नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
पृष्ठ 416, कुल 668 में से
संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः ३०५
[ अवगीतोऽपि¹ हीनोऽपि स्यादादुदात्तावभासकः² ।
यत्र शब्दार्थसम्पत्या³ तदोजः परिकीर्तितम् ॥ ]
[ प्रक्षिप्त—जो रचना निन्दित (या हीन) होने पर भी उदात्त-अर्थ की
प्रतीति करवाने वाली हो तो शब्द और अर्थ की सम्पत्तिशालिनी ऐसी
रचना 'ओज' (गुण युक्त) कहलाती है । ]
सौकुमार्य—
⁴सुखप्रयोज्यैर्यच्छब्दैर्युक्तं सुश्लिष्टसन्धिभिः ।
सुकुमारार्थसंयुक्तं सौकुमार्यं⁵ तदुच्यते ॥ १०२ ॥
जो सुश्लिष्ट सरलता से युक्त सन्धि के कारण सरलता से व्यवहार किये
जाने वाले शब्दों तथा सुकुमार अर्थ से युक्त हो तो उसे ‘सौकुमार्य’ गुण
कहते हैं ॥ १०२ ॥
यहाँ 'र' वर्णं 'न्द' वर्णं की गुरुता की अपेक्षा से ग्रथित है । इसके अतिरिक्त
जब एक वस्तु की अनेक पदों से विस्तारपूर्वक वर्णना की जाए—जैसे
कालिदास के निम्न पद्य में—
"अथ नयनसमुत्थं ज्योतिरत्रेरेव द्योः सुरसरिदिव तेजो वह्निनिष्ठ्यूतमैशम् ।”
(रघु० २।७५)
तथा संक्षेप में अर्थभूयस्त्व को प्रकट करने पर भी 'ओज' गुण समझना
चाहिए। जैसे कुमारसंभव के निम्न पद्य में—
“ते हिमालयमामन्त्र्य पुनः प्रेक्ष्य च शूलिनम् ।
सिद्धञ्चास्मै निवेद्यार्थं तद्विसृष्टाः खमुद्ययुः ॥” (कु० सं० ६।९३)
आचार्य हेमचन्द्र ने भरत के 'अवगीतोऽपि' लक्षण के अनुसार ओजगुण
का स्वरूप माना है।
१. जब पदगत रूक्षता या अर्थ के परुष रहने पर भी सुकुमारतापूर्ण
बन्ध रचना ग्रथित हो तो सौकुमार्यगुण समझना चाहिए । जैसे—
एकाकी के लिये देवतासहाय जैसे पद का या मृत व्यक्ति के लिये
यशःशेष पद का प्रयोग करना सुकुमारता है ।
१. अवगीतविहीनोऽपि—क०; अवगीताविहीनोऽपि—ख० ।
२. वभावकः—ख०; ग० । ३. सम्पत्तिस्तदोजः—ख०; ग० ।
४. मुख्यप्रयो—ख० । ५. सुकुमारं—क० ।
२० ना० शा० द्वि०