हीं वर्ण के लोप करने या अन्यथा-करण के कारण होता है।
आचार्य अभिनवगुप्त ने इन दोषों में स्थूल दोषों को अनित्य तथा
शेष अRequest स्थूल दोषों को नित्य माना है। उनका मत है कि गूढ़ार्थ का
पताकास्थानकादि में प्रयोग करना, अनुवाद में अर्थान्तर दोष का प्रयोग
करना, हास्य में अर्थहीन दोष का प्रयोग, श्रोत्रियादि वक्ता के समक्ष
भिन्नार्थ दोष का प्रयोग, दूसरे को समझाने में एकार्थ दोष का प्रयोग,
उन्मादादि की दशा में अभिप्लुतार्थ दोष का प्रयोग तथा स्वयं के लिये
भिन्नवृत्त या विसन्धिदोष का प्रयोग-स्थल होने के कारण ग्राह्य या
प्रयोज्य हो सकता है अथवा ऐसी स्थिति में ये दोष नहीं भी माने जा
सकते हैं।
१. शब्दाच्च्युतं—क०; शब्दहीनं—ख०; ग० ।
२, मशब्दस्य च योजनात्—ख०; ग० ।
३. एते दोषास्तु विज्ञेयाः सूरिभिर्नाटकाश्रयाः ।
एत एव विपर्यस्ताः गुणाः काव्येषु कीर्तिताः ॥—ख०; ग० ।
४. काव्यार्थगुणा दशैते—ख० ।