नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२९८ :नाट्यशास्त्रम्
अर्थहीनं त्वसम्बद्धं ¹सावशेषार्थमेव च ।
अर्थहीन—जो असम्बद्ध अर्थ हो या जो अर्थ असमाप्त ( अधूरा ) हो
तो उसे 'अर्थहीन' दोष कहा जाता है ।
भिन्नार्थमभिविज्ञेयमसम्य² ग्राम्यमेव च ॥ ८९ ॥
भिन्नार्थ—असभ्य या ग्राम्य अर्थ के सूचक अर्थ को भिन्नार्थ² दोष
जानो ॥ ८९ ॥
विवक्षितोऽन्य³ एवार्थो ⁴यत्रान्यार्थेन विद्यते ।
भिन्नार्थं तदपि⁵ प्राहुः काव्यं काव्यविचक्षणाः⁶ ॥ ९० ॥
अथवा जहाँ विविक्षित अर्थ के स्थान पर अविवक्षित अर्थ का कथन
किया जाय तो उसे भी विद्वान् 'भिन्नार्थ' दोष कहते हैं ॥ ९० ॥
⁷अविशेषाभिधानं यत्तदेकार्थमिति स्मृतम् ।
१. पूर्व कथन से उत्तर कथन के विरोध होने पर अर्थ के असम्बद्ध हो जाने
से यह दोष हो जाता है । जैसे—'अद्यापि स्मरति रसालसं मनो मे
मुग्धायाः स्मरचतुराणि' इत्यादि । ( मेरा रस या आनन्द से मन्थर मन
अभी भी उस स्मरचतुरा मुग्धा ( भोली ) का स्मरण करता है ) यहाँ
मुग्धा कहकर स्मरचतुरा बतलाना पूर्वकथन से उत्तरकथन का विरोध
है । इसी प्रकार असमाप्त या अधूरे कथन के रहने पर यह उदाहरण—
'स महात्माभाग्यवशान्महापदमुपागतः ।' ( वह महामना भाग्यवश महान्
पद या महती आपत्ति को प्राप्त कर गया । ) प्रस्तुत उदाहरण में
प्रकरण के अनुसार अन्य सम्बद्ध शब्द की न्यूनता या वक्तव्य शेष होने से
'अर्थहीन' दोष हो गया है ।
२. भिन्नार्थ दोष की तीन अवस्था में उपलब्धि होगी । ( १ ) जहाँ व्यवधान
के कारण अर्थ का अन्वय करने में कठिनाई आए, ( २ ) जहाँ असभ्य
या ग्राम्य अर्थ का अभिधान हो तथा ( ३ ) विवक्षित या उद्दिष्ट अर्थ के
विपरीत कथन या उद्दिष्टार्थ का अन्यथाकरण हो ।
१. सा त्वशेषार्थमेव च—ख०; ग० ।
२. मपि—क० । ३. विवक्षितान्य—क० ।
४. यत्वन्यार्थेन भिद्यते—क०; ग० । ५. तत्तु ते—क० ।
६. काव्यविदो जनाः—क०; काव्यविचक्षणाः—ख०; ग० ।
७. एकार्थस्याभिधानं यत्—ख०; ग० ।