नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः २९३
यथा—केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः१ शोभते प्रवरकाननहस्ती ।
केतकीकुसुमपाण्डुरदन्तः२ शोभते प्रवरकाननहस्ती ॥ ६९ ॥
इस विशाल वन-गज के दांत केतकी के पुष्पों जैसे श्वेत पीत दिखाई
दे रहे हैं। तथा हाथी-रूपी विशालवन अपने केतकी के पुष्पों के पीले नीले
रंग के दांतों से और अधिक सुन्दर दिखलाई पड़ता है ॥ ६९ ॥
विक्रान्त यमक—
एकैकं पादमुत्क्रम्य३ द्वौ पादौ सदृशौ यदा४।
विक्रान्तयमकं नाम ५विज्ञेयं नामतो यथा ॥ ७० ॥
यदि एक पाद को छोड़कर दूसरा पाद समान हो (अर्थात् द्वितीय और
चतुर्थ पाद की रचना समान हो) तो उसे 'विक्रान्त यमक' जानें ॥ ७० ॥
यथा—स६ पूर्वं वारणो भूत्वा द्विशृङ्ग इव पर्वतः।
अभवद्दन्तवैकल्याद्विशृङ्ग इव पर्वतः ॥ ७१ ॥
यह हाथी पहिले अपने दो अंगों (दांत, चोटी) वाले पर्वत से तुलनीय
रहता था अब इसके दोनों दांत टूट जाने से यही शृङ्गहीन पर्वत जैसा हो
रहा है ॥ ७१ ॥
चक्रवाल यमक—
पूर्वस्यान्तेन पादस्य ७परस्यादिर्यदा समः।
चक्रवच्चक्रवालं तद् विज्ञेयं नामतो यथा८ ॥ ७२ ॥
यदि पादान्त शब्द की दूसरे पाद के प्रारंभ में आवृत्ति की जाए तो उसे
'चक्रवाल यमक' कहते हैं ॥ ७२ ॥
यथा—शैलास्तथा९ शत्रुभिराहताहता
हताश्च १०भूयस्त्वनुपुङ्गगैः खगैः।
१. मुकुल—ख०; ग० । २. मुकुल—ख०; ग० ।
३. मुत्क्षिप्य—ख० । ४. यदि—ग० । ५. तद्विज्ञेयमिदं—क० ।
६. सम्पूर्णवारणो—ख०; स पूर्वं वानरो—ग० ।
७. पादस्या—क० ।
८. चक्रवालयमकस्य लक्षणान्तरं क—पुस्तके तु —
तुल्यात् पादद्वयादन्त्यादेकेनादिर्यदा समः ।
सर्वत्र चक्रवालं तद्विज्ञेयं नामतो यथा ॥ इति अधिकं प्रक्षिप्तञ्च ।
९. तलैस्तथा—क०; शैला यथा—ख० ग० ।
१०. भूयोऽप्यनु—ख०; बाणैरनुपुङ्गगै—ग० ।