नाट्यशास्त्र: भाग २ (भरत मुनि - प्रदीप हिन्दी व्याख्या सहित: संगीत, वाद्य, ताल एवं रस-विधान)
Natyashastra Part 2 of Bharata Muni with Pradipa Commentary
महर्षि भरत मुनि (टीकाकार: पं. बाबूलाल शुक्ल शास्त्री) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसप्तदशोऽध्यायः २१७
एभिरर्थक्रियायुक्तैः¹ काव्यं कुर्यात्तु² लक्षणैः।
अतः परं³ प्रवक्ष्यामि काव्यदोषान् गुणाँस्तथा⁴ ॥ ८६ ॥
नाटकों की रचना (उनके) विषय तथा कार्य (अवस्था) आदि का
विचार करते हुए इन अलङ्कारों की योजना काव्य में करनी चाहिए। अब मैं
काव्य रचनाओं में होने वाले दोषों को बतलाता हूँ ॥ ८६ ॥
काव्यदोष—
⁵गूढार्थमर्थान्तरमर्थहीनं भिन्नार्थमेकार्थमभिप्लुतार्थम्।
न्यायादपेतं विषमं विसन्धि शब्दच्युतं⁶ वै दश काव्यदोषाः ॥८७॥
काव्यगत दोष दस (प्रकार के) हैं। यथा—(१) गूढार्थ,
(२) अर्थान्तर, (३) अर्थहीन, (४) भिन्नार्थ, (५) एकार्थ,
(६) अभिप्लुतार्थ, (७) न्यायादपेत, (८) विषम, (९) विसन्धि
तथा (१०) शब्दच्युत ॥ ८७ ॥
⁷पर्यायशब्दाभिहितं गूढार्थमिति⁸ संज्ञितम्।
गूढार्थः—जहां पर्यायवाचक (अप्रसिद्ध) शब्दों द्वारा वर्ण्य या विषय
को कह दिया जाय तो उसे 'गूढार्थ' समझना चाहिए।¹
अवर्ण्यं वर्ण्यते यत्र⁹ तदर्थान्तरमिष्यते ॥ ८८ ॥
अर्थान्तर—जहाँ अवर्णनीय विषय का वर्णन किया जाय उसे अर्थान्तर²
दोष कहा जाता है ॥ ८८ ॥
१. 'गूढार्थ' में क्लिष्ट शब्द का प्रयोग करने से अर्थ-ज्ञान में कठिनाई आ
जाती है। जैसे—दशरथ के लिये 'एकाधिकनवविमान' पद का प्रयोग।
परवर्ति आचार्योंके 'निहतार्थत्व' दोष से इसकी तुलना की जा सकती है।
२. वर्णनीय अर्थ के साथ किसी अनभीष्ट या अवर्णनीय अर्थ की भी जब साथ-
साथ प्रतीति हो तो 'अर्थान्तर' होता है। जैसे—'चिन्तामोहमनङ्गमङ्ग
तनुते विप्रेक्षितं सुभ्रुवः' यहाँ काम का बतलाना इष्ट है पर इसी के साथ
बुद्धि में चिन्ता और मोह की भी बिना वर्णन के प्राप्ति हो जाती है।
इसे मम्मटादि सम्मत 'अमतपरार्थता' दोष मानना चाहिए।
१. क्रियापेक्षं—ख०; क्रियापेक्षैः—ग०।
२. कार्यं तु—ख०। ३. ऊर्ध्वं तु वक्ष्यामि—ग०।
४. समासतः—ख०; दोषाँस्तथाविधान्—ग०।
५. अगूढ—ग०। ६. च्युतञ्च शब्दात्—शब्दात् च्युतं—क०।
७. इतः आरभ्य सार्धश्लोकपञ्चकं केषुचिदादर्श पुस्तकेषु नास्ति।
८. मभिसंज्ञितम्—क०; ग०। ९. यत्तु—क०।