नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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अर्थव्यक्ति—
सुप्रसिद्धाभिधाना¹ तु लोककर्मव्यवस्थिता ।
या क्रिया क्रियते काव्ये सार्थव्यक्तिः प्रकीर्त्यते ॥ १०३ ॥
जिस रचना में लोक में अतिशय प्रसिद्ध अर्थ का सुप्रसिद्ध शब्दों द्वारा
अभिधान हो तो उसे अर्थ-व्यक्ति' नामक गुण जानो ॥ १०३ ॥
[ यस्यार्थानुप्रवेशेन मनसा² परिकल्प्यते ।
अनन्तरप्रयोगस्तु³ सार्थव्यक्तिरुदाहृता⁴ ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—शब्द प्रयोग के तत्काल पश्चात् जिसका अर्थ तुरन्त चित्त में
प्रवेश कर जाए तो उसे 'अर्थव्यक्ति' गुण जानो । ]
उदात्त ( उदारता ) ता—
दिव्यभावपरीतं यच्छृङ्गाराद्भुतयोजितम् ।
अनेकभावसंयुक्तमुदारत्वं⁵ प्रकीर्तितम् ॥ १०४ ॥
रचना में जब दिव्यपात्रों की शृङ्गार तथा अद्भुत-रस-युक्त वर्णना हो
जो अनेक भावों से पूर्ण हो तो उसे 'उदारता'² गुण जानों ॥ १०४ ॥
१. जिस काव्य क्रिया में अभिधा व्यापार को प्रसिद्ध या ज्ञात वस्तु के लिये
गृहीत किया जाए ( जैसे—'गाहन्तां महिषा निपानसलिलम्' इत्यादि )
अथवा जहाँ लोकप्रसिद्ध वस्तु का हूबहू वैसा ही सहज अभिधान हो
तो उसे भी 'अर्थव्यक्ति' गुण समझना चाहिए । जैसे—शाकुन्तल के
'ग्रीवाभङ्गाभिरामम्' ( शा० १।७ ) इत्यादि पद्य में ।
आचार्य हेमचन्द्र ने अपने लक्षण में 'यस्यार्थानुप्रवेशेन' इत्यादि भरत
कारिका के पाठ को गृहीत किया है ।
२. जहाँ मानुष भाव के योग्य होकर भी दिव्यता के साथ या करुणभाव
से युक्त होकर भी शृङ्गार के साथ विस्मयावहता को उत्पन्न करते हुए
वर्णन किया जाए तो ऐसे अग्राम्य, अप्रसिद्ध या अज्ञात वर्णन से आप्लुत
काव्यबन्ध को 'उदारता' गुण समझना चाहिए । जैसे मालती-
माधव में :—
'त्वमेवं सौन्दर्या स च रुचिरतायाः परिचितः
१. सुप्रसिद्धा धातुना तु—ख०; ग० । २. मनसः—क० ।
३. अनन्तरं प्रयोगस्य—ख० । ४. प्रकीर्तिता—क० ।
५. मुदारं तत्—क० ।