नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३०१
काव्य के दस गुण होते हैं। १ यथा - (१) श्लेष (२) प्रसाद
(३) समता (४) समाधि (५) माधुर्य (६) ओज (७) पद-
सौकुमार्य (सुकुमारता) (८) अर्थव्यक्ति (९) उदारता तथा
(१०) कान्ति ॥ ९५ ॥
श्लेष—
ईप्सितेनार्थजातेन १सम्बद्धानां परस्परम् ।
श्लिष्टता या पदानां २स श्लेष इत्यभिधीयते ॥ ९६ ॥
इष्ट अर्थों से परस्पर-सम्बद्ध पदों की श्लिष्टता (मसृणबन्धयोग) को
'श्लेष'-गुण कहा जाता है ॥ ९६ ॥
१. भामह तथा दण्डी ने काव्य के दस गुण माने हैं परन्तु उनके वर्णन
लक्षणादि भरतमुनि से भिन्न प्राप्त होते हैं। (द्र० भाम० काव्या० ३।१-४,
काव्यादर्श १।४१-९४) गुणों के लक्षण दो पाठों या तीन पाठों में मिलते हैं।
हेमचन्द्राचार्य आदि ने भरत के आधार पर गुणों का एक अलग ही पाठ
लिया जिसका वर्तमान नाट्यशास्त्र से भिन्न पाठ है। पर यह सभी गुणों
के लक्षणों में नहीं है। इसी कारण सभी लक्षणों को सम्मिलित करते
हुए तथा कुछ स्वोद्भावित गुणों को बढ़ाकर भोज तथा विद्यानाथ प्रभृति
ने चौबीस गुण प्रतिपादित किये हैं। कुछ आलङ्कारिक वामन एवं दण्डी
का अनुसरण करते हुए दस उनके सम्मत गुण मानते हैं। मम्मट तथा विश्वनाथ
कविराज ने तीन गुण ही काव्य के लिये स्वीकृत किये। गुणों के लक्षणानुसारी
विशद विवेचन का विकासपूर्ण क्रम हमने संक्षेप में परिशिष्ट में दे दिया है।
२. आचार्य अभिनवगुप्त के व्याख्यान के अनुसार कवि के द्वारा इष्ट अर्थों की
परस्पर सम्बद्ध पदों के द्वारा योजना करने पर जब पदों का परस्पर सन्धान इष्ट
अर्थ को उपपादित करता है तो 'श्लेष' नामक गुण समझना चाहिए। जैसे वामन
के द्वारा उदाहरण दिये गये निम्न पद्य में—
दृष्ट्वैकासनसंस्थिते प्रियतमे पश्चादुपैत्यादरात्
एकस्या नयने निमील्य विहितक्रीडानुबन्धच्छलः ।
ईषद्वक्रितकन्धरः सपुलकप्रेमोल्लसन्मानसा-
मन्तर्हासलसत्कपोलफलकां धूर्तोऽपरां चुम्बति ॥ (अम० श०)
(धूर्त नायक एक आसन पर बैठी हुई अपनी दोनों प्रियाओं को देखकर
आदरपूर्वक चुपचाप पीछे से आया और क्रीडा के व्याज से एक प्रिया की आँखें
१. सम्बद्धानुपस्परम्—ख०; ग० । २. हि—ख०; ग० ।