नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः २९९
एकार्थ—जहां अनेक शब्दों का एक ही अर्थ के लिए प्रयोग किया जाय
तो 'एकार्थ' नामक दोष होता है।
१अभिप्लुतार्थं विज्ञेयं यत् पदेन समस्यते ॥ ९१ ॥
अभिप्लुतार्थ—जिसके प्रत्येक पाद में संक्षेप में वाक्यार्थ (पूर्णरूप से)
स्थापित किया जाय उसे 'अभिप्लुतार्थ'२ नामक दोष जानो ॥ ९१ ॥
न्यायादपेतं विज्ञेयं २प्रमाणपरिवर्जितम् ।
न्यायादपेत—प्रमाण रहित विषय का कथन 'न्यायादपेत'३ नामक
काव्य दोष कहलाता है।
वृत्तभेदो३ भवेद्यत्र विषमं नाम तद्भवेत् ॥ ९२ ॥
विषम—छन्दों भंग होने पर 'विषम'४ नामक काव्य-दोष हो जाता है।
४अनुपश्लिष्टशब्दं यत् तद्विसन्धीति कीर्तितम् ।
१. एकार्थ दोष का उदाहरण है :—'कुन्देन्दुहारहरहाससितम्' यहाँ वर्ण्य की
शुभ्रता के लिये कुन्द, चन्द्र, पुष्पमाला, शिवजी का हास आदि अनेक
उपमाएँ दी जाने से यह कथन एक ही अर्थ की पूर्ति करता है।
२. प्रत्येक पाद में अर्थ समाप्त हो जाने के कारण एकवाक्यता न आने से
अभिप्लुतार्थ दोष हो जाता है। जैसे :—
स राजा नीतिकुशलः सरः कुमुदशोभितम् ।
सर्वाप्रिया वसन्तश्री ग्रीष्मे मालतिकागमः ॥
यहाँ प्रत्येक पाद का अर्थ दूसरे किसी पाद के विषय से सम्बद्ध नहीं है।
३. प्रमाणरहित विषय का आशय है कि देश तथा काल के या कला एवं
शास्त्रादि के विपरीत अभिधान करना न्यायादपेत दोष है।
जैसे—सुबीरेष्वस्ति नगरी मथुरा नाम विश्रुता ।
अक्षोटनारिकेलाढ्या यस्याः पर्यन्तभूमयः ॥ इति ।
४. यति भंग के या छन्द के लक्षण का व्यवस्थित अनुगमन न करने के
कारण 'विषम' नामक काव्यदोष होगा। इसे ही उत्तरवर्ती आचार्यों ने
'हतवृत्तता' दोष कहा है।
१. अविप्लुतार्थ—क० ।
२. नोपपन्नं भवेत्तु यत्—क०; प्रमाणपरिवर्तितम्—ग०।
३. वृत्तभेदे—क०; वृत्तदोषो—ख०; ग०।
४. अनुपारूढ़शब्दश्च विसन्धिः परिवर्जितः—क०; अनुप्रतिष्ठाशब्दं यत्
तद्विसन्धीति काशितम्—ख०; ग० ।