नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३०३
जिस रचना में असमस्त पद हों, वे व्यर्थ का अर्थ प्रकट न करते हों
तथा दुर्बोध न हों तो उसे शब्दों की समानता के कारण 'समता' नामक
गुण कहते हैं ॥ ९८ ॥
[ १अन्योन्य सदृशा यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणाः ।
अलङ्कारा गुणाश्चैव समाः२ स्युः समता मताः ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जहां अलंकार तथा गुण समभाव से स्थित होकर एक दूसरे
के ( परस्पर ) शोभाक हों तो 'समता' नामक गुण जानो । ]
समाधि—
अभियुक्तैर्विशेषस्तु योऽर्थस्येहोपलक्ष्यते३ ।
तेन चार्थेन सम्पन्नः समाधिः परिकीर्तितः४ ॥ ९९ ॥
प्रतिभाशाली व्यक्तियों के द्वारा विशेष अर्थ जिस रचना में देख लिया
जाय तो उसे 'समाधि' गुण जानों ॥ ९९ ॥
[ उपमाद्युपदिष्टानांमर्थानां५ यत्नतस्तथा ।
प्राप्तानाञ्चापि६ सङ्क्षेपात् समाधिर्निर्णयो७ यतः ॥ ]
१. आरम्भ किये हुए रचनाक्रम का परित्याग न करते हुए जब असमस्त
पदावली में रचना की जाए तो निष्प्रयोजन तथा दुर्बोध अर्थ के अभिधान न होने
से समता गुण कहलाता है। जैसे :—
'मनसि च गिरं गृह्णन्तीमे किरन्ति न कोकिलाः।'
प्रस्तुत उदाहरण में विप्रलम्भ के उद्दीपक कथन को बिना निरर्थक पदावली
का विस्तार करते हुए असमस्त रचना के द्वारा प्रस्तुत कर दिया गया है।
२. जिस काव्य रचना के अन्य अर्थ का अति प्रतिभाशाली पुरुष ही अपूर्वता
के कारण उल्लेख कर सकें उस एकतानता से उन्नेय या समाहित मन से प्रतीत
अर्थ विशेष के उल्लेख को 'समाधि' समझना चाहिए। यह अपूर्वता अयोनि
अथवा अपूर्वार्थ तथा अन्यच्छाया योनि अर्थ से आती है। इसके अतिरिक्त यहाँ
पदबन्ध में आरोह अवरोह के क्रम का निर्वाह भी अपेक्षित माना जाता है।
१. अन्योन्य सदृशं यत्र तथा ह्यन्योन्यभूषणम्—ख०; ग० ।
२. समासात् समता यथा—ग० ।
३. र्थस्यैबोपलभ्यते—ख०; ग० । ४. परिकीर्त्यते—ग० ।
५. उपमित्युपदिष्टानां—उपमात्यपदिष्टानां—क० ।
६. क्वातिसंयोगात्—क०; क्वातिसंयोगः—ग० ।
७. परिकीर्त्यंते—क० ।