नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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मालायमक—
नानारूपैः स्वरैर्युक्तं१ यत्रैकं व्यञ्जनं भवेत् ।
तन्मालायमकं नाम विज्ञेयं काव्यकोविदैः२ ॥ ८२ ॥
जब अनेक व्यञ्जनों से युक्त एक ही स्वर विभिन्न शब्दों में आता हो तो
उसे मालायमक कहते हैं ॥ ८२ ॥
यथा—हली बली हली३ माली खेली४ माली सली जली ।
५खलो बलो बलो मालो मुसली त्वभिरक्षतु६ ॥ ८३ ॥
जो वीर, मालाओं से विभूषित, हाथ में अनाज की बाली रखे हुए,
खिलाड़ी, लड़खड़ा कर चलने वाले, भावों से ओतप्रोत, शक्तिशाली, चंचल
नेत्रों वाले और हाथ में गदा धरने वाले हैं वे भगवान् बलराम तुम्हारी
रक्षा करें ॥ ८३ ॥
असौ हि रामा रतिविग्रहप्रिया७ रहः प्रगल्भा रमणं मनोगतम्८ ।
रतेन रात्रौ९ रमयेत् परेण वा न चेदुदेष्यत्यरुणः पुरो रिपुः ॥८४॥
प्रणय द्वन्द्व में रुचि लेने वाली यह सुन्दरी रमणी रात में अपने
प्रगाढ़ आलिंगन से अपने प्रियतम को बिना लज्जा किये हुए तब तक
रिझाती रहेगी जब तक उसका शत्रु सूर्य सम्मुखवर्ती पूर्व दिशा में उदय
नहीं हो जाता ॥ ८४ ॥
स पुष्कराक्षः क्षतजोक्षिताक्षः१० क्षरत्क्षतेभ्यः क्षतजं दुरीक्ष्यम्११ ।
क्षतैर्गवाक्षैरिव संवृताङ्गः१२ साक्षात् सहस्राक्ष इवावभाति ॥८५॥
यह वीर जो कमल के समान नेत्र वाला है, जिसके नेत्र क्रोध से भरे
होने से रक्त से नहाए हुए से लगते हैं, जिसके घावों से रक्त बह रहा है और
जिसके शरीर के घाव वातायन के समान मोटे और खुले हुए हैं, अतएव
यह सम्प्रति सहस्र नेत्रों वाले इन्द्र जैसा लग रहा है ॥ ८५ ॥
१. यत्र—ग० । २. पाठकैर्यथा—ख०; पण्डितैर्यथा—ग० ।
३. लली—ख०; ग० । ४. शूली जाली लली जली—ख०; ग० ।
५. बलो बलोच्चलोलाक्षो—ख०; ग० ।
६. त्वाभिरक्षतु—ग० । ७. विग्रहः—ख० ।
८. मनोद्गतम्—क०; रहोगतम्—ख०; ग० ।
९. रात्रि—ख०; ग० । १०. क्षतजीक्षिताक्षः—ख०; ग० ।
११. दुरीक्ष्यः—ख० । १२. संवृताक्षः—ख०; ग० ।