नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 406, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३९५
विष्णु समस्त प्राणियों की रक्षा करते हैं, वे ही संहार करते हैं तथा वे
ही त्रिलोकी का निर्माण भी करते हैं। ये श्री विष्णु भगवान् सभी लोकों के
स्वामी हैं ॥ ७७ ॥
आम्रेडित यमक—
पादस्यान्त्यं पदं १यत्र द्विर्द्विरेकमिहोच्यते ।
२ज्ञेयमाम्रेडितं नाम यमकं तत्तु सूरिभिः ॥ ७८ ॥
यदि पाद का अन्तिम पद दो बार आवृत्त हो तो उसे आम्रेडित यमक
जानो ॥ ७८ ॥
यथा—
विजृम्भितं निःश्वसितं मुहुर्मुहुः ३कथं विधेय स्मरणं पदे पदे ।
यथा च ते ध्यानमिदं पुनः पुनः ४ध्रुवं गता ते रजनी विना विना ॥७९॥
लम्बी उसासें लेते हुए जैसे ही तुमने उसका नाम लिया उसका मुझे
तुरन्त स्मरण हो आया और फिर निश्चल हो उसी के ध्यान में ( मेरी )
उदास होते हुए मेरी सारी रात बीत गई ॥ ७९ ॥
चतुर्व्यवसित यमक—
सर्वे पादाः समा यत्र भवन्ति नियताक्षराः ।
चतुर्व्यवसितं नाम तद्विज्ञेयं बुधैर्यथा ॥ ८० ॥
यदि चारों पाद समान अक्षर वाले हों तो 'चतुर्व्यवसित यमक'
होता है ॥ ८० ॥
यथा— ५वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ।
वारणानामयमेव कालो वारणानामयमेव कालः ॥ ८१ ॥
यह समय पुष्पों ( वारण ) ( की बहार ) का है, यही वह ऋतु है जब
हाथी ( वारण ) व्याधिरहित होता है । यह शत्रुओं के ( आक्रमण हेतु )
आने का समय और उनके प्रतीकारार्थ वीरों के युद्धभूमि में कूदने का भी
यही समय है ॥ ८१ ॥
१. यच्च—ग० ।
२. पादान्ताम्रेडितं नाम विज्ञेयं निपुणैर्यथा—ख०; ग० ।
३. यथाभिधानं—क०; ग०; कथाभिधानं—ख० ।
४. तथागता ते—ख०; ग० ।
५. सावारणानामिति सर्वत्र पाठः । ख० पुस्तके; ग० पुस्तके तु 'सावारणा-
नामसमेव' इति पाठः समुपलभ्यते ।